समन्वय छात्र पत्रिका-2011 पृ-31

ज्ञानकोश से
यहां जाएं: भ्रमण, खोज


विकलांगता


Nibedita Nath.jpg
-निवेदिता नाथ

जीवन क्या है ? यह अपने-आप में एक इतना बड़ा प्रश्न है, जिसका उत्तर सम्भवत: किसी भी व्यक्ति के पास नहीं है और यदि है तो उसके अनेक रूप हमारे सामने दृष्टिगोचर होते हैं। सही एवं सटीक उत्तर के साथ अभी तक शायद किसी भी व्यक्ति का सामना नहीं हुआ, जिसके कारण वह अभी तक समझ नहीं पाया कि सही उत्तर क्या है ?

मनुष्य जीवन अभी तक खोज में लगा ही हुआ था कि उसके सामने प्रलोभनों का पहाड़ खड़ा हो गया और उसी में वह ऐसा उलझा कि उसके मन में, मस्तिष्क में जो प्रश्न अब तक चर-चर कर रहा था कि जीवन क्या है ? वह कहीं खो गया है या छिप गया है और उसके बदले आ गया कि जीवन में सच्चा सुख क्या है ? और इसी की खोज में वह इधर-उधर भटकते-भटकते कहीं दूर निकल गया, जिसके कारण वह यह निर्णय नहीं कर पाता कि क्या सही है और क्या गलत ? इसी एवज में वह ऐसे-ऐसे कार्य कर जाता है, जिसका न तो काई औचित्य होता है और न कोई आवश्यकता। धीरे-धीरे प्रलोभनों एवं काम वासना के कारण वह विकलांग हो जाता है मानसिक रूप से और शारीरिक रूप से, आत्मीय रूप से भी।

मानसिक दुर्बलता को या शारीरिक दुर्बलता को विकलांगता का नाम देते हैं, पर उससे भी अधिक विकलांगता उन मनुष्यों में पाई जाती है जो स्वयं सक्षम होते हुए भी ऐसे काम कर जाते हैं, जो उन्हें विकलांगता की सूची में खड़ा कर देते हैं। ऐसी ही किकलांगता को कहती है हमारी कहानी। हमारी कहानी का पात्र जुगतराम अपने पथ की ओर अग्रसर होता जा रहा था। अंजानी जगह, सुनसान सड़क न कोई राहगीर, सिर्फ वह अपनी मंजिल की ओर कदम बढ़ा रहा था। उसके मन के भीतर अंतर्द्वद्व चल रहा था। शरीर पसीने से तर-बतर हो रहा था। उसके हाथों में चुनचुनाहट-सी हो रही थी। कदम और आगे बढ़ने के बजाय जैसे लग रहा था पीछे की ओर मुड़े जा रहे हैं, फिर भी वह इस अंतर्दशा में आगे बढ़ने की तीव्र इच्छा के साथ अपने कदम आगे बढ़ा रहा था। घने अँधेरे में वह यह तय नहीं कर पा रहा था कि वह अँधेरे को चीर रहा है या फिर अँधेरा उसे चीर रहा है। इसी दशा