समन्वय छात्र पत्रिका-2011 पृ-18

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मैनेजर पांडेय का आलोचना साहित्य

-संदीप आधार चव्हाण


मैनेजर पांडेय हिन्दी के यशस्वी मार्क्सवादी आलोचक हैं। उनकी आलोचना में साहित्य और जीवन के जुड़ने की संवेदनशीलता तथा आत्मीयता गहरे स्तर पर मौजूद है। इसलिए पांडय जी की आलोचना में समाजोन्मुख सर्जनात्मकता सम्भव हुई है और अपनी आलोचना में उन्होंने विषय को समग्रता में पकड़ने की कोशिश की है। आलोचना करने के लिए आलोचना से कुछ अपेक्षाएँ भी की जाती हैं। इन अपेक्षाओं के बारे में उनका कहना है "मैं ऐसा समझता हूँ कि अच्छी आलोचना लिखने के लिए रचना की समझ के साथ-साथ समाज भी आवश्यक है, जिससे वह रचना पैदा हुई है।"

मैनेजर पांडेय अपने आलोचना कर्म में परंपरा के विश्लेषणपरक मूल्यांकन के भी प्रस्तावक रहे हैं। जिन्होंने भक्तकवि सूर के साहित्य की समकालीन व्याख्या कर भक्तियुगीन काव्य की प्रचलित धारणाओं से अलग एक नई तर्कपरक प्रासंगिकता सिद्ध की है। वे अपनी बात को समझने के लिए टालस्टॉय और टॉक्स मान जैसे महान लेखकों को भी जिरह के बीच लाते हैं और उसी प्रकार अपनी आलोचना को बृहत्तर अर्थवत्ता भी प्रदान करते हैं। आलोचना की प्रासंगिता को समझते हुए उन्होंने इसे एक सांस्कृतिक कार्य के रूप में विकसित किया है। कई नई अवधारणाओं को डॉ. पांडेय ने प्रतिपादित किया है। उन्होंने सूर के विवेचन में वात्सल्य, भक्ति और सख्य भाव के समान्तर उनकी रचनाओं में किसान जीवन की यातना, राजनीतिक दुष्चक्र और पारिवारिक जीवन के अंतरंग पहलुओं को हिन्दी में सर्वथा पहली बार खोजा है। डॉ. पांडेय की आलोचना रचना के परे जाकर साहित्य, इतिहास, दर्शन और विचारधारा के अंत:सम्बन्धों की गहन पड़ताल करती है और एक स्तर पर रचना और विचार की एकात्मकता के साथ-साथ इतिहास तथा समाज के वास्तविक आलोचनात्मक सम्बन्धों की भी खोज करती है।

मैनेजर पांडेय जी के अनुसार अच्छी आलोचना लिखने के लिए रचना की समझ के साथ-साथ उस समाज की समझ भी आवश्यक है, जिससे वह रचना पैदा हुई है। इसीलिए कहा जाता है कि रचना और आलोचना दोनों के मूल में जीवन और जगत है।

मार्क्सवादी आलोचक के धार के रूप में गिने जाने वाले मैनेजर पांडेय जी को आलोचना के क्षेत्र में आने के लिए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डॉ. रामविलास शर्मा और बाद में नामवर सिंह से प्रेरणा मिली। स्वयं पांडेय जी का मानना है कि आलोचना समाज के बीच अन्त:सम्बन्धों का माध्यम होकर ही सामाजिक बदलाव का साधन हो सकती है। आगे चलकर वे साहित्यालोचना में इतिहास को भी अंतर्भुत करते हैं।

मार्क्सवादी आलोचक पांडेय जी की आलोचनात्मक सृजनशीलता की आरम्भिक प्रति छवि उनकी पुस्तक 'शब्द और कर्म' में देखी जा सकती है। इसमें लेखक ने आलोचना को रचना कर्म की तरह ही एक सामाजिक कर्म और विचारधारात्मक संघर्ष का साधन मानकर दूसरे सामाजिक व्यवहारों और विचारों से उसके गहरे सम्बन्ध पर बार-बार बल दिया है।

विश्वभर में साहित्य की समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रणाली अपनी आरम्भिक अवस्था में ही है। हिन्दी में मैनेजर पांडेय जी की "साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका" को इस दिशा में एक श्रेष्ठ कृति के रूप में स्वीकार किया जाता है। पुस्तक की अंतर्वस्तु में लेखक ने साहित्य के समाजशास्त्रों के दोनों पक्षों पर मीमांसापरक और अनुभववादी विचार किया है। तथा साहित्य और समाज के हर एक पहलू पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विचार किया है।

'भक्तिकाल और सूरदास का काव्य' नामक पुस्तक उनके भक्ति आन्दोलन और साहित्य के अध्ययन का महत्वपूर्ण पड़ाव है। अपने ऐतिहासिक एवं समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के तहत लेखक ने इसमें सूरदास के काव्य की सामाजिकता की खोज की है।


