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लेखक- प्रो. राजेश्वर प्रसाद
प्रो. राजे वर प्रसाद

विजय नगर कॉलोनी में मेरे मित्र श्री प्रणवीर चौहान रहते थे। उनके पिताश्री ठाकुर उल्फत सिंह चौहान जिला परिषद के चेयरमैन रह चुके थे। मैं समाज विज्ञान संस्थान में अध्यापन का कार्य करता था। वहीं पड़ोस में नावड़ा जी अहिंदी भाषा-भाषियों को हिंदी सिखाने का काम किया करते थे। तब उसको केंद्रीय हिंदी संस्थान कहा जाता था या नहीं, यह मुझे याद नहीं परंतु नावड़ा जी बड़ी लगन से यह कार्य करते थे। एक और नाम जो मुझे याद आ रहा है, वह श्री भूदेव शास्त्री जी का है, जो इस संस्थान से लम्बे समय तक जुड़े रहे।

कन्हैयालाल माणिक लाल मुशीं भाषा विज्ञान विद्यापीठ तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के अग्रणी संस्थान थे, जिनमें प्रोफेसर रमानाथ सहाय की अहम भूमिका थी। दोनों संस्थानों का कार्य क्षेत्र अलग-अलग था। क. मा. मुं. संस्थान पुणे के बाद भाषा विज्ञान का प्रमुख केंद्र था, जहाँ प्रो. विश्वनाथ प्रसाद जैसे विख्यात निदेशक रहे थे।

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परंतु केंद्रीय हिंदी संस्थान का स्थान हिंदीतर भाषा-भाषियों को हिंदी पढ़ाने का कार्य करने में महत्वपूर्ण था। यहाँ के अध्यापक हिंदीतर राज्यों और क्षेत्रों में हिंदी प्रसार-प्रचार, विद्यालयों में हिंदी पढ़ाने हेतु शिक्षक तैयार करते थे। इस संस्थान में निदेशक के रूप में मेरे आत्मीय, प्रोफेसर ब्रजेश्वर वर्मा लम्बे समय तक रहे। उनका बड़ा बेटा राजा मेरा विद्यार्थी था और बाद में उनकी पुत्री सुश्री रश्मि, जिसने भाषा विज्ञान से एम. ए. किया और डॉ. विश्वजीत के निर्देशन में पी. एच. डी. की थी। मेरे साले श्री अशोक, जो इलाहबाद विश्वविद्यालय में 'एप्लाईड फिजिक्स' पढ़ाते थे, से विवाह हुआ। वह भी एक स्थानीय डिग्री कॉलेज में पढ़ाती हैं। इस प्रकार केंद्रीय हिंदी संस्थान से मेरा जुड़ाव और भी गहरा हो गया था। मुझे भी वहाँ संगोष्ठियों में शामिल होने और भाषण देने के लिए आमंत्रित किया जाता रहा और में इस रिश्ते को महत्वपूर्ण मानता हूँ। केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा एक विशिष्ट स्थान रखता है, जो राष्ट्रभाषा की सेवा कर रहा है।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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