में वह आगे की और कदम बढ़ाते हुए चला जा रहा था, तभी उसके पाँव किसी चीज से टकराए। वह घबरा गया। यह क्या है ? वह नीचे की ओर देखने लगा। उसे कुछ दिखाई नहीं दिया या फिर उसने जैसे ही अपना दूसरा पांव आगे बढ़ाया ठीक उसी समय उसके पाँव में किसी नरम वस्तु की छुअन महसूस हुई। वह दो कदम पीछे हट गया और दूर हट गया। उसने किसी की आह सूनी तथा किसी की सांसो की उखड़ाहट भी। जुगतराम ने आवाज अगाई "कौन है ?" परन्तु कोई उत्तर नहीं मिला। वह फिर बोला 'कौन है' ? उसके बाद आवाज टूटने के साथ एक शब्द निकल आया "मैं" जुगतराम क्या करे। इधर-उधर टटोलने लगा तथा अँधेरे में फिर उसे दो पत्थर दिखे। उसने पत्थरों को रगड़कर आग जलाने की कोशिश की। सफल रहा। रोशनी के साथ उसने फिर उस तरफ देखा, जिस तरफ से आवाज आ रही थी। उसने उस अंधेरे में ऐसा कुछ देखा, जिसके कारण उसका पूरा शरीर झनझना गया। उसे उल्टी आने लगी। वह उस जगह पर खड़ा भी नहीं रह सका, पर उसने ऐसा क्या देख लिया ? जुगतराम ने प्रलोभनों की विकलांगता का परिचय पा लिया था। उसने देखा एक शरीर, एक मांस पिंड, एक लोथड़ा, सरीसृप जैसा रेंगता हुआ एक शरीर जो अधजला है, अधगला है, जगह-जगह से रिसता जा रहा है। खून, वीभत्सता की प्रतिमूर्ति जो इस प्रकार की प्रतिमूर्ति देख ले वह तो शायद वहीं पर मर जाये। सरीसृप जैसा शरीर, आँखें आगे की ओर निकली हुई, दया की भीख मांगते हुए दो हाथ या दो अधजले पिंड। पर ये कौन है? ये है साँप? नहीं, नहीं! वह रेंगता हुआ साँप नहीं बल्कि मनुष्य रूपी सरीसृप है। साँप बचपन से अनाथ है। वह एक सेठ के यहाँ काम करता था। असका काम था सेठ के परिवार वालों का मनोरंजन करना। एक दिन उसे एक घाव हो गया। उसने मालिक को अपने घाव का इलाज करवाने के लिए कहा, पर मालिक ने सुना ही नहीं ओर उससे अपना काम जारी रखने के लिए कहा। साँप ने वैसा ही किया, क्योकि वह खुद इतना सामर्थ्यवान नहीं था। वह रेंग तो सकता है, पर उसकी परिधि घर की चारदीवारी ही थी। धीरे-धीरे घाव बढ़ने लगा और वह पूरे शरीर में फेलने लगा। एक दिन ऐसा हुआ कि उसने मनोरंजन करना बन्द कर दिया, पर क्या सेठ ने उस पर ध्यान दिया ? नहीं।

