भेंट करायी.... हिंदी ने

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लेखक- ए. अरविंदाक्षन

केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा प्रायोजित गंगाशरण सिंह पुरस्कार प्राप्त करने का अवसर भी मुझे मिला, जो मेरे लिए अविस्मरणीय है। उस बहाने अन्य पुरस्कारों से विभूषित कई मित्रों से मिलने का वह एक सुअवसर भी था। राष्ट्रपति भवन में आयोजित उस भव्य समारोह की स्मृतियाँ अब भी बनी हुई हैं। संस्थान के साथ जुड़ने एवं भाषा के प्रति समर्पित होने की भावना इस आयोजन के बाद पुन: दृढ़तर होती गयी।

साहित्य का विधार्थी होने के कारण विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में उपलब्ध कई साहित्यिक पत्रिकाओं के बीच 'गवेषणा' की तरफ मेरा ध्यान न जाना सहज था। एक तरह से 'गवेषणा' को मैंने अनदेखा ही कर दिया था। उस साफ-सुथरी पत्रिका को एक बार उलट-पलटकर मैंने देखा तो था। उसके विषय मेरी रूचि के अनुकूल थे। लेकिन एक दिन ऐसा हुआ कि जब सभी पत्रिकाएँ मैंने पढ़ रखी थीं और कोई नई पत्रिका हाथ नहीं लगी तो मैंने 'गवेषणा' को उठाया। इस बार मैंने सिर्फ उलटने-पलटने का काम ही नहीं बल्कि पढ़ना भी शुरू किया। आलेख रूचिकर तो नहीं लगे, फिर भी एकाध लेख मैंने पढ़ डाले। संपादकीय टिप्पणी भी पढ़ी और पत्रिका के अन्य विवरण भी देखे। केंद्रीय हिंदी संस्थान के साथ मेरा पहला संबंध 'गवेषणा' से ही स्थापित हुआ। विभाग का पूरा माहौल साहित्यिक था। इसलिए संस्थान के बारे में अधिक जानकारी या उसकी गतिविधियों के बारे में भी मैं अपरिचित ही रहा, लंबे समय तक। एक बार हमारे विभाग में कैलाशचंद्र भाटिया जी आए और उन्होंने हमारे लिए भाषा विज्ञान पर तीन भाषण दिए। उनके भाषण में केंद्रीय हिंदी संस्थान का नाम तो आ गया और उसकी गतिविधियों का विवरण भी था। संस्थान द्वारा चलाए जाने वाले प्रशिक्षणों के बारे में हमें जानकारी मिली। भाटिया जी चले गए और संस्थान भी दिमाग से हट गया।

कई वर्ष गुजर गए। अध्यापकीय जीवन शुरू हुआ। एक दिन केंद्रीय हिंदी संस्थान के मैसूर केंद्र के प्रभारी डॉ. कृष्ण कुमार गोस्वामी जी का फोन आया कि उनका एक कार्यक्रम था। उसमें मुझे बोलना था। पहले तो मेरा मन नहीं मान रहा था कि भाषा केंद्रित कार्यक्रम में मुझे बोलना है। उनके जोर देने पर मैं गया। शिक्षकों ने मेरे भाषण को इसलिए पसंद किया, क्योंकि हिंदी भाषा के प्रयोग में मलयालम के प्रभाव को लेकर मैंने भाषण दिया था। अनेकानेक उदाहरणों के माध्यम से इस तथ्य को मैंने स्पष्ट किया था। मैसूर केंद्र के प्रभारी प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी जी के साथ मित्रता के कारण संस्थान के साथ मेरा संबंध बढ़ा। जब भी वे कार्यक्रम करते, उद्घाटन या समापन में वे मेरे भाषण रखते थे। इन मुलाकातों से मुझे फायदा हुआ कि संस्थान जैसी हिंदी की एक मुख्य संस्था से मैं परिचित हो पाया।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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