समन्वय छात्र पत्रिका-2012 पृ-37

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"शहरीकरण का मानव पर प्रभाव"

(कनिष्ठ वर्ग की विभागीय निबंध लेखन प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त निबंध)
प्रमोद कुमार यादव

आज गाँवों का नष्ट होना और शहरों का नवीनीकरण होना शहरीकरण के विकास को दर्शाता है कि मनुष्य ने किस प्रकार आज प्रगति की है। पर क्या? मनुष्य की यह शहरीकरण की प्रवृत्ति केवल विकास के लिए हितकर है, क्या इसका मानव पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता, तो हमें यहाँ हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का वह कथन याद है कि- "यह जरूरी नहीं कि सब प्राचीन योग्य हैं और सब नवीन अयोग्य..."

जी हाँ! यह सच है कि आज शहरीकरण ने मानव को अति आधुनिक बना दिया है। आज शहर के मनुष्य कई बातों में गाँव के लोगों से आगे हैं, परंतु फिर भी ऐसी कई बातें हैं, जिनमें आज भी गाँव सर्वोपरी हैं।

तो मुझे कहना पड़ता है कि-

"शहरीकरण के इस गड्ड-मड्ड में आज मानव मस्त है, व्यस्त है उसकी हालत चूहे की तरह पस्त है।"

शहरीकरण का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? इसे हम निम्न बिंदुओं के रूप में देख सकते हैं-

1. हमारी संस्कृति का ध्वंस- यह सच है कि शहरीकरण ने मनुष्य को अति आधुनिक बना दिया है, परन्तु आज इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता है कि इसी शहरीकरण ने हमारी संस्कृति का ह्रास कर दिया है। आज हम अपने बड़ों एवं बुजुर्गों का आदर करना, प्रणाम करना छोड़कर हाय-हैलो! करने लगे हैं। मीठे बोल, अच्छे विचार, विनम्रता आदि कि जगह हमारे अंदर कड़वाहट आ गई है।

2. मानव के बीच पारस्परिक प्रेम का अभाव- एक समय था, जब गांवों में चौपालों पर लोगों का ताँता लगा रहता था। बस आप चौपालों पर चले जाइए, तो आप के गाँव के हर एक घर का हाल मालूम पड़ जाए। आप उनके दु:ख और सुख में भी शामिल हो जायें। परंतु आज शहरीकरण ने मानव को इस तरह बदल डाला है कि आज आप के बगल वाले कमरे में शर्मा जी या वर्मा जी मर रहे हैं या जी रहे हैं, हमें इसका पता भी नहीं चलता। तब मुझे ये पंक्तियाँ याद आती हैं-

"देख आज इंसान कितना बदल गया है।
चार दीवारों के बीच सहम गया है।
न भाई हैं, न नाते हैं, न रिश्ते हैं।
ये चार फुट के घर में ही
घुट-घुट कर मरते हैं, जीते हैं।"

3. मानव जीवन अस्त-व्यस्त- आज शहरीकरण के जीवन ने मानव को बिल्कुल अस्त-व्यस्त कर दिया है। वे आज केवल मशीन बन कर रह गए हैं। आज एक ही घर के अंदर रहने वाले पति-पत्नी रात को केवल सोते समय मिलते हैं, दादा-दादी, माता-पिता, बड़े गुरुजनों से तो मिलना दूर की बात है।

शहरीकरण ने आज मानव को मानव से दूर कर दिया है।

"हर एक रिश्ता आदमी केवल ढोता है
उसने इतना मजबूर कर दिया है।"

4. मेल-जोल एवं सहभागिता में कमी- आज शहरों की इस चकाचौंध में मनुष्य का ईश्वर पैसा हो गया है तथा उसका धर्म, स्वार्थ लोलुपता हो गया है। वह इतना स्वार्थी हो गया है कि लोगों से मिलना-जुलना भी छोड़ दिया है, क्योंकि मिलने-जुलने से शायद उसे पैसे और धन दोनों के खर्च का डर है। जबकि पहले गाँव में और आज भी गाँव में कुछ होने पर एक-दूसरे के लिए लोग मर-मिटने को तैयार हैं-

"गाँव के लोग जहाँ
एक दूसरे पर मर मिटते थे
चीख सुनी नहीं कि
खुद जाकर पूछते थे
क्या हुआ जनाब,
पर आज शहरों में पूछते हैं-
कौन हैं, आप?"

