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लेखक- प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव
प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव

मैंने केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में 14 सितम्बर, 1974 को लेक्चरर पद पर कार्य प्रारंभ किया। 22.08.1989 को रीडर बना और जुलाई, 1988 को प्रोफेसर बना। मई, 2010 में संस्थान से सेवानिवृत हुआ। संस्थान में लगभग 36 वर्ष के सेवा काल में खट्टे-मीठे अनुभव एवं स्मृतियाँ स्वाभाविक हैं, जिनके बारे में अवश्य चर्चा करना चाहूँगा।

असम के नलबाड़ी में पुनश्चर्या पाठ्यक्रम में जिस होटल में हम लोग ठहरे थे, वह 'उल्फा' के मीटिंग का अड्डा था, जिनकी बराबर नज़र हम लोगों पर थी। एक रात डॉ. हेमराज मीणा के 11.00 बजे रात तक न आने पर मैं और डॉ. रामकृपाल कुमार कितने बैचेन थे, बता नहीं सकते। लगता था कि हिंदी के कार्य में शहीद ही न हो जाएँ। पर हमारा उत्साह कभी कम नहीं हुआ।

इन सबके बावजूद मुझे 2 वर्ष का गुवाहटी कार्यकाल बहुत ही सुखद लगा था। श्री वेद प्रकाश देवरानी, श्री रामेश्वर सिंह, श्री गोरन सिंह के सहयोग को नहीं भूल सकता।

हिंदी भाषा संचेतना विकास शिविर : 1983, 1984, 1985 में संस्थान से संबद्ध विद्यालयों जैसे- नागालैंड, मिजोरम, गुवाहटी, मणिपुर, मैसूर आदि में सुबह खेलकूद, 10 से 1.00 बजे तक कक्षाएँ, 2.00 से 5.00 बजे तक सांस्कृतिक कार्यक्रम (विद्यार्थियों के लिये) और रात में 8.00 से 10.00 बजे तक सांस्कृतिक कार्यक्रम में नाटक, नृत्य एवं संगीत, कवि सम्मेलन आदि आयोजित होते थे। मैं शिविर का उपसंयोजक तथा रात्रि के संस्कृतिक कार्यक्रम का संयोजक था।

प्रात: काल से रात्रि तक शिविर में डॉ. के. के. शर्मा, स्व. मो. मा. चौहान, डॉ. राम कमल पांडे, डॉ. भरत सिंह परमार, डॉ. के. जी. कपूर एवं डॉ. अरुण चतुर्वेदी आदि जिस मनोयोग एवं निस्वार्थ भाव से कार्य करते थे, वह अविस्मरणीय है। भाषा संचेतना शिविर का बंद होना मेरे लिए मन को कचोटने वाला है।

अध्यापक एवं कर्मचारी वर्ग की खेल-कूद प्रतियोगिताएँ- बैडमिंटन, टेबिल-टेनिस, कैरम, शतरंज, वालीबाल, क्रिकेट आदि एक स्वप्न जैसी बात लगती है। दोनों वर्गों में कितनी एकता थी। कार्यक्रम का समाप्त होना भी सुखद है।

भाषा प्रौद्योगिकी विभाग में नवीन भाषा प्रयोगशाला, इलेक्ट्रानिक कक्ष, स्टूडियो तथा कंप्यूटर कक्ष की स्थापना और मल्टीमीडिया द्वारा सामग्री निर्माण सुखद अनुभूति प्रदान करता है। अंतर्राष्ट्रीय मानक हिंदी पाठ्यक्रम का प्रारंभ 2002 में हुआ था। 2007 में 8वें विश्व हिंदी सम्मेलन न्यूयार्क में बहुत से विदेशी विद्वानों के साथ चर्चा हुई और पाठ्यक्रम की सराहना हुई। इस पर संस्थान और बाहर के विद्वानों ने बहुत मेहनत की है। लेकिन अफसोस मई, 2010 तक मेरे सेवानिवृत होने तक पाठ्यक्रम अंतिम परिणाम तक नहीं पहुँच पाया। एक सुखद आशा है कि संस्थान की स्वर्ण-जयंती पर इस पाठ्यक्रम का विमोचन होगा।

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संस्थान परिवार के साथ सौहादपूर्ण व्यवहार, अपने विदाई समारोह से अभिभूत हूँ और संस्थान का कृतज्ञ रहूँगा, विशेषकर कुलसचिव डॉ. सी. के. त्रिपाठी एवं लेखाधिकारी श्री अनिल चौधरी के सहयोग का, 'विदेशी वाटिका' का निर्माण, सुभद्रा कुमारी चौहान स्टैंड एवं नये किचन का निर्माण, विद्यार्थियों के खेल-कूद, सांस्कृतिक कार्यक्रमों एवं शैक्षिक पर्यटन में कई वर्षों तक सहयोग, 26 जनवरी को रक्त-दान शिविर, जिससे संस्थान के सभी वर्गों को लाभ हुआ।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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