समन्वय छात्र पत्रिका-2011 पृ-49

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प्रकृत-मनुष्य कौन है ?

-वीरेंद्र कुमार नाग
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ईश्वर का विश्व परिवार, प्राणियों, जीव-जन्तु, जल, वायु को लेकर बना है। संसार के प्राणियों में से मानव ही सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। मनुष्य के श्रेष्ठ होने पर भी वह अपने अन्दर छल-कपट, भ्रष्टाचार, अन्याय, अत्याचार आदि अवगुण भरे हैं। वर्तमान आधुनिक युग की प्राचीन तथा आध्यात्मिक युग के साथ तुलना की जाये तो बहुत अंतर मिलता है। आधुनिक युग के प्रगति की दौड़ में इतना आगे होने पर भी वह आज के समाज के लिए उतना ही एक अभिशाप है।

प्राचीन युग के मनुष्य के हृदय में सद्भाव, आज्ञाकारी, परोपकार, सहनशीलता, कार्त्तव्यनिष्ठा आदि गुण भरपूर मात्रा में थे, लेकिन आज के युग में क्या हो रहा है ? व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए अपने माता-पिता को भी भूल जाता है। निजी स्वार्थ में वह इतना नीच हो जाता है कि उसे किसी की हत्या करनी पडे़ तो वह पीछे नहीं हटता। संसार के ऐतिहासिक खलनायकों के अवगुणों को अपनाकर वह ऐसे कुकर्मों में अपने को समाहित करता है, लेकिन वह कभी नायकों के गुण को अपनाना नहीं चाहता। हमारे देश में महात्मा गाँधी, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस जैसे महापुरुष थे, जो कभी भी अपने स्वार्थ के बारे में नहीं सोचते थे। उन्होंने हमेशा दूसरों के हित, समाज तथा देश के लिए नि:स्वार्थ भाव से सेवा कर हँस-हँस कर अपने जीवन का बलिदान दिया है। वे अपनी आने वाली पीढ़ी को देशभक्ति की भावना, अन्याय के प्रति विरोध करना, समाज सेवा करना आदि की शिक्षा प्रदान करके खुद एक उदाहरण बने हैं।

वर्तमान समाज में जो भी जन्म ले रहे हैं, इनमें ज्यादा से ज्यादा मानवरूपी शैतान हैं, जो आपने समाज के भ्रष्टाचार की जड़ हैं। उनके पास स्नेह, सत्य, शक्ति, दया, क्षमा और मधुर वाणी का कोई स्थान नहीं है बल्कि भरी है स्वार्थपरता, ईर्ष्या, अहंकार आदि अनैतिक कार्य। ऐसे व्यक्ति पशु तुल्य हैं।

मनुष्य हर समय अपने को बहुत बड़ा वीर समझता है। वह किसी से डरता नहीं। उसके पास न तो मनुष्यत्व है और न मानवता के गुण। पाश्विक अत्याचार के भाव भरे हैं। बड़ी-बड़ी डिग्रीयाँ होने पर भी अगर उनके पास मानवता के गुण नहीं हैं तो उन्हें वास्तव में शिक्षित व्यक्ति तथा प्रकृत मानव नहीं कहा जा सकता है, जैसे-एक नारी अति सुन्दर होने के बावजूद भी अगर उसके हृदय में दया, स्नेह, वात्सल्य, श्रद्धाभाव, सतीत्व नहीं है तो वह वास्तव में नारी नहीं कहलाती। उसके सौंदर्य के होने का कोई मूल्य नहीं है। इसलिए ऐसा सौंदर्य भी मनुष्य के चरित्र को, उनके हृदय को निर्मल नहीं कर पाता न ही परिवर्तन। एक समय था कि जब मनुष्य अपने मधुर आचरण, स्वभाव के द्वारा दूसरों के मन में अमृत भर देता था। वह दूसरे के हित के लिए दु:ख, कष्ट को हँसकर अपना लेता था। मीठी वाणी बोलकर हृदय में अपना स्थान बना लेता था। लेकिन आज का मनुष्य सब कुछ भूल गया है। केवल उससे दिखाई दे रहा है सिर्फ अपना स्वार्थ। मनुष्य का विषाक्त व्यवहार परिवेश को दूषित कर समाज को कलंकित कर रहा है।

वास्तव में जिसके पास निर्मल हृदय, सत्य, आदर्श, स्नेहशीलता, भ्रातृभाव तथा अमृतवाणी नहीं है तो उसे प्रकृत मनुष्य नहीं कहा जाता। वे मनुष्यरूप राक्षस हैं आपस में भ्रातृभाव रखकर सत्य के पथ पर चलना, अपने मन के कुविचार को त्याग कर हृदय में मधुरता, उच्च आशा तथा आदर्श चरित्र की स्थापना करना ही प्रकृत मनुष्य का कर्त्तव्य है, जो मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखता है तथा जिसके हृदय में प्रत्येक व्यक्ति के लिए समानता का भाव है तथा जो दूसरों को सम्मान देना जानता है, उसे वास्तव में मनुष्य कहा जाता है।