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समन्वय छात्र पत्रिका 2011 अनुक्रम
क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. वाणी वन्दना पं. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' 2:1
2. संस्थान गीत पं. रामेश्वर दयाल दुबे 2:2
3. प्रो. अशोक चक्रधर शुभकामनाएँ 3
4. प्रो. के. बिजय कुमार शुभकामनाएँ 4:1
5. डॉ.चंद्रकांत त्रिपाठी शुभकामनाएँ 4:2
6. राजकमल पाण्डेय संदेश 5:1
7. सम्पादक की बात वीना माथुर 5:2
8. हे! सृष्टि रचयिता विजय बालू सरडे 6
9. एक और लोकनायक की जरूरत है सागरिका महान्ति 7
10. सकल देशेर सेरा सीमा दास 9
11. नमस्कार का महत्व मंजूबाला महांकुड 10
12. हम आज भी पराधीन हैं चन्द्रभानु साहु 11
13. झूठी शोहरत रजनी बाला लॉली 12
14. आपके नाम रजनी बाला लॉली 12
15. बहुत बड़ा खेल है शिन्दे बंकट 13:1
16. वीर संभूधान फोंगलोसा हमजेन्दी हसनू 13:2
17. अस्पताल की वह रात राजीव यादव 14
18. गजल श्री हरी महल 15:1
19. समपर्ण सुस्मिता नायक 15:2
20. मैं हिन्दी का अध्यापक हूँ वीरेन्द्र कुमार सिंह 16
21. बंगला कविता का सार रूप में अनुवाद सीमा दास 17
22. मैनेजर पांडेय का आलोचना साहित्य संदीप आधार चव्हाण 18
23. चेहरा दीपक आर. चौहान 20
24. यायावर पंछी दीपक आर. चौहान 20
25. तितली दीपक आर. चौहान 20
26. संस्थान में मेरे अनुभव निबेदिता नाथ 21
27. आपातानी की कहानी 23
28. क्यों न दया मरे... प्रतिमा शर्मा 24
29. एक दृश्य ऐसा भी कस्तूरिका दाश 25
30. जब मैं आया पढ़ने यहाँ मानस रंजन दास 26:1
31. याद करेंगे सच्चे दिल से देबराज प्रधान 26:2
32. "मोअत्स त्यौहार" की कहानी इम्वापांगला. एल. इमसोंगू 27
33. 26 जनवरी का इतिहास मंजूबाला महांकुड 28
34. आगत ! स्वागत !! राजीव यादव 29
35. हवा प्रमोद कुमार 30:1
36. सावन आता है गौतम प्रसाद पातर 30:2
37. विकलांगता निवेदिता नाथ 31
38. चेहरा मंजूबाला महांकुड 32
39. नारी समस्या क्यों है भारी तोमर अनीता कुमार जगदीश सिंह 33:1
40. वर्तमान अब्दुल वादुद 33:2
41. बदलते परिवेश... विजय बालू सरडे 34
42. छात्रों की अभिलाषा रूपेश कुमार नायक 36:1
43. पैसा श्री हरि महल 36:2
44. बात मुद्दों की उठाओ कुलदीप शर्मा 37:1
45. शब्दों का जाल अनुजा डेका 37:2
46. राष्ट्रभाषा विभीषण गुरु 37:3
47. ठिकाना राजू कुमार पाण्डेय 38:1
48. जिन्दगी राजू कुमार पाण्डेय 38:1
49. सब कुछ हो तुम सन्तोष कुमार सुना 38:2
50. कथकली विष्णु जी 39
51. चुटकुले रूपेश कुमार नायक 40
52. भारतीय संस्कृति और वास्तविकता बसन्त कुमार विश्वाल 41
53. होली लवाण्य भानू रेखा 42
54. गणतन्त्र दिवस की वह शाम कस्तुरीका दाश 43
55. सूखी प्रतीक्षा संदिप आधार चव्हाण 45
56. भिखारी है या साहूकार संदिप आधार चव्हाण 45
57. भूखे पेट से संदिप आधार चव्हाण 46
58. महाराष्ट्र और मराठी की हकीकत शिंदे बंकटस्वामी बाला साहेब 47
59. प्रकृत-मनुष्य कौन है ? वीरेंद्र कुमार नाग 49
60. रेखा एस. जबीसलाम 50
61. शिक्षणाभ्यास एवं प्रायोगिक कार्य 51
62. भारत स्काउट एवं गाइड प्रशिक्षण शिविर 52
63. स्काउट परिणाम 53
64. गाइड परिणाम 54
65. स्काउट (टैंट निर्माण) 54
66. गाइड (टैंट-निर्माण) 55
67. सांस्कृतिक प्रतियोगिता 55
68. साहित्यिक गतिविधियाँ 57
69. विभागीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ 58
वैयक्तिक औज़ार

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