समन्वय छात्र पत्रिका-2011 पृ-7

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एक और लोकनायक की जरूरत है

-सागरिका महान्ति


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समाज का सदैव से ही यही नियम रहा है कि समाज व्यक्ति के पीछे चलता है। जब-जब समाज विरोधी तत्व बढ़ जाते हैं, तभी उनका विरोध करने के लिए कोई न कोई महापुरुष समाज के समक्ष आ जाता है। तुलसीदास ने भी कहा है-

जब-जब होहि धरम की हानि
बड़हिं असूर महा अभिमानी
तब-तब धरि प्रभु मनुज सरीरा
हरहिं सकल सज्जन भव पीरा।


इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुकी मानव सभ्यता के विकास ने नये कीर्तिमान स्थापित किए हैं। परन्तु विकास के मायने विडंबना से ग्रस्त हैं। हमारे समाज में लूट-खसौट, जातिगत ऊँच-नीच की भावना आज भी यूँ की यूँ बरकरार है। एक-दूसरे के हक को हड़पने की प्रवृति ने आज भी पीछा नहीं छोड़ा है। इस समाज में एक और लोकनायक की जरूरत है। समाज का पुनरूद्धार समय की माँग है। वैसे तो आवश्यकतानुसार और परिस्थितिजन्य कारणों से बहूत सारे लोकनायकों का आविर्भाव हुआ है। गौतम बुद्ध हों या फिर तुलसीदास हों, महात्मा गांधी हों या फिर स्वामी विवेकानंद हों, आप जिनका भी उदाहरण ले लें, तो देखने को मिलेगा कि तत्कालीन समाज कुरीतियों और कुसंस्कारों के गड्ढे में फँस गया था। भले ही धर्म हो या भगवान की भक्ति ही क्यों न हो, यह सब उस समय समाज की कालिमा बन गये थे। पर आज की स्थिति क्या है ?

आधुनिक युग को विज्ञान का युग कहा जाता है। मनुष्य अपनी सद्भावना और आविष्कारों के कारण अपने आपको श्रेष्ठ समझता है। वेदों में लिखी गई मानव की श्रेष्ठता को मनुष्य आज चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि मानव ही संसार में श्रेष्ठ प्राणि है। पर क्या यह सच है ? मानव क्या सच में श्रेष्ठता का अधिकारी है? हजारों साल पहले कही गई बात की सत्यता की क्या आज परीक्षा की जाए या कुछ बनावटी और ऊपरी बातों से ही इसको प्रमाणित कर दिया जाए। मानव आज अपनी मानवनता का गला घोंट कर भी मानव होने का दावा कर रहा है। समस्त मानवोचित गुणों को भुलाकर उसने मनुष्यत्व को ही खो दिया है। आज उसके मन में केवल व्यक्तिगत स्वार्थ ने घर कर लिया है। उसने समस्त संसार को भुलाकर सिर्फ अपने आपको ही सर्वोपरि माना है। यह सब करने से ये या फिर गला फाड़कर चिल्लाने से क्या सच्चाई छुप जाएगी या फिर इसकी सत्यता साबित हो जाएगी।

आज समाज की स्थिति क्या है? यह एक सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह है। आज के युग के श्रेष्ठ प्राणी मानव के पास क्या इन सवालों का कोई जवाब है। समाज विकास की नहीं अधोगति की और जा रहा है। भगवान बुद्ध के समय में तो केवल समाज में धर्मांधता थी और लोकनायक तुलसीदास के समय समाज का कोई आदर्श रूप नहीं था, पर आज समाज में न जाने ऐसे कितने ही काले धब्बे हैं, जिनकी गिनती करते-करते थक जाएँगे पर गिनती समाप्त नहीं होगी। समाज में तो अत्याचार और शोषण ने घर कर लिया है। धोखेबाजी और लूट, बेइमानी, समाज की पहचान बने हुए हैं। मानव आज अपनी ही मानव जाती पर शोषण कर रहा है। कोई पशु भी ये काम न करे जो मानव कर रहा है। अपने उच्च व्यक्तित्व का तो काई मोल ही नहीं है। उसे वह तो झूठी इज्जत और ऐशोआराम को ही अपना सब कुछ मानता है। यहाँ तक कि जिस भगवान ने उसे बनाया है, उसी को बेच रहा है। उसी भगवान की आड़ में दुनिया को धोखा दे रहा है। धर्म और स्वार्थ के नाम पर समाज को टुकड़ों में बाँट दिया है।