5. मनुष्य मानसिक रूप से अवसादग्रस्त- शहरीकरण ने भले ही मानव में भारी परिवर्तन किए हैं, परंतु उसे मानसिक रूप से कमजोर भी कर दिया है। आज शहर का मनुष्य गाँव के मनुष्य की तुलना में अधिक चिड़चिड़ा हो गया है। उसमें दृढ़ता एवं दृढ़शक्ति का ह्रास हो गया है। यही कारण है कि आज गाँवों की तुलना में शहरों में दिन-प्रतिदिन आत्म हत्याएँ बढ़ती जा रही हैं।

6. मनुष्य शारीरिक रूप से कमजोर- आज शहर के लोग जितने आधुनिक हैं, उतने ही आधुनिक बीमारियों से ग्रस्त हैं। कारण है दिनचर्या की कमी, आज शहर में लोगों के पास ठीक समय पर खाने और सोने का समय भी नहीं है और जो खाते हैं, वह गाँवों में "बैलों' एवं गायों को डाला जाता है।

7. उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा- आज शहरीकरण ने उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा दिया है। आज जितनी भी विलासिता और उपभोक्ता की वस्तुएँ हैं, वे शहरों में दिन-दहाड़े प्रयोग में लाई जा रही हैं, नतीजा आज मनुष्य आलसी और कामचोर होता जा रहा है।

8. विलासिता का भोगी- आज शहरीकरण ने मनुष्य को विलासी और भोगी बनाकर रख दिया है। आज मनुष्य शारीरिक एवं मानसिक दोनों ही रूपों से बहुत कमजोर हो गया है।

आज भी गाँव का मनुष्य घंटों मजदूरी एवं खेती करता है और रात को मस्त होकर कहता है-

"हम मजदूर हैं, हम मजदूर हैं।
शहर की चकाचौंध से हम दूर हैं।
फिर भी हर रात हम रहते मस्ती में चूर हैं।"

अत: मैं कह सकता हूँ कि भले ही आज शहरीकरण ने मनुष्य को आधुनिक एवं विकासशील बनाया है, फिर भी संस्कृति, मानसिक विकास, मेल-जोल तथा स्वास्थ्य आज भी गाँवों में ही ज्यादा सुरक्षित है।

