समन्वय छात्र पत्रिका-2011 पृ-41

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भारतीय संस्कृति और वास्तविकता

-बसन्त कुमार विश्वाल

सुप्त घरती निद्रा त्याग कर दिवस के आगमन में झूम रही थी। रवि की लाल आभा ने पूर्व दिशा को लाल वर्णों से भर दिया था। चारों ओर पक्षियों की चह-चहाट गूँज रही थी। इस व्यस्त बहुल संसार में सारे अपने-अपने कर्म-पथ की ओर अग्रसर होने की तैयारी कर रहे थे। अपनी 4 मंजिल वाली इमारत के सामने आँगन में चाय की प्याली के साथ बैठे हुए थे गजाधर बाबू। पास में खड़े हुए थे उनके व्यक्तिगत सचिव। वे अखबार का पन्ना झाँक रहे थे और शाम की सभा के लिए तैयारियाँ कर रहे थे। ऐसे भी गजाधर जी अच्छे वक्ता के रूप में सारे मोहल्ले में ख्यात हो चुके थे। किसी भी घटना को सही अभिव्यक्ति देने में माहिर थे गजाधर बाबू। अखबार के हर पन्ने के साथ खबरों पर आंख घुमा रहे थे, जहाँ से शाम को बोलने के लिए विषय भी मिलता जा रहा था। अखबार के हर पन्ने में ज्यादातर अपराध (चोरी, दुर्गति, भ्रष्टाचार, आंतकवाद, नकसलवाद, बलात्कार) की खबरें थीं, जो आज के युग में हर दिन घटित होती हैं।

शाम के छह बजे सभा में काफी संख्या में लाग मौजूद थे। सभा शुरू हुई, एक के बाद एक ने अपने-अपने वक्त्तव्य रखे। सभा के लोग सभी वक्त्ताओं को सुन रहे थे और तालियों की झड़ी लगा रहे थे। जब गजाधर जी बोलने लगे तो सभा की स्थिति गम्भीर हो गई। विषय भी गम्भीर था। किस तरह भारतीय संस्कृति निम्नमुखी होती जा रही है, किस प्रकार हमारी संस्कृति जो पहले सारे विश्व को शान्ति का सन्देश देती आयी है, जो सारे विश्व में निराली है। आज कई प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त है और दिन-पर-दिन कलुषित होती जा रही है। जिस देश में गंगा जैसी पवित्र नदी की धारा बहती थी, उसी देश में नदियों का जल प्रदूषित हाने के कारण लोग कई बीमारियों से ग्रस्त हैं। शान्ति की जगह हत्या, दुर्गति और व्यभिचार चारों तरफ फैला हुआ है। सभा के सारे लोग मग्न हो गये, चिन्तन में डूब गये। सभी सोचने लगे कि आखिर हम कहाँ से कहाँ पहुँच गये। शायद हम लोग गलत रास्ते की और भटकते जा रहे हैं। सभी गजाधर जी की तारीफ करने लगे और लोगों की प्रशंसा पाकर गजाधर जी ने बिगड़ी हुई संस्कृति को सही करने के लिए दो चार बड़ी-बड़ी बातें की।

अब आप लोग भी चिंतित हो गये होंगे, लेकिन चिंतित होने की बात नहीं है। हमारे देश में ऐसी सभाएँ अक्सर होती रहती हैं, जहाँ गजाधर जैसे बड़े वक्ता बड़ी-बड़ी बातें करके लोगों की वाहवाही लेने जाते हैं। बस सभा के बाहर फिर अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए लगे रहते हैं। अब लगभग कई लोगों के पास वाक् शक्ति जैसा साधन मिल गया है, जिसके सहारे बड़ी-बड़ी बातें करके प्रशंसा पाने का हकदार बन जाते हैं। गजाधर बाबू जैसे आदमी उनके लिए देश तथा संस्कृति संबंधी बातें सिर्फ बाहरी दिखावा होती हैं।

