सफर का सफरनामा

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लेखक- डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ
डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ

मैंने 4.1.1972 से केंद्रीय हिंदी संस्थान के मुख्यालय आगरा में लेक्चरर पद पर कार्यभार ग्रहण किया।

इस समय को संस्थान का विकास-युग कहना उचित होगा। यह मेरे लिए बहुत सुखद और सौहार्दपूर्ण अनुभव था। सभी संस्थान के विकास के लिए प्रयासरत थे। केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल की शासी परिषद में उस समय पद्मश्री मोटूरि सत्यनारायण अध्यक्ष, डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा सचिव/निदेशक, डॉ. नगेन्द्र, डॉ. नामवर सिंह जैसे मूर्घन्य विद्वान सदस्य थे, जो संस्थान के विकास और प्रसार के लिए प्रयासरत रहे हैं। समय-समय पर देश के सभी प्रदेशों से हिंदी के मूर्धन्य विद्वानों को आमंत्रित कर प्रसार व्याख्यानों, सेमीनारों, संगोष्ठियों का आयोजन कर हिंदी को विभिन्न क्षेत्रों में सुदृढ़ करने और उसके प्रचार-प्रसार की भावनाओं को तलाश कर उनको कार्यान्वित करने की योजनाओं को मूर्त रूप दिया जाता था। इसी कारण संस्थान में विभिन्न योजनाएँ कार्यान्वित हो सकी हैं, अध्यापकों का पूर्ण सहयोग रहा है। विभिन्न योजनाओं के कार्यान्वयन के कारण ही संस्थान का क्षेत्र विस्तार हुआ है। देश में कई अन्य केंद्र भी कार्य कर रहे हैं। देश के हिंदीतर छात्रों के लिए ही नहीं वरन विदेशी छात्रों के हिंदी अध्ययन की व्यवस्था भी की जा सकी है। ऐसे परिवेश में कार्य करना मेरे लिए सुखद अनुभव रहा है।

फरवरी, 1976 तक संस्थान में अध्यापकों के वेतन मान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा पूर्व में संस्तुत वेतन मान लागू थे, जो इस प्रकार थे। लेक्चरर- 400 - 800, रीडर- 700 - 1100, प्रोफेसर- 1000 - 1500।

अन्य विश्वविद्यालयों में इसके बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा संस्तुत दो और वेतन मान लागू हो चुके थे। अत: अध्यापकों में इससे निराशा व्याप्त थी। अध्यापक एसोसिएशन ने शासी परिषद के माध्यम से वर्तमान वेतन मान स्वीकृत करने के लिए 'भारत सरकार' से आग्रह किया। किंतु वर्तमान वेतन मान से पूर्व वेतन मान लागू न होना, वर्तमान वेतन मान की स्वीकृति में बाधक था। इस संबंध में एक शिष्टमंडल शासी परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष पद्मश्री मोटूरि सत्यनारायण के नेतृत्व में जिसमें शासी परिषद से डॉ. नगेन्द्र, डॉ. नामवर सिंह, सदस्य, डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा, सचिव/निदेशक, मंडल से डॉ. कमलेश्वर अध्यापक एसोसिएशन से डॉ. आर. एन. श्रीवास्तव अध्यक्ष तथा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ सचिव थे, तत्कालीन शिक्षा मंत्री माननीय श्री नूरुल हसन जी से मिला और उनसे वर्तमान वेतन मान लागू करने का आग्रह किया। उन्होंने बड़ी उदारता से समस्या को सुनकर समाधान किया- कि अगर अध्यापकगण वित्तयीय आग्रह न करें तो पहले पूर्व वेतन मान को स्वीकृत कर वर्तमान वेतन मान स्वीकृत किया जा सकता है। शिष्टमंडल ने बड़े आभार से इस प्रस्ताव को स्वीकार किया। फलत: मंत्रलय ने अपने पत्र संख्या F6-20/74-D II (L) दिनांक 12 फरवरी, 1976 के आदेश से 1.1.1973 से निम्नलिखित वेतन मान लागू करने की स्वीकृति दी।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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