समन्वय छात्र पत्रिका-2011 पृ-16

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मैं हिन्दी का अध्यापक हूँ

-वीरेन्द्र कुमार सिंह

मैं हिन्दी का अध्यापक हूँ। हरदम धिक्कारा जाता हूँ। हरदम फटकारा जाता हूँ। हरदम दुत्कारा जाता हूँ। सब सहता हूँ। चुप रहता हूँ।

कोई ज्यादा अपमान करे। मैं अपने पर हँस लेता हूँ। मैं अपने को डस लेता हूँ। मैं अपने को कस लेता हूँ।

मैं हिन्दी का अध्यापक हूँ।

वह हिन्दी का विद्यार्थी है। उसकी प्रोफाइल एलआईजी, उसकी इच्छाएँ एमआईजी, उसके संसाधन निम्न-निम्न। उसकी उड़ान के आसमान में हिन्दी पतंग-सी उड़ती है। वह उसको पढ़ने आता है। वह उससे लड़ने आता है। वह उसमें सड़ने आता है। वह उसमें जुड़ने आता है। वह उसमें जब कढ़ आता है तो हिन्दी हो जाता है। हिन्दी ही उसका सपना है। हिन्दी समाज ही अपना है। हिन्दी ही उसकी रोटी है। हिन्दी ही उसकी काया है। हिन्दी ही उसकी माया है।

हिन्दी गुरबत की मारी है। उस पट्टी की बीमारी है, जिसमें आधी आबादी बसती है। वह जो हिन्दी विद्यार्थी है, इस पट्टी में ही आता है। वह है लोअर मिडिलक्लास हेय जिसका न कहीं कुछ श्रेय-गेय। कुछ डरा-डरा सहमा-सहम, कुछ चंट चतुर-चालाक, काइयाँ, दीन हीन-सा वह दिखता है।

वह मेहनत करता रहता है। चमचागीरी, चेलागीरी ऊपर ओढ़ भक्ति-भाव वह गुरु सेवा का छलिया प्रपंच कर अपनी हिन्दी करता है। जो कुछ सिस्टम ने बना दिया, वह उसके गोरख धन्धे में उस्तादी करना सीख-सीख कुछ-कुछ सा करता रहता है।

उसके विकल्प उसके न पास
हिन्दी ही उसकी एक आस!
वह हिन्दी का अध्यापक है।
वह हिन्दी का विद्यार्थी है।
औरों के धन्धे भी ऐसे।

मसलन न कहें कैसे-कैसे ? कुछ कह देंगे- 'अपमान हुआ' हो जाएगा। हमने भी सबको देखा है। कितने ज्ञानी-अज्ञानी हैं, कितने मानी-अभिमानी हैं ? कब, कौन, कहाँ, किस तरह बिका ? किस-किस की नकल नबीसी में किस-किस ने उस्तादी की है ? कब, कौन, कहाँ, क्या करता है ? उनकी फाइल क्यों खोले अब ? वो भी हिन्दी के गल्ले हैं। वे भी हिन्दी के दल्ले हैं। ये ही हिन्दी के हल्ले हैं।

हिन्दी में कुछ ऐंठू-कुछ गलत-सलत, अंग्रजी पढ़ हिन्दी के बन आते हैं। जब हिन्दी को गरियाते हैं, जब हिन्दी को लतियाते हैं, तो भी हिन्दी ही सहती है।

सोचना कभी 55 करोड़ हिन्दी वालों की लात-बात इक बार किसी को लग जाए उसका क्या होगा ? क्यों साथी ! यह सोच-सोच अपने से ही कुछ डरी हुई वह शांत भाव में लीन, अभी रोटी-रोजी की नित जुगाड़, इसका चूल्हा उसका बरतन उसका पोंछा करती है। इस तरह वही अपने बालगोपालों का कुछ पेट पालती रहती है।

वह हिन्दी की इंडस्ट्री है। मीडिया और मार्केट ने हिन्दी की ताकत को समझा है। कुछ गलत-सलत अनपढ़े लोग हिन्दी को जब धकियाते हैं तो इसी मुए बाजार में बैठ वे अपनी दुकान लगाते हैं।

अपनी हिन्दी की खातिर ही हिन्दी का यह अध्यापक अड़ता है। हिन्दी अध्यापक पढ़ता है। हिन्दी अध्यापक लड़ता है। साहित्य निपुण कर हिन्दी में वह रसिक क्रिटिक कुछ रचनाकार जुटाता है। कुछ पेशेवर बन जाते हैं, कुछ बेपेशा रह जाते हैं। हजारों रचनाकारों का पढ़ा-पढ़ा वह रचनाकार बनाता है।

धुर निरादर्श के इस युग में, इस 'अ-महानता' के इस युग में, हे हिन्दी के कटखने बधिक तुम किस आदर्श डुगडुगी पर हो नाच रहे ? किसकी महानता मान रहे ?

हिन्दी जैसी है। रहने दो। सह नहीं सको तो कहीं रहो। हम हिन्दी के अध्यापक हैं, हम हिन्दी के विद्यार्थी हैं। हम हिन्दी के अखबार, मिडिया, फिल्म, रेडियो तक फैले। हिन्दी की रोटी खाते हैं। हिन्दी के हित की गाते हैं।

हम हिन्दी की लाचारी हैं। हम हिन्दी की तैयारी हैं। हम हिन्दी की नीचाई हैं। हम हिन्दी की ऊँचाई हैं। आ जाओ जरा-सा साथ-साथ लिखकर देखो, पढ़कर देखें, गुनकर देखो, इस पर स्पर्धा कर देखो। इससे कुछ हिन्दी चमकेगी। धिक्कारोगे तो बमकेगी !