अब सवाल यह उठता है कि ऐसी सभा करके संस्कृति संबंधी बड़ी-बड़ी बातें करने में हम लोगों को क्या लाभ होगा। जहाँ आधे लोग भर पेट खाने को नहीं पाते हैं, जिस देश में बीस प्रतिशत बच्चों की जिन्दगी प्लेटफार्म पर बीतती है। जहाँ बूढ़ा पिता बिस्तर पर लेटकर दवाई के लिए अपने बेटे का इंतजार कर रहा होता है। उसी देश में लोग आसमान को छूने वाले प्रासाद निर्माण करके, अपने माँ-बाप को अकेला छोड़कर अपने को सभ्य और सुसंस्कृत कहलाते हैं। पाश्चात्यीकरण की आग में कूदकर अपनों को देश का रक्षक कहलाते हैं। क्या सच में वे लोग हमारी संस्कृति का गौरव बढ़ा रहे हैं ? 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का मंत्र देने वाले हमारे देश में घर से निकलने में लोग डरते हैं, कहीं क्या कुछ हो जाय। अपने को सभ्य तथा सुसंस्कृत कहने वाले कई भारतीय लोग जब दूसरी महिलाओं के साथ ऐसी पार्टियों में मिलते है, जहाँ महिलाएँ अंग छिपाने के विपरीत अंग दिखाने की होड़ में व्यस्त हैं। वहाँ हमारी संस्कृति को क्या हम गौरवपूर्ण कहेंगे।

हमेशा मेरे मन में एक बात खटकती रही है कि आखिर इस अवस्था के लिए जिम्मेदार कौन है ? क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक सुरक्षित तथा स्वस्थ परंपरा देने में कामयाब हो पायेंगे ? वास्तविकता यह है कि हम लोग तो खुद सुरक्षित नहीं हैं। नक्सल या आंतकवाद जैसी समस्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। हर कदम पर कुछ घट जाने की आशंका हमें आगे बढ़ने नहीं देती। हमारे पूर्वजों की दी हुई देन से हम खुद ही हाथ धो डाल रहे हैं। हमने कभी भी अपने को तथा समाज को सुधारने की कोशिश नहीं की है। हमारी इस अवस्था के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं। जिस समय बच्चों का चरित्र निर्माण करना होता है। उन्हें अनुशासन की जगह पर छोटी पोशाक पहनाना सिखाते हैं। अपनी संस्कृति को खुद बिगाड़ते रहते हैं। मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि हमारी आने वाली पीढ़ी यह न कहे कि हमारे पूर्वज आयोग्य और अकर्मण्य थे।

देश तथा संस्कृति की आज की इस अवस्था के लिए हमें अपने आप को जिम्मेदार ठहराकर उससे निपटने की कोशिश करनी चाहिए। जब तक हम नहीं सुधरेंगे, पाश्चात्यीकरण के नाम पर अश्लीलता ओर छोटी पोशाक पहनने का अभ्यास त्याग न देंगे, तब तक हम सच्चे भारतीय होने का दावा नहीं कर सकते और तब तक ऐसी झूठी भाषणबाजी से देश का कोई भी परिवर्तन होना असम्भव है। एक स्वस्थ तथा सुसंस्कृत भारत का निर्माण करने में, जहाँ केवल शान्ति होगी, धर्म होगा और एक निराली संस्कृति होगी, हमें अपने आपको सुधारना होगा। तभी एक सच्चे व्यक्ति से सच्चा परिवार, सच्चा समाज तथा सच्चा राष्ट्र बन पाएगा। सभी भारतीयों की सच्चाई और ईमानदारी से भारत पुन: अपना पूर्व गौरव प्राप्त करेगा और सभी भारतीयों की बोली कोयल जैसी मीठी होगी। तब हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए एक सुरक्षित तथा सुन्दर भारत अर्पित करने में काययाब हो जाएँगे।

आइए, हम सब मिलकर एक ऐसे भारत का निर्माण करें, जहाँ केवल शान्ति होगी, धर्म होगा, न्याय होगा, और प्लेटफार्म पर घूमते बच्चे विद्यालय में राष्ट्रध्वज के नीचे एकत्रित होकर राष्ट्रगान गा रहे होंगे।

