समन्वय छात्र पत्रिका-2012 पृ-30

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संस्थान में नुआँखाई का वह दिन

कान्हा त्रिपाठी
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हमारे जीवन में ऐसे अनेक दिन आते हैं जो हमेशा के लिए एक यादगार बन जाते हैं। एक ऐसा ही दिन जो मेरे लिए भी यादगार बन चुका है। जब भी मैं किसी गम में होता हूँ उन्हीं पलों को याद कर लेता हूँ और अपने दुखों के दिनों में बाबला सा हंसता रहता हूँ। उसी दिन की याद आज भी मेरे दिल में सिहरन पैदा कर देती है। मैं केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में पारंगत (बी.एड. समकक्ष) का प्रशिक्षणार्थी हूँ। एक दिन ऐसे ही हॉस्टल में अपने साथियों के साथ हँसी-मजाक कर रहा था। सभी साथी अपनी-अपनी आप बीती सुना रहे थे और उन सुहावने पलों को याद करके और ताजा कर रहे थे। तभी मेरे एक दोस्त ने हमारे महान गणपर्व नुआँखाई (नबान्न) के बारे में बताया। तब यह सब सोचने लगे कि नुआँखाई के अवसर पर घर कैसे जाएँगे। क्योंकि घर जाने के लिए विभागाध्यक्ष से स्वीकृति लेना अनिवार्य था। इतने लोगों को घर जाने की इजाजत नहीं मिल पाती। इसीलिए सभी लोनों ने मिलकर एक उपाय सोचा कि क्यों न नुआँखाई का त्योहार संस्थान में मनाया जाये। बस क्या था, वह भी मंजूर हो गया। नुआँखाई का त्योहार लगभग पास आ ही गया। हमारे साथियों ने मुझे, मदन भैया से और बब्बन भैया से नुआँखाई का कार्यभार सौंप दिया और मैं अपने हम उम्र मामा विरेन्द्र और साथियों की सहायता से सभी कामों को निपटाता गया। सबसे बड़ी बात यह है कि हमें अभी तक इजाजत नहीं मिली थी। सब ने मिलकर जैसे-तैसे विभागाध्यक्ष तथा कुल सचिव से इजाजत ली। जब वे राजी हो गए, सभी छात्रों में खुशियों की लहर दौड़ उठी। सभी छात्र खुशी से झूम उठे।

नुआँखाई का वह दिन आ ही गया। एक ऐसा दिन जो केंद्रीय हिंदी संस्थान के परिसर में खुशियों की बहार से अनुरंजित हुआ था। उस दिन के इंतजार में धरती माँ मानों बावरी सी हो गई थी। सूरज भी उस दिन अपने कोमल करों से पृथ्वी को आलिंगन करता हुआ आत्मतोष का आनंद अनुभव कर रहा था। उस दिन की उषा का कुछ खास नजारा था। फूलों की मुस्कराहट, पेड़ों की हरियाली और खिलखिलाहट साथ ही समीर के अनुपम बहाव से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ऐसी सुबह पहले कभी नहीं हुई हो। चारों ओर पक्षी की चहचहाट गूँज रही थी। गिलहरियाँ भी उस दिन कुछ अलग ही अंदाज में अपनी खुशी बयाँ कर रही थीं। इस बीच संस्थान का परिसर इन्हीं दृश्यों से अतिरंजित हो गया था। नुआँखाई का त्योहार ओड़िशा का एक महान गणपर्व है जो भाद्र महीना शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि में मनाया जाता है। यह त्योहार विशेष रूप से ओड़िशा के पश्चिमी क्षेत्र में मनाया जाता है। इस त्योहार पर लोग अपने खेतों में उगे धानों से खीर बनाकर उसे अपनी अष्टधात्री देवी (माँ समलेश्वरी, माँ मणिकेश्वरी, माँ सुरेश्वरी, माँ भुवनेश्वरी, माँ पाटमेश्वरी, माँ नारायणी) की पूजा करते हैं। इस त्योहार की दूसरी तथा बड़ी विशेषता यह है कि लोगों में एकता का भाव फैलाना। धर्म से परे सभी में भाई-चारे का भाव बढ़ाना। इस त्योहार की यह भी खासियत है कि नुँआ यानी नये अन्न से बने प्रसाद खाने के बाद अपने से बड़े व्यक्तियों को 'नुआँखाई जूहार' (प्रणाम) किया जाता है, जिससे सारे मनमुटाव दूर हो जाते हैं। इस त्योहार की एक बड़ी तथा महत्त्वपूर्ण खासियत यह है कि चाहे व्यक्ति अपने घर से कितना भी दूर रहकर नौकरी या काम कर रहा होता है, किंतु इस त्योहार के लिए उसे घर आना ही पड़ता है।