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समन्वय छात्र पत्रिका 2011 अनुक्रम
क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. वाणी वन्दना पं. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' 2:1
2. संस्थान गीत पं. रामेश्वर दयाल दुबे 2:2
3. प्रो. अशोक चक्रधर शुभकामनाएँ 3
4. प्रो. के. बिजय कुमार शुभकामनाएँ 4:1
5. डॉ.चंद्रकांत त्रिपाठी शुभकामनाएँ 4:2
6. राजकमल पाण्डेय संदेश 5:1
7. सम्पादक की बात वीना माथुर 5:2
8. हे! सृष्टि रचयिता विजय बालू सरडे 6
9. एक और लोकनायक की जरूरत है सागरिका महान्ति 7
10. सकल देशेर सेरा सीमा दास 9
11. नमस्कार का महत्व मंजूबाला महांकुड 10
12. हम आज भी पराधीन हैं चन्द्रभानु साहु 11
13. झूठी शोहरत रजनी बाला लॉली 12
14. आपके नाम रजनी बाला लॉली 12
15. बहुत बड़ा खेल है शिन्दे बंकट 13:1
16. वीर संभूधान फोंगलोसा हमजेन्दी हसनू 13:2
17. अस्पताल की वह रात राजीव यादव 14
18. गजल श्री हरी महल 15:1
19. समपर्ण सुस्मिता नायक 15:2
20. मैं हिन्दी का अध्यापक हूँ वीरेन्द्र कुमार सिंह 16
21. बंगला कविता का सार रूप में अनुवाद सीमा दास 17
22. मैनेजर पांडेय का आलोचना साहित्य संदीप आधार चव्हाण 18
23. चेहरा दीपक आर. चौहान 20
24. यायावर पंछी दीपक आर. चौहान 20
25. तितली दीपक आर. चौहान 20
26. संस्थान में मेरे अनुभव निबेदिता नाथ 21
27. आपातानी की कहानी 23
28. क्यों न दया मरे... प्रतिमा शर्मा 24
29. एक दृश्य ऐसा भी कस्तूरिका दाश 25
30. जब मैं आया पढ़ने यहाँ मानस रंजन दास 26:1
31. याद करेंगे सच्चे दिल से देबराज प्रधान 26:2
32. "मोअत्स त्यौहार" की कहानी इम्वापांगला. एल. इमसोंगू 27
33. 26 जनवरी का इतिहास मंजूबाला महांकुड 28
34. आगत ! स्वागत !! राजीव यादव 29
35. हवा प्रमोद कुमार 30:1
36. सावन आता है गौतम प्रसाद पातर 30:2
37. विकलांगता निवेदिता नाथ 31
38. चेहरा मंजूबाला महांकुड 32
39. नारी समस्या क्यों है भारी तोमर अनीता कुमार जगदीश सिंह 33:1
40. वर्तमान अब्दुल वादुद 33:2
41. बदलते परिवेश... विजय बालू सरडे 34
42. छात्रों की अभिलाषा रूपेश कुमार नायक 36:1
43. पैसा श्री हरि महल 36:2
44. बात मुद्दों की उठाओ कुलदीप शर्मा 37:1
45. शब्दों का जाल अनुजा डेका 37:2
46. राष्ट्रभाषा विभीषण गुरु 37:3
47. ठिकाना राजू कुमार पाण्डेय 38:1
48. जिन्दगी राजू कुमार पाण्डेय 38:1
49. सब कुछ हो तुम सन्तोष कुमार सुना 38:2
50. कथकली विष्णु जी 39
51. चुटकुले रूपेश कुमार नायक 40
52. भारतीय संस्कृति और वास्तविकता बसन्त कुमार विश्वाल 41
53. होली लवाण्य भानू रेखा 42
54. गणतन्त्र दिवस की वह शाम कस्तुरीका दाश 43
55. सूखी प्रतीक्षा संदिप आधार चव्हाण 45
56. भिखारी है या साहूकार संदिप आधार चव्हाण 45
57. भूखे पेट से संदिप आधार चव्हाण 46
58. महाराष्ट्र और मराठी की हकीकत शिंदे बंकटस्वामी बाला साहेब 47
59. प्रकृत-मनुष्य कौन है ? वीरेंद्र कुमार नाग 49
60. रेखा एस. जबीसलाम 50
61. शिक्षणाभ्यास एवं प्रायोगिक कार्य 51
62. भारत स्काउट एवं गाइड प्रशिक्षण शिविर 52
63. स्काउट परिणाम 53
64. गाइड परिणाम 54
65. स्काउट (टैंट निर्माण) 54
66. गाइड (टैंट-निर्माण) 55
67. सांस्कृतिक प्रतियोगिता 55
68. साहित्यिक गतिविधियाँ 57
69. विभागीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ 58
वैयक्तिक औज़ार

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