हम सब मानव जाति के होने के बावजूद धर्म, जाति, वर्ण, ऊँच-नीच, भेदभाव से घिरे हुए हैं, जबकि अनेकता में एकता सजाने वाला मानव धर्म ही मानवता का प्रतीक है। वास्वत में हम उसे सर्वश्रेष्ठ मानव कहेंगे जो मानव धर्म का पालन करे...।

-प्रवीण


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समन्वय छात्र पत्रिका 2011 अनुक्रम
क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. वाणी वन्दना पं. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' 2:1
2. संस्थान गीत पं. रामेश्वर दयाल दुबे 2:2
3. प्रो. अशोक चक्रधर शुभकामनाएँ 3
4. प्रो. के. बिजय कुमार शुभकामनाएँ 4:1
5. डॉ.चंद्रकांत त्रिपाठी शुभकामनाएँ 4:2
6. राजकमल पाण्डेय संदेश 5:1
7. सम्पादक की बात वीना माथुर 5:2
8. हे! सृष्टि रचयिता विजय बालू सरडे 6
9. एक और लोकनायक की जरूरत है सागरिका महान्ति 7
10. सकल देशेर सेरा सीमा दास 9
11. नमस्कार का महत्व मंजूबाला महांकुड 10
12. हम आज भी पराधीन हैं चन्द्रभानु साहु 11
13. झूठी शोहरत रजनी बाला लॉली 12
14. आपके नाम रजनी बाला लॉली 12
15. बहुत बड़ा खेल है शिन्दे बंकट 13:1
16. वीर संभूधान फोंगलोसा हमजेन्दी हसनू 13:2
17. अस्पताल की वह रात राजीव यादव 14
18. गजल श्री हरी महल 15:1
19. समपर्ण सुस्मिता नायक 15:2
20. मैं हिन्दी का अध्यापक हूँ वीरेन्द्र कुमार सिंह 16
21. बंगला कविता का सार रूप में अनुवाद सीमा दास 17
22. मैनेजर पांडेय का आलोचना साहित्य संदीप आधार चव्हाण 18
23. चेहरा दीपक आर. चौहान 20
24. यायावर पंछी दीपक आर. चौहान 20
25. तितली दीपक आर. चौहान 20
26. संस्थान में मेरे अनुभव निबेदिता नाथ 21
27. आपातानी की कहानी 23
28. क्यों न दया मरे... प्रतिमा शर्मा 24
29. एक दृश्य ऐसा भी कस्तूरिका दाश 25
30. जब मैं आया पढ़ने यहाँ मानस रंजन दास 26:1
31. याद करेंगे सच्चे दिल से देबराज प्रधान 26:2
32. "मोअत्स त्यौहार" की कहानी इम्वापांगला. एल. इमसोंगू 27
33. 26 जनवरी का इतिहास मंजूबाला महांकुड 28
34. आगत ! स्वागत !! राजीव यादव 29
35. हवा प्रमोद कुमार 30:1
36. सावन आता है गौतम प्रसाद पातर 30:2
37. विकलांगता निवेदिता नाथ 31
38. चेहरा मंजूबाला महांकुड 32
39. नारी समस्या क्यों है भारी तोमर अनीता कुमार जगदीश सिंह 33:1
40. वर्तमान अब्दुल वादुद 33:2
41. बदलते परिवेश... विजय बालू सरडे 34
42. छात्रों की अभिलाषा रूपेश कुमार नायक 36:1
43. पैसा श्री हरि महल 36:2
44. बात मुद्दों की उठाओ कुलदीप शर्मा 37:1
45. शब्दों का जाल अनुजा डेका 37:2
46. राष्ट्रभाषा विभीषण गुरु 37:3
47. ठिकाना राजू कुमार पाण्डेय 38:1
48. जिन्दगी राजू कुमार पाण्डेय 38:1
49. सब कुछ हो तुम सन्तोष कुमार सुना 38:2
50. कथकली विष्णु जी 39
51. चुटकुले रूपेश कुमार नायक 40
52. भारतीय संस्कृति और वास्तविकता बसन्त कुमार विश्वाल 41
53. होली लवाण्य भानू रेखा 42
54. गणतन्त्र दिवस की वह शाम कस्तुरीका दाश 43
55. सूखी प्रतीक्षा संदिप आधार चव्हाण 45
56. भिखारी है या साहूकार संदिप आधार चव्हाण 45
57. भूखे पेट से संदिप आधार चव्हाण 46
58. महाराष्ट्र और मराठी की हकीकत शिंदे बंकटस्वामी बाला साहेब 47
59. प्रकृत-मनुष्य कौन है ? वीरेंद्र कुमार नाग 49
60. रेखा एस. जबीसलाम 50
61. शिक्षणाभ्यास एवं प्रायोगिक कार्य 51
62. भारत स्काउट एवं गाइड प्रशिक्षण शिविर 52
63. स्काउट परिणाम 53
64. गाइड परिणाम 54
65. स्काउट (टैंट निर्माण) 54
66. गाइड (टैंट-निर्माण) 55
67. सांस्कृतिक प्रतियोगिता 55
68. साहित्यिक गतिविधियाँ 57
69. विभागीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ 58
वैयक्तिक औज़ार

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