जिम्मेदारी बढ़ती चली गई

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दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के वर्षों तक रहे सर्वेसर्वा मो. सत्यनारायण संयोग से केंद्रीय हिंदी संस्थान के सर्वाधिकारी नियामक बन गए। श्री सत्यनारायण जी पहले से ही इधर सक्रिय थे। प्रारंभ में वे हिंदी प्रचार से संबंधित रहे। लेकिन बाद में वह इस पर विवेचना करने लगे कि हिंदी क्यों नहीं आगे बढ़ पा रही है। उनके विचार से हिंदी को प्रयोजनमूलक होना चाहिए। केंद्रीय हिंदी संस्थान में उन्होंने इस विषय पर एक कार्यगोष्ठी भी कारवाई, जिसमें श्री सत्यनारायण जी ने सक्रिय भाग लिया और प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव ने उसको मूर्त स्वरूप प्रदान किया। बाद में पता लगा प्रयोजनमूलक शब्द ही अधिक सार्थक है।

लेखक- कैलाश चन्द भाटिया

केंद्रीय हिंदी संस्थान से मैं इसके जन्म से ही जुड़ा हुआ हूँ। आगरा विश्वविद्यालय के समीप ही नए विजय नगर में मुझे रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। जब मैं विश्वविद्यालय जाता था तो मार्ग में ही एक भवन पड़ता था, जिसमें संस्थान अपने पूर्व रूप में संचालित होता था, जिसमें मेरे परम मित्र और साथी डॉ. तीर्थराज शर्मा और डॉ. द्वारका प्रसाद सक्सैना पढ़ाने आते थे। मैंने उस भवन में भारतीय भाषाओं में समान तत्व विषय पर एक भाषण भी दिया था, जो आगे चल कर हिंदुस्तानी ऐकेडमी, इलाहबाद से बाद में प्रकाशित हुआ। श्री नावड़ा जी के बाद कुछ दिनों के लिए डॉ. विनय मोहन शर्मा, नागपुर विश्वविद्यालय के अध्यक्ष केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक के रूप में आए। तत्पश्चात ही डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा इलाहबाद से, जिनके कार्यकाल में संस्थान को भारत सरकार ने स्वरूप प्रदान किया, जो आज तक बरकरार है। वर्तमान नया भवन तो बहुत बाद में सन 1980 में तैयार हुआ।

इस प्रकार में हिंदी संस्थान से विविध रूपों से जुड़ा रहा। अकादमिक, परिषद, चयन समिति, पाठ्यक्रम समिति तथा अन्य समितियों से जुड़ा रहा। कई बार निदेशक के रूप में कार्य करने का आह्वान किया गया, लेकिन मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी में भारतीय भाषाओं का अध्यक्ष-प्रोफेसर बनने के कारण संभव यह नहीं हो सका। केंद्रीय हिंदी संस्थान के तत्वावधान में श्री सु. भारती पुरस्कार से राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया। इस संस्थान की उदारता थी कि मैं चुना गया। इस प्रकार उत्तरोत्तर में संस्थान में नए-नए निदेशक आते गए और मेरे संबंध उनसे अधिकाधिक प्रगाढ़ होते गए, चाहे वे ब्रजेश्वर वर्मा हों, गोपाल शर्मा हों, बी.जी. मिश्रा हों या महावीर सरन जैन आदि। इस प्रकार संबंधों की प्रगाढ़ता के कारण गतिविधियों में मेरी संस्थान के प्रति जिम्मेदारी बढ़ती चली गई और मैं इसे लगातार निभाता रहा।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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