पारंगत


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समन्वय छात्र पत्रिका 2011 अनुक्रम
क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. वाणी वन्दना पं. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' 2:1
2. संस्थान गीत पं. रामेश्वर दयाल दुबे 2:2
3. प्रो. अशोक चक्रधर शुभकामनाएँ 3
4. प्रो. के. बिजय कुमार शुभकामनाएँ 4:1
5. डॉ.चंद्रकांत त्रिपाठी शुभकामनाएँ 4:2
6. राजकमल पाण्डेय संदेश 5:1
7. सम्पादक की बात वीना माथुर 5:2
8. हे! सृष्टि रचयिता विजय बालू सरडे 6
9. एक और लोकनायक की जरूरत है सागरिका महान्ति 7
10. सकल देशेर सेरा सीमा दास 9
11. नमस्कार का महत्व मंजूबाला महांकुड 10
12. हम आज भी पराधीन हैं चन्द्रभानु साहु 11
13. झूठी शोहरत रजनी बाला लॉली 12
14. आपके नाम रजनी बाला लॉली 12
15. बहुत बड़ा खेल है शिन्दे बंकट 13:1
16. वीर संभूधान फोंगलोसा हमजेन्दी हसनू 13:2
17. अस्पताल की वह रात राजीव यादव 14
18. गजल श्री हरी महल 15:1
19. समपर्ण सुस्मिता नायक 15:2
20. मैं हिन्दी का अध्यापक हूँ वीरेन्द्र कुमार सिंह 16
21. बंगला कविता का सार रूप में अनुवाद सीमा दास 17
22. मैनेजर पांडेय का आलोचना साहित्य संदीप आधार चव्हाण 18
23. चेहरा दीपक आर. चौहान 20
24. यायावर पंछी दीपक आर. चौहान 20
25. तितली दीपक आर. चौहान 20
26. संस्थान में मेरे अनुभव निबेदिता नाथ 21
27. आपातानी की कहानी 23
28. क्यों न दया मरे... प्रतिमा शर्मा 24
29. एक दृश्य ऐसा भी कस्तूरिका दाश 25
30. जब मैं आया पढ़ने यहाँ मानस रंजन दास 26:1
31. याद करेंगे सच्चे दिल से देबराज प्रधान 26:2
32. "मोअत्स त्यौहार" की कहानी इम्वापांगला. एल. इमसोंगू 27
33. 26 जनवरी का इतिहास मंजूबाला महांकुड 28
34. आगत ! स्वागत !! राजीव यादव 29
35. हवा प्रमोद कुमार 30:1
36. सावन आता है गौतम प्रसाद पातर 30:2
37. विकलांगता निवेदिता नाथ 31
38. चेहरा मंजूबाला महांकुड 32
39. नारी समस्या क्यों है भारी तोमर अनीता कुमार जगदीश सिंह 33:1
40. वर्तमान अब्दुल वादुद 33:2
41. बदलते परिवेश... विजय बालू सरडे 34
42. छात्रों की अभिलाषा रूपेश कुमार नायक 36:1
43. पैसा श्री हरि महल 36:2
44. बात मुद्दों की उठाओ कुलदीप शर्मा 37:1
45. शब्दों का जाल अनुजा डेका 37:2
46. राष्ट्रभाषा विभीषण गुरु 37:3
47. ठिकाना राजू कुमार पाण्डेय 38:1
48. जिन्दगी राजू कुमार पाण्डेय 38:1
49. सब कुछ हो तुम सन्तोष कुमार सुना 38:2
50. कथकली विष्णु जी 39
51. चुटकुले रूपेश कुमार नायक 40
52. भारतीय संस्कृति और वास्तविकता बसन्त कुमार विश्वाल 41
53. होली लवाण्य भानू रेखा 42
54. गणतन्त्र दिवस की वह शाम कस्तुरीका दाश 43
55. सूखी प्रतीक्षा संदिप आधार चव्हाण 45
56. भिखारी है या साहूकार संदिप आधार चव्हाण 45
57. भूखे पेट से संदिप आधार चव्हाण 46
58. महाराष्ट्र और मराठी की हकीकत शिंदे बंकटस्वामी बाला साहेब 47
59. प्रकृत-मनुष्य कौन है ? वीरेंद्र कुमार नाग 49
60. रेखा एस. जबीसलाम 50
61. शिक्षणाभ्यास एवं प्रायोगिक कार्य 51
62. भारत स्काउट एवं गाइड प्रशिक्षण शिविर 52
63. स्काउट परिणाम 53
64. गाइड परिणाम 54
65. स्काउट (टैंट निर्माण) 54
66. गाइड (टैंट-निर्माण) 55
67. सांस्कृतिक प्रतियोगिता 55
68. साहित्यिक गतिविधियाँ 57
69. विभागीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ 58
वैयक्तिक औज़ार

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