समन्वय छात्र पत्रिका-2012 पृ-3

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स्वामी विवेकानन्द का शैक्षिक चिंतन

धनंजय लहामगे
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'वसुधैव कुटुंबकम्' की संकल्पना ने पूरे विश्व को एक श्रृंखला में बद्ध करने का प्रयास किया है। इस विचार को अगर वास्तविकता में लाना है तो अपनी शिक्षा से सम्बन्धित चिंतन को व्यापकता देनी होगी। शिक्षा का क्षेत्र ही एकमात्र है, जो विश्व को एकता में बद्ध करेगा। भारतीय मनीषियों, शिक्षाशास्त्रियों और भारतीय दार्शनिकों ने दूरदर्शिता से, शिक्षा द्वारा भारत का विकास किया। भारत की शिक्षा के क्षेत्र में श्रेष्ठता प्राप्त करने में निम्न विद्वानों का योगदान प्रमुख माना गया है-



  1. रवींद्रनाथ टैगोर
  2. श्री अरविंद घोष
  3. महात्मा गांधी जी
  4. विनोवा भावे
  5. डॉ. जाकिर हुसैन
  6. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
  7. लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक
  8. युवा पुरुष विवेकानन्द

संपूर्ण विश्व में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिलेगा, जिसने स्वामी विवेकानन्द का नाम नहीं सुना हो। आधुनिक भारत में युवा पुरुष के रूप में जिनका उल्लेख किया जाता है, वे स्वामी विवेकानन्द वेदांत और पाश्चात्य शिक्षा दोनों को साथ रखकर शिक्षा को आगे की ओर लाना चाहते थे। शिक्षा के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण उनका था। स्वामी विवेकानन्द का लक्ष्य समाज सेवा, जनशिक्षा, धार्मिक पुनरूत्थान और शिक्षा के द्वारा जागरुकता लाना, मानव की सेवा आदि था। शिक्षा से अगर सामाजिक परिवर्तन आता है, तो स्वामी जी के शिक्षा संबंधी चिंतन अत्यंत मौलिक हैं। विश्व कवि रवीन्द्र नाथ टैगोर का कहना था- 'भारत को समझना है तो उसे स्वामी विवेकानन्द का जीवन दर्शन समझना होगा।' स्वामी विवेकानन्द के शैक्षिक चिंतन में शुद्धता और शक्ति को आत्मसात करना है। अपने शैक्षिक चिंतन के आधार पर भारतीय संस्कृति की ख्याति यूरोप और अमेरिका में फैलाने में वे सफल हुए थे। स्वामी विवेकानन्द के शैक्षिक विचारों में उत्तम कोटि की बौद्धिकता और विजय की गहनता यत्र-तत्र अमूल्य हीरों की तरह उपलब्ध है।

भारत एक बहुधार्मिकता और धर्म का देश है। इसमें प्रत्येक धर्म का ग्रंथ, आचार-विचार और नियम अलग-अलग हैं, किंतु स्वामी विवेकानन्द जी ने उन सबके एक तत्त्व को जानकर उसका शिक्षा में समावेश किया है। वे सभी धर्म को समान मानते थे। स्वामी जी की शिक्षा से संबंधी परिभाषा- 'शिक्षा मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।' स्वामी जी के अनुसार "सारी शिक्षा और समस्त प्रशिक्षण का एकमात्र उद्देश्य मनुष्य का निर्माण होना चाहिए।" लेकिन वर्तमान में अत्याधुनिकता और पाश्चात्य प्रभाव के कारण शिक्षा केवल बहिरंग पर पानी चढ़ाने का सदा प्रयत्न कर रही है। उनके शैक्षिक चिंतन को निम्न लिखित बिंदुओं से स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. शिक्षा द्वारा मनुष्य में मानव प्रेम, समाज सेवा, विश्व चेतना और विश्व बंधुत्व के गुणों का विकास करना है।
  2. शिक्षा का उद्देश्य आंतरिक एकता के बाह्य जगत में प्रकट करना, ताकि वह खुद को भली भांति समझे।
  3. शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, धार्मिक, नैतिक, चारित्रिक, सामाजिक व्यावसायिक विकास करना है।
  4. शिक्षा द्वारा मानव में देश भक्ति जाग्रत करना।
  5. शिक्षा से मानव की वैचारिक मुक्तता करना।
  6. शिक्षा के द्वारा आत्मविश्वास, आत्मश्रृद्धा, आत्मत्याग, आत्मनियंत्रण, आत्मनिर्भरता, आत्मज्ञान जैसे आलौकिक सदगुणों का विकास करना।
  7. शिक्षा के द्वारा मानव के ज्ञान चक्षुओं को खोलना।
  8. राष्ट्र, गुरु शुद्ध आदर्श के प्रति श्रद्धा और चेतना को जागृत करना।