एक दिन जब वह अपना खेल नहीं दिखा सका तो सेठ की नाराजगी चरम सीमा पर पहुँच गई और सेठ ने उस पर मिट्टी का तेल डालकर उसे जला दिया। आग से उसका शरीर जल रहा था। वह चिल्ला रहा था। आग से बचाने की वह बार-बार सबसे गुहार कर रहा था, पर उसकी गुहार किसी के कानों तक नहीं पहुँच रही थी। सेठ ने उसे मरा हुआ समझकर जंगल में फिकवा दिया। पर भगवान को यह भी स्वीकार्य नहीं। वह जलने के दो महीने बाद भी जीवित था। रेंगता हुआ, वेदना के स्वर भले ही धीमें हो गए थे, पर समाप्त नहीं हुए। शरीर का नरम लोथड़ा अभी भी चीख-चीखकर कर जिन्दा होने का दावा कर रहा था।

जुगतराम ये सब देखकर डरकर भाग जाता है। जुगतराम जैसे लोगों का डरकर भागना स्वाभाविक नहीं, क्योंकि साँप को रेंगता हुआ सरीसृप तो हमने ही बनाया है।

पारंगत


पीछे जाएँ
30:2
31
32
आगे जाएँ


समन्वय छात्र पत्रिका 2011 अनुक्रम
क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. वाणी वन्दना पं. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' 2:1
2. संस्थान गीत पं. रामेश्वर दयाल दुबे 2:2
3. प्रो. अशोक चक्रधर शुभकामनाएँ 3
4. प्रो. के. बिजय कुमार शुभकामनाएँ 4:1
5. डॉ.चंद्रकांत त्रिपाठी शुभकामनाएँ 4:2
6. राजकमल पाण्डेय संदेश 5:1
7. सम्पादक की बात वीना माथुर 5:2
8. हे! सृष्टि रचयिता विजय बालू सरडे 6
9. एक और लोकनायक की जरूरत है सागरिका महान्ति 7
10. सकल देशेर सेरा सीमा दास 9
11. नमस्कार का महत्व मंजूबाला महांकुड 10
12. हम आज भी पराधीन हैं चन्द्रभानु साहु 11
13. झूठी शोहरत रजनी बाला लॉली 12
14. आपके नाम रजनी बाला लॉली 12
15. बहुत बड़ा खेल है शिन्दे बंकट 13:1
16. वीर संभूधान फोंगलोसा हमजेन्दी हसनू 13:2
17. अस्पताल की वह रात राजीव यादव 14
18. गजल श्री हरी महल 15:1
19. समपर्ण सुस्मिता नायक 15:2
20. मैं हिन्दी का अध्यापक हूँ वीरेन्द्र कुमार सिंह 16
21. बंगला कविता का सार रूप में अनुवाद सीमा दास 17
22. मैनेजर पांडेय का आलोचना साहित्य संदीप आधार चव्हाण 18
23. चेहरा दीपक आर. चौहान 20
24. यायावर पंछी दीपक आर. चौहान 20
25. तितली दीपक आर. चौहान 20
26. संस्थान में मेरे अनुभव निबेदिता नाथ 21
27. आपातानी की कहानी 23
28. क्यों न दया मरे... प्रतिमा शर्मा 24
29. एक दृश्य ऐसा भी कस्तूरिका दाश 25
30. जब मैं आया पढ़ने यहाँ मानस रंजन दास 26:1
31. याद करेंगे सच्चे दिल से देबराज प्रधान 26:2
32. "मोअत्स त्यौहार" की कहानी इम्वापांगला. एल. इमसोंगू 27
33. 26 जनवरी का इतिहास मंजूबाला महांकुड 28
34. आगत ! स्वागत !! राजीव यादव 29
35. हवा प्रमोद कुमार 30:1
36. सावन आता है गौतम प्रसाद पातर 30:2
37. विकलांगता निवेदिता नाथ 31
38. चेहरा मंजूबाला महांकुड 32
39. नारी समस्या क्यों है भारी तोमर अनीता कुमार जगदीश सिंह 33:1
40. वर्तमान अब्दुल वादुद 33:2
41. बदलते परिवेश... विजय बालू सरडे 34
42. छात्रों की अभिलाषा रूपेश कुमार नायक 36:1
43. पैसा श्री हरि महल 36:2
44. बात मुद्दों की उठाओ कुलदीप शर्मा 37:1
45. शब्दों का जाल अनुजा डेका 37:2
46. राष्ट्रभाषा विभीषण गुरु 37:3
47. ठिकाना राजू कुमार पाण्डेय 38:1
48. जिन्दगी राजू कुमार पाण्डेय 38:1
49. सब कुछ हो तुम सन्तोष कुमार सुना 38:2
50. कथकली विष्णु जी 39
51. चुटकुले रूपेश कुमार नायक 40
52. भारतीय संस्कृति और वास्तविकता बसन्त कुमार विश्वाल 41
53. होली लवाण्य भानू रेखा 42
54. गणतन्त्र दिवस की वह शाम कस्तुरीका दाश 43
55. सूखी प्रतीक्षा संदिप आधार चव्हाण 45
56. भिखारी है या साहूकार संदिप आधार चव्हाण 45
57. भूखे पेट से संदिप आधार चव्हाण 46
58. महाराष्ट्र और मराठी की हकीकत शिंदे बंकटस्वामी बाला साहेब 47
59. प्रकृत-मनुष्य कौन है ? वीरेंद्र कुमार नाग 49
60. रेखा एस. जबीसलाम 50
61. शिक्षणाभ्यास एवं प्रायोगिक कार्य 51
62. भारत स्काउट एवं गाइड प्रशिक्षण शिविर 52
63. स्काउट परिणाम 53
64. गाइड परिणाम 54
65. स्काउट (टैंट निर्माण) 54
66. गाइड (टैंट-निर्माण) 55
67. सांस्कृतिक प्रतियोगिता 55
68. साहित्यिक गतिविधियाँ 57
69. विभागीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ 58
वैयक्तिक औज़ार

संस्करण
क्रियाएं
सुस्वागतम्
सहायता