इसी खासियत का एक ऐसा ही दृश्य केंद्रीय हिंदी संस्थान में देखने को मिला। सारा विश्व परिसर अर्थात 'वसुधैव कुटुंबकम' का नजारा उस दिन केंद्रीय हिंदी संस्थान में प्रतिबिम्बित हो रहा था। सभी लोग अपने अपने परिवारों से दूर थे, अपितु एक नये परिवार के बीच में नुआँखाई त्योहार मना रहे थे। संस्थान परिसर गुलाल के रंगों से बहुत ही सुंदर दिख रहा था और उसमें बनाया गया माता समलेश्वरी का चित्र (लिलिश्री, रुक्मणी एवं साथियों द्वारा) बड़ा ही मनमोहक था। सभी लोग अपने-अपने काम बड़ी उत्सुकता से कर रहे थे। अक्षय भैया द्वारा माँ समलेश्वरी की पूजा-अर्चना की जा रही थी। उधर खीर बनाने में मेरे कई साथियों का बहुमूल्य योगदान मिला। सभी अध्यापकगण पूर्णरूपेण उपस्थित रहकर पूजा में शामिल हुए थे। पूजा के बाद माता समलेश्वरी को समर्पित करते हुए एक संबलपुरी गाना गाया (माँ को मोर समलेइ माँ...) जिसमें मदन, कान्हा, तरणि, विरेन्द्र, देवराज आदि ने गाना गया। भबानी भैया ने माँ समलेश्वरी के बारे में तथा नुआँखाई के बारे में बताया। उसके बाद सभी लोगों ने अपने से बड़े व्यक्तियों के पैर छूकर नुआँखाई जूहार किया (नुआँखाई भेंट)। जैसे ही अध्यापक पूजा से चले गए, हम सभी छात्र अपने संबलपुरी गानों पर नाचने लगे। तिरम, तोफान, कान्हा, तीर्थ, तिलक, तरणि, सरोज, धृति, प्रमोद, अरुन, जब्बार, राहुल, भवानी तथा सभी लड़के-लड़कियाँ एवं विदेशी छात्र भी मिलकर खूब नाचने लगे।

वास्तव में नुआँखाई को अगर त्योहारों की रानी कहा जाए तो ये अतिश्योक्ति नहीं होगी और संस्थान में नुआँखाई का वह दिन मेरे जीवन का सबसे यादगार दिन था। आज भी उस दिन की याद आती है कि किस तरह सूरज प्रौढ़ता से वृद्धावस्था की ओर अग्रसर होता हुए एक नई सुबह से प्रकाशित होने जा रहा था और संस्थान परिसर धीरे-धीरे उस रात तमस की काली छाया में विलीन होता जा रहा था...।