उपर्युक्त उद्देश्यों के अतिरिक्त स्वामी जी शिक्षा का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, चरित्र गठन कर सकें और विचारों का सामंजस्य कर सकें, वही वास्तव में शिक्षित कहलाने योग्य है।

स्वामी जी विवेकानन्द का शैक्षिक चिंतन अत्यंत व्यापक स्वरूप है, जैसे वे धार्मिक या भारतीय शिक्षा और पाश्चात्य शिक्षा दोनों का समन्वय करना चाहते थे। स्वामी विवेकानन्द ने धर्म की शिक्षा, नारी शिक्षा, जन शिक्षा के संबंध में शिक्षा पर बल दिया है। स्वामी जी शिक्षा को व्यावसायमूलक जीवन मूल्यों से परिपूर्ण विचारोत्तेजक और मानव निर्मित दिशा देने के पक्ष में थे। सामाजिक निरंकुशता और अंध विश्वास का नाश करना, शिक्षा का प्रथम कर्तव्य है। विद्यार्थियों के विकास के लिए कला, विज्ञान, साहित्य और संस्कृति के लिए अवसर प्रदान करना। उनका कहना था कि भारत में शिक्षा के प्रसार के फलस्वरूप समाज शास्त्रीय अर्थपूर्ण सामाजिक गतिशीलता नहीं आ पाई है। वह भारतीय समाज का पूरी तरह सुधार चाहते थे। उन्होंने ऐसे भारत की कल्पना की, जो परंपरागत अंध विश्वास, पाखंड, अकर्मण्यता, जड़ता और आधुनिक सनक और कमजोरियों से स्वतंत्र होकर आगे बढ़ सके। उनके अनुसार भारतीय समाज का विकास आंशिक वर्गगत और आंचलिक रूप से संभव नहीं। स्वामी विवेकानन्द ने भौतिकवादी पाश्चात्य समाज में आध्यात्मिक योग और वेदांत की शिक्षा का प्रभाव डाला। वे उन भारतीय चिंतकों में से हैं, जिन्होंने भारतीय इतिहास की समाज शास्त्रीय और यथार्थवादी परिभाषा की। वह कहते थे कि आधुनिकीकरण की होड़ का आधार भी भारतीय संस्कृति होना चाहिए।

स्वामी जी के शिक्षा संबंधी विचारों का भारतीय सामाजिक और आर्थिक जीवन पर प्रभाव पड़ा। उनके विचारों को आधार बनाकर ज्ञान की शिक्षा पद्धति में सुधार लाना संभव है। उनका यह उपदेश देशवासियों के लिए यथार्थवादी, उद्देश्यपूर्ण और शाश्वत है।