पारंगत


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36:2
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समन्वय छात्र पत्रिका 2012 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
संत कबीर की भक्ति भावना में श्री जगन्नाथ मदन मोहन दाश (पारंगत) 1
गजल ज्ञान प्रकाश पाण्डेय (पारंगत) 2:1
विरोधाभास तिलक राज शर्मा (पारंगत) 2:2
हिंदी की बिंदी क्षत्रिय भूपेन्द्र कुमार डी (निष्णात) 2:3
हिंदी की जय हो भबानि शंकर नाएक (प्रवीण) 2:4
स्वामी विवेकानन्द का शैक्षिक चिंतन धनंजय लहामगे (निष्णात) 3
गम ही सच्चा साथी भोसले उद्धव (निष्णात) 4:1
जिंदगी क्या है? तिरम सुनानी (पारंगत) 4:2
"हाय! ये दोस्ती क्या रंग लाती है" ध्रुति सुन्दर साहु (प्रवीण) 4:3
विद्या सबसे बड़ी शोभा अक्षय बल्लभ दाश (पारंगत) 5:1
ओड़िशा का सबसे बड़ा मेला "बालियात्रा" नब किशोर बेहेरा (पारंगत) 5:2
मत आओ मत आओ! श्रीमती सागरिका महाराणा (प्रवीण) 6:1
माँ रंजीत एम. मेश्राम (प्रवीण) 6:2
तेरी कमी धनजंय (निष्णात) 7:1
संस्थान की आरती अजित कुमार पंडा (प्रवीण) 7:2
चाँद बीबी एक पराक्रमी योद्धा मनोज शिंदे (निष्णात) 8
प्रार्थना (सन्तजनों के चरणों में) सुतारी राजेन्द्र रेड्डी (प्रवीण) 10:1
स्मृति मु. मुहिबुल्लाह (निष्णात) 10:2
वृक्ष की मानव से अपील नव किशोर बेहेरा (पारंगत) 11:1
सिर्फ पापा अभय अंजन दे (प्रवीण) 11:2
हमारा संस्थान प्रबीर कुमार पट्टायत (प्रवीण) 12:1
कभी नहीं भूलूँगा मैं हिंदी संस्थान को देबराज पधान (पारंगत) 12:2
चिंता विरेन्द्र कुमार नाग (पारंगत) 13:1
वजूद विष्णु खडसे (निष्णात) 13:2
तुम मुहम्मद गफूर यु. केरल (प्रवीण) 13:3
अपनी कक्षा पारंगत प्रमोद कुमार यादव (पारंगत) 14
हिंदी ही काम आई है प्रमोद कुमार यादव (पारगंत) 15:1
शर्म खाऊँ तो क्यों? तोफान पधान (पारंगत) 15:2
फतेहपुर सीकरी के दर्शन तोफान पधान (पारंगत) 16
नमस्ते गंगा सीताकांत पट्टनायक (पारंगत) 17
हे ताजमहल ! मिथुन दास (प्रवीण) 19
कौआ और पाँकपाँक चानवेनी किकोन (तृतीय वर्ष) 20:1
नेताजी-नेताजी, आप ये क्या कर रहे हो? भुरिया विनुभाई (निष्णात) 20:2
बेटा हो या बेटी संसारी नायक (पारंगत) 20:3
हाथी से बना हस्ती संसारी नायक (पारंगत) 21:1
बेटी शेख सगीर (प्रवीण) 21:2
कब मैं पराई हो गई? एस. तुलसी (पारंगत) 22
हे ईश्वर इतनी शक्ति दो! सुदाम पटेल (पारंगत) 23
प्रायश्चित (हिंदी नाटक) विष्णु खडसे (निष्णात) 24
प्रेम परीक्षा (हिंदी नाटक) विष्णु खडसे (निष्णात) 25
जो भी हो... लिलिश्री भोई (पारंगत) 26
मुस्कान लिलिश्री भोई (पारंगत) 26
उगादि एस. राजशेखर (निष्णात) 27:1
स्वयं करो पी. शिवशंकर पात्र (पारंगत) 27:2
संघर्ष विरेन्द्र कुमार नाग (पारंगत) 28:1
बदनाम एस. फाल्गुनी देवी (निष्णात) 28:2
भ्रष्टाचार तीर्थ बघार (पारंगत) 28:3
छोड़ दे। अर्चना सिंह (निष्णात) 28:4
अरलाउ न्यानो लोथा (तृतीय वर्ष) 29:1
चूजे भी शाहीनों से लड़ जाते हैं मोहम्मद तिर्जा जहिरूद्दीन (पारंगत) 29:2
परीक्षा भबानि शंकर नाएक 29:3
संस्थान में नुआँखाई का वह दिन कान्हा त्रिपाठी 30
"एक खत यार को" नीतिश कुमार पति 31
नूआँखाई पर्व तीर्थ बघार 32:1
तेरे आँसू शेख हारून 32:2
आतंकवाद जितेन्द्र पधान 32:3
कुछ कर दिखलाते हैं अर्चना सिंह 33:1
कैसा प्यार? बबन सिंह 33:2
मेरा जिला "नर्मदा जिला" वसावा रविन्द्र कुमार शांतिलाल 34
और कर भी क्या सकती हो तुम ! पंचानन मेहेर 36:1
भगवान की प्रतिज्ञा शेख हारून 36:2
"शहरीकरण का मानव पर प्रभाव" प्रमोद कुमार यादव 37
भ्रष्टाचार वृद्धि के कारण एवं समाधान सुश्री रश्मिता पाणिग्रही 38
राजभाषा हिंदी की संवैधानिक स्थिति जवीर सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, (सीनियर स्केल) 39
केंद्रीय हिंदी आगरा 43
साहित्य सभा का गठन 45
शिक्षणाभ्यास कार्यक्रम वर्ष : 2011-2012 45
भारत स्काउट एवं गाइड प्रशिक्षण शिविर 46
विषय- साहित्यिक प्रतियोगिताएँ 50
विभागीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ 51
विजेताओं की सूची 51
खेलकूद प्रतियोगिता सत्र – 2011-12 53
विभागीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ 54
आंतरिक परीक्षा 55
अध्यापक शिक्षा विभाग के संकाय सदस्य 55
अध्यापक शिक्षा विभाग में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं की सूची 55
श्रद्धांजलि 57
केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल की शासी परिषद के सदस्यों की सूची 58
वैयक्तिक औज़ार

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सुस्वागतम्
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