पारंगत


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समन्वय छात्र पत्रिका 2012 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
संत कबीर की भक्ति भावना में श्री जगन्नाथ मदन मोहन दाश (पारंगत) 1
गजल ज्ञान प्रकाश पाण्डेय (पारंगत) 2:1
विरोधाभास तिलक राज शर्मा (पारंगत) 2:2
हिंदी की बिंदी क्षत्रिय भूपेन्द्र कुमार डी (निष्णात) 2:3
हिंदी की जय हो भबानि शंकर नाएक (प्रवीण) 2:4
स्वामी विवेकानन्द का शैक्षिक चिंतन धनंजय लहामगे (निष्णात) 3
गम ही सच्चा साथी भोसले उद्धव (निष्णात) 4:1
जिंदगी क्या है? तिरम सुनानी (पारंगत) 4:2
"हाय! ये दोस्ती क्या रंग लाती है" ध्रुति सुन्दर साहु (प्रवीण) 4:3
विद्या सबसे बड़ी शोभा अक्षय बल्लभ दाश (पारंगत) 5:1
ओड़िशा का सबसे बड़ा मेला "बालियात्रा" नब किशोर बेहेरा (पारंगत) 5:2
मत आओ मत आओ! श्रीमती सागरिका महाराणा (प्रवीण) 6:1
माँ रंजीत एम. मेश्राम (प्रवीण) 6:2
तेरी कमी धनजंय (निष्णात) 7:1
संस्थान की आरती अजित कुमार पंडा (प्रवीण) 7:2
चाँद बीबी एक पराक्रमी योद्धा मनोज शिंदे (निष्णात) 8
प्रार्थना (सन्तजनों के चरणों में) सुतारी राजेन्द्र रेड्डी (प्रवीण) 10:1
स्मृति मु. मुहिबुल्लाह (निष्णात) 10:2
वृक्ष की मानव से अपील नव किशोर बेहेरा (पारंगत) 11:1
सिर्फ पापा अभय अंजन दे (प्रवीण) 11:2
हमारा संस्थान प्रबीर कुमार पट्टायत (प्रवीण) 12:1
कभी नहीं भूलूँगा मैं हिंदी संस्थान को देबराज पधान (पारंगत) 12:2
चिंता विरेन्द्र कुमार नाग (पारंगत) 13:1
वजूद विष्णु खडसे (निष्णात) 13:2
तुम मुहम्मद गफूर यु. केरल (प्रवीण) 13:3
अपनी कक्षा पारंगत प्रमोद कुमार यादव (पारंगत) 14
हिंदी ही काम आई है प्रमोद कुमार यादव (पारगंत) 15:1
शर्म खाऊँ तो क्यों? तोफान पधान (पारंगत) 15:2
फतेहपुर सीकरी के दर्शन तोफान पधान (पारंगत) 16
नमस्ते गंगा सीताकांत पट्टनायक (पारंगत) 17
हे ताजमहल ! मिथुन दास (प्रवीण) 19
कौआ और पाँकपाँक चानवेनी किकोन (तृतीय वर्ष) 20:1
नेताजी-नेताजी, आप ये क्या कर रहे हो? भुरिया विनुभाई (निष्णात) 20:2
बेटा हो या बेटी संसारी नायक (पारंगत) 20:3
हाथी से बना हस्ती संसारी नायक (पारंगत) 21:1
बेटी शेख सगीर (प्रवीण) 21:2
कब मैं पराई हो गई? एस. तुलसी (पारंगत) 22
हे ईश्वर इतनी शक्ति दो! सुदाम पटेल (पारंगत) 23
प्रायश्चित (हिंदी नाटक) विष्णु खडसे (निष्णात) 24
प्रेम परीक्षा (हिंदी नाटक) विष्णु खडसे (निष्णात) 25
जो भी हो... लिलिश्री भोई (पारंगत) 26
मुस्कान लिलिश्री भोई (पारंगत) 26
उगादि एस. राजशेखर (निष्णात) 27:1
स्वयं करो पी. शिवशंकर पात्र (पारंगत) 27:2
संघर्ष विरेन्द्र कुमार नाग (पारंगत) 28:1
बदनाम एस. फाल्गुनी देवी (निष्णात) 28:2
भ्रष्टाचार तीर्थ बघार (पारंगत) 28:3
छोड़ दे। अर्चना सिंह (निष्णात) 28:4
अरलाउ न्यानो लोथा (तृतीय वर्ष) 29:1
चूजे भी शाहीनों से लड़ जाते हैं मोहम्मद तिर्जा जहिरूद्दीन (पारंगत) 29:2
परीक्षा भबानि शंकर नाएक 29:3
संस्थान में नुआँखाई का वह दिन कान्हा त्रिपाठी 30
"एक खत यार को" नीतिश कुमार पति 31
नूआँखाई पर्व तीर्थ बघार 32:1
तेरे आँसू शेख हारून 32:2
आतंकवाद जितेन्द्र पधान 32:3
कुछ कर दिखलाते हैं अर्चना सिंह 33:1
कैसा प्यार? बबन सिंह 33:2
मेरा जिला "नर्मदा जिला" वसावा रविन्द्र कुमार शांतिलाल 34
और कर भी क्या सकती हो तुम ! पंचानन मेहेर 36:1
भगवान की प्रतिज्ञा शेख हारून 36:2
"शहरीकरण का मानव पर प्रभाव" प्रमोद कुमार यादव 37
भ्रष्टाचार वृद्धि के कारण एवं समाधान सुश्री रश्मिता पाणिग्रही 38
राजभाषा हिंदी की संवैधानिक स्थिति जवीर सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, (सीनियर स्केल) 39
केंद्रीय हिंदी आगरा 43
साहित्य सभा का गठन 45
शिक्षणाभ्यास कार्यक्रम वर्ष : 2011-2012 45
भारत स्काउट एवं गाइड प्रशिक्षण शिविर 46
विषय- साहित्यिक प्रतियोगिताएँ 50
विभागीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ 51
विजेताओं की सूची 51
खेलकूद प्रतियोगिता सत्र – 2011-12 53
विभागीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ 54
आंतरिक परीक्षा 55
अध्यापक शिक्षा विभाग के संकाय सदस्य 55
अध्यापक शिक्षा विभाग में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं की सूची 55
श्रद्धांजलि 57
केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल की शासी परिषद के सदस्यों की सूची 58
वैयक्तिक औज़ार

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सुस्वागतम्
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