निष्णात


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समन्वय छात्र पत्रिका 2012 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
संत कबीर की भक्ति भावना में श्री जगन्नाथ मदन मोहन दाश (पारंगत) 1
गजल ज्ञान प्रकाश पाण्डेय (पारंगत) 2:1
विरोधाभास तिलक राज शर्मा (पारंगत) 2:2
हिंदी की बिंदी क्षत्रिय भूपेन्द्र कुमार डी (निष्णात) 2:3
हिंदी की जय हो भबानि शंकर नाएक (प्रवीण) 2:4
स्वामी विवेकानन्द का शैक्षिक चिंतन धनंजय लहामगे (निष्णात) 3
गम ही सच्चा साथी भोसले उद्धव (निष्णात) 4:1
जिंदगी क्या है? तिरम सुनानी (पारंगत) 4:2
"हाय! ये दोस्ती क्या रंग लाती है" ध्रुति सुन्दर साहु (प्रवीण) 4:3
विद्या सबसे बड़ी शोभा अक्षय बल्लभ दाश (पारंगत) 5:1
ओड़िशा का सबसे बड़ा मेला "बालियात्रा" नब किशोर बेहेरा (पारंगत) 5:2
मत आओ मत आओ! श्रीमती सागरिका महाराणा (प्रवीण) 6:1
माँ रंजीत एम. मेश्राम (प्रवीण) 6:2
तेरी कमी धनजंय (निष्णात) 7:1
संस्थान की आरती अजित कुमार पंडा (प्रवीण) 7:2
चाँद बीबी एक पराक्रमी योद्धा मनोज शिंदे (निष्णात) 8
प्रार्थना (सन्तजनों के चरणों में) सुतारी राजेन्द्र रेड्डी (प्रवीण) 10:1
स्मृति मु. मुहिबुल्लाह (निष्णात) 10:2
वृक्ष की मानव से अपील नव किशोर बेहेरा (पारंगत) 11:1
सिर्फ पापा अभय अंजन दे (प्रवीण) 11:2
हमारा संस्थान प्रबीर कुमार पट्टायत (प्रवीण) 12:1
कभी नहीं भूलूँगा मैं हिंदी संस्थान को देबराज पधान (पारंगत) 12:2
चिंता विरेन्द्र कुमार नाग (पारंगत) 13:1
वजूद विष्णु खडसे (निष्णात) 13:2
तुम मुहम्मद गफूर यु. केरल (प्रवीण) 13:3
अपनी कक्षा पारंगत प्रमोद कुमार यादव (पारंगत) 14
हिंदी ही काम आई है प्रमोद कुमार यादव (पारगंत) 15:1
शर्म खाऊँ तो क्यों? तोफान पधान (पारंगत) 15:2
फतेहपुर सीकरी के दर्शन तोफान पधान (पारंगत) 16
नमस्ते गंगा सीताकांत पट्टनायक (पारंगत) 17
हे ताजमहल ! मिथुन दास (प्रवीण) 19
कौआ और पाँकपाँक चानवेनी किकोन (तृतीय वर्ष) 20:1
नेताजी-नेताजी, आप ये क्या कर रहे हो? भुरिया विनुभाई (निष्णात) 20:2
बेटा हो या बेटी संसारी नायक (पारंगत) 20:3
हाथी से बना हस्ती संसारी नायक (पारंगत) 21:1
बेटी शेख सगीर (प्रवीण) 21:2
कब मैं पराई हो गई? एस. तुलसी (पारंगत) 22
हे ईश्वर इतनी शक्ति दो! सुदाम पटेल (पारंगत) 23
प्रायश्चित (हिंदी नाटक) विष्णु खडसे (निष्णात) 24
प्रेम परीक्षा (हिंदी नाटक) विष्णु खडसे (निष्णात) 25
जो भी हो... लिलिश्री भोई (पारंगत) 26
मुस्कान लिलिश्री भोई (पारंगत) 26
उगादि एस. राजशेखर (निष्णात) 27:1
स्वयं करो पी. शिवशंकर पात्र (पारंगत) 27:2
संघर्ष विरेन्द्र कुमार नाग (पारंगत) 28:1
बदनाम एस. फाल्गुनी देवी (निष्णात) 28:2
भ्रष्टाचार तीर्थ बघार (पारंगत) 28:3
छोड़ दे। अर्चना सिंह (निष्णात) 28:4
अरलाउ न्यानो लोथा (तृतीय वर्ष) 29:1
चूजे भी शाहीनों से लड़ जाते हैं मोहम्मद तिर्जा जहिरूद्दीन (पारंगत) 29:2
परीक्षा भबानि शंकर नाएक 29:3
संस्थान में नुआँखाई का वह दिन कान्हा त्रिपाठी 30
"एक खत यार को" नीतिश कुमार पति 31
नूआँखाई पर्व तीर्थ बघार 32:1
तेरे आँसू शेख हारून 32:2
आतंकवाद जितेन्द्र पधान 32:3
कुछ कर दिखलाते हैं अर्चना सिंह 33:1
कैसा प्यार? बबन सिंह 33:2
मेरा जिला "नर्मदा जिला" वसावा रविन्द्र कुमार शांतिलाल 34
और कर भी क्या सकती हो तुम ! पंचानन मेहेर 36:1
भगवान की प्रतिज्ञा शेख हारून 36:2
"शहरीकरण का मानव पर प्रभाव" प्रमोद कुमार यादव 37
भ्रष्टाचार वृद्धि के कारण एवं समाधान सुश्री रश्मिता पाणिग्रही 38
राजभाषा हिंदी की संवैधानिक स्थिति जवीर सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, (सीनियर स्केल) 39
केंद्रीय हिंदी आगरा 43
साहित्य सभा का गठन 45
शिक्षणाभ्यास कार्यक्रम वर्ष : 2011-2012 45
भारत स्काउट एवं गाइड प्रशिक्षण शिविर 46
विषय- साहित्यिक प्रतियोगिताएँ 50
विभागीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ 51
विजेताओं की सूची 51
खेलकूद प्रतियोगिता सत्र – 2011-12 53
विभागीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ 54
आंतरिक परीक्षा 55
अध्यापक शिक्षा विभाग के संकाय सदस्य 55
अध्यापक शिक्षा विभाग में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं की सूची 55
श्रद्धांजलि 57
केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल की शासी परिषद के सदस्यों की सूची 58
वैयक्तिक औज़ार

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सुस्वागतम्
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