हम हिन्दी के अध्यापक हैं। हम हिन्दी की तैयारी हैं ! तुम क्या जानो ?

निष्णात


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15:2
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समन्वय छात्र पत्रिका 2011 अनुक्रम
क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. वाणी वन्दना पं. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' 2:1
2. संस्थान गीत पं. रामेश्वर दयाल दुबे 2:2
3. प्रो. अशोक चक्रधर शुभकामनाएँ 3
4. प्रो. के. बिजय कुमार शुभकामनाएँ 4:1
5. डॉ.चंद्रकांत त्रिपाठी शुभकामनाएँ 4:2
6. राजकमल पाण्डेय संदेश 5:1
7. सम्पादक की बात वीना माथुर 5:2
8. हे! सृष्टि रचयिता विजय बालू सरडे 6
9. एक और लोकनायक की जरूरत है सागरिका महान्ति 7
10. सकल देशेर सेरा सीमा दास 9
11. नमस्कार का महत्व मंजूबाला महांकुड 10
12. हम आज भी पराधीन हैं चन्द्रभानु साहु 11
13. झूठी शोहरत रजनी बाला लॉली 12
14. आपके नाम रजनी बाला लॉली 12
15. बहुत बड़ा खेल है शिन्दे बंकट 13:1
16. वीर संभूधान फोंगलोसा हमजेन्दी हसनू 13:2
17. अस्पताल की वह रात राजीव यादव 14
18. गजल श्री हरी महल 15:1
19. समपर्ण सुस्मिता नायक 15:2
20. मैं हिन्दी का अध्यापक हूँ वीरेन्द्र कुमार सिंह 16
21. बंगला कविता का सार रूप में अनुवाद सीमा दास 17
22. मैनेजर पांडेय का आलोचना साहित्य संदीप आधार चव्हाण 18
23. चेहरा दीपक आर. चौहान 20
24. यायावर पंछी दीपक आर. चौहान 20
25. तितली दीपक आर. चौहान 20
26. संस्थान में मेरे अनुभव निबेदिता नाथ 21
27. आपातानी की कहानी 23
28. क्यों न दया मरे... प्रतिमा शर्मा 24
29. एक दृश्य ऐसा भी कस्तूरिका दाश 25
30. जब मैं आया पढ़ने यहाँ मानस रंजन दास 26:1
31. याद करेंगे सच्चे दिल से देबराज प्रधान 26:2
32. "मोअत्स त्यौहार" की कहानी इम्वापांगला. एल. इमसोंगू 27
33. 26 जनवरी का इतिहास मंजूबाला महांकुड 28
34. आगत ! स्वागत !! राजीव यादव 29
35. हवा प्रमोद कुमार 30:1
36. सावन आता है गौतम प्रसाद पातर 30:2
37. विकलांगता निवेदिता नाथ 31
38. चेहरा मंजूबाला महांकुड 32
39. नारी समस्या क्यों है भारी तोमर अनीता कुमार जगदीश सिंह 33:1
40. वर्तमान अब्दुल वादुद 33:2
41. बदलते परिवेश... विजय बालू सरडे 34
42. छात्रों की अभिलाषा रूपेश कुमार नायक 36:1
43. पैसा श्री हरि महल 36:2
44. बात मुद्दों की उठाओ कुलदीप शर्मा 37:1
45. शब्दों का जाल अनुजा डेका 37:2
46. राष्ट्रभाषा विभीषण गुरु 37:3
47. ठिकाना राजू कुमार पाण्डेय 38:1
48. जिन्दगी राजू कुमार पाण्डेय 38:1
49. सब कुछ हो तुम सन्तोष कुमार सुना 38:2
50. कथकली विष्णु जी 39
51. चुटकुले रूपेश कुमार नायक 40
52. भारतीय संस्कृति और वास्तविकता बसन्त कुमार विश्वाल 41
53. होली लवाण्य भानू रेखा 42
54. गणतन्त्र दिवस की वह शाम कस्तुरीका दाश 43
55. सूखी प्रतीक्षा संदिप आधार चव्हाण 45
56. भिखारी है या साहूकार संदिप आधार चव्हाण 45
57. भूखे पेट से संदिप आधार चव्हाण 46
58. महाराष्ट्र और मराठी की हकीकत शिंदे बंकटस्वामी बाला साहेब 47
59. प्रकृत-मनुष्य कौन है ? वीरेंद्र कुमार नाग 49
60. रेखा एस. जबीसलाम 50
61. शिक्षणाभ्यास एवं प्रायोगिक कार्य 51
62. भारत स्काउट एवं गाइड प्रशिक्षण शिविर 52
63. स्काउट परिणाम 53
64. गाइड परिणाम 54
65. स्काउट (टैंट निर्माण) 54
66. गाइड (टैंट-निर्माण) 55
67. सांस्कृतिक प्रतियोगिता 55
68. साहित्यिक गतिविधियाँ 57
69. विभागीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ 58
वैयक्तिक औज़ार

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