समन्वय छात्र पत्रिका-2012 पृ-38

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भ्रष्टाचार वृद्धि के कारण एवं समाधान

(कनिष्ठ वर्ग की विभागीय निबंध लेखन प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त निबंध)
सुश्री रश्मिता पाणिग्रही

भ्रष्टाचार का अर्थ- भ्रष्टाचार का अर्थ है 'भ्रष्ट आचरण' या 'पतित व्यवहार'। स्वार्थ में लिप्त होकर कोई भी किया गया गलत कार्य भ्रष्टाचार होता है। भ्रष्टाचार का दायरा विशाल है। भ्रष्टाचार के कई रूप हैं- रिश्वत, कमीशन लेना, काला बाजारी, मुनाफाखोरी, मिलावट, कर्तव्य से भागना, चोर-अपराधियों को सहयोग करना, अतिरिक्त गलत कार्य में रुचि लेना आदि सभी अनुचित कार्यों को भ्रष्टाचार कहा जायेगा।

भारत में भ्रष्टाचार की स्थिति- दुर्भाग्य से भारत में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। वैसे देखा जाए तो सारे विश्व में भ्रष्टाचारी राक्षस का आतंक फैला हुआ है। भारत के सारे प्रशासनिक से लेकर शैक्षिक, धार्मिक आदि क्षेत्रों में भ्रष्टाचार का राज चलता है।

राजनीतिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार- आज कल सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार राजनैतिक क्षेत्र में हो रहा है। मंत्रियों को अमीर एवं धनी व्यक्तियों से धन लेकर अपराधियों को देना पड़ता है। ताकि वे चुनाव जीत जाएँ। फलस्वरूप चुनाव जीतने के बाद और व्यक्तियों की स्वार्थ पूर्ण शर्त पूरी हो जाती है।

शैक्षिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार- शैक्षिक क्षेत्र भी भ्रष्टाचार से बचा नहीं है। अध्यापक के पास जो छात्र ट्यूशन लेते हैं, उन्हें परीक्षा में ज्यादा नंबर मिल जाते हैं, जबकि जो छात्र पढ़ने में अच्छा हो, उसे कम अंक मिलते हैं।

नौकरी और डिग्रियों के लिए भी रिश्वत लेकर दी जाती है।

चिकित्सा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार- पैसे वाले आदमी एवं अमीर व्यक्तियों का इलाज पहले किया जाता है, लेकिन गरीब व्यक्ति का चाहे जितनी बड़ी उसकी बीमारी हो, उसकी अवहेलना की जाती है। दवाइयों में मिलावट की जाती है, जो रोगी के लिए बहुत खतरनाक होता है।

धार्मिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार- धार्मिक क्षेत्र भी भ्रष्टाचार से बचा नहीं है। हर किसी को मंदिर जाने से पहले पैसे लेकर जाना पड़ता है, पुजारी की साधन दक्षिणा के लिए।

व्यापार के क्षेत्र में भ्रष्टाचार- खाद्य पदार्थों से लेकर प्रत्येक चीज में मिलावट हो रही है, किसी में ईंट तो किसी में रेत मिला हुआ होता है। सीमेंट में भी ज्यादा रेत मिलाकर कमजोर गगनचुंबी इमारतें बनाई जाती हैं। सभी प्रकार से कार्यालय में भी रिश्वत से ही काम होता है।

भ्रष्टाचार वृद्धि के कारण- समाज में भ्रष्टाचार वृद्धि के कारण तो अनेक हैं, उनमें से कुछ मुख्य कारण हैं-

धन को सम्मान- आजकल अमीर आदमियों का ही समाज में सम्मान है। सच्चरित्र व्यक्तियों की कोई इज्जत नहीं करता, क्योंकि उसके पास धन नहीं होता है। इसलिए सच्चरित्र व्यक्ति भी भ्रष्टाचार अपनाने लगा है।

धन कमाने की तृष्णा- धन की तृष्णा में जलता हुआ आदमी बाहरी साज-सज्जा के लिए, भोग विलास के लिए पैसा कमाना चाहता है और इसके लिए सबसे लघुतम साधन है, भ्रष्टाचार। आदमी इतना स्वार्थी हो गया है कि वह भ्रष्टाचार फैलाकर दुनिया भर की सम्पत्ति अपने पेट में, मुँह में, घर में भर लेना चाहता है।

भ्रष्टाचार का और एक मुख्य कारण है- भूख एवं गरीबी

भूख एवं गरीबी के कारण व्यक्ति नाम न मिलने पर आदर्श को समान न रखते हुए दहेज जैसी समस्या से संघर्ष करने के लिए भ्रष्टाचार को अपना लेता है।

बेकारी की समस्या के कारण शिक्षित व्यक्ति को अगर नौकरी नहीं मिलेगी, तो वह विचारा कौन सा रास्ता अपनाएगा। दर-दर की ठोकरें खाने के पश्चात शिक्षित आदमी भी भ्रष्टाचार के जरिए पैसा कमाने की बात सोचते हैं।

भ्रष्टाचार का समाधान- समाज से भ्रष्टाचार को दूर करने का सबसे सरल साधन है-

  1. जन चेतना। बच्चों को विद्यालय, घर एवं गुरुजनों से अच्छे संस्कार मिलने चाहिए, जिससे कि वह भ्रष्टाचार और सदाचार में अंतर समझ सकें और आगे चलकर सदाचार को अपनायें।
  2. सरकारी अधिकारियों के विवेकाधिकार को सीमित करने से भी भ्रष्टाचार को कम किया जा सकता है।
  3. अगर ऊँचे पद के अधिकारी भ्रष्टाचार नहीं करेंगे तो छोटा कर्मचारी भी नहीं करेगा।
  4. जन आंदोलन से भी भ्रष्टाचार को दूर किया जा सकता है।
  5. सरकार भी भारत देश में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए जन आंदोलन से जागृत होकर जनलोकपाल बिल पर अमल कर रही है, जिससे की देश से भ्रष्टाचार कम हो जाए।
  6. सरकारी अधिकारी या मंत्रियों के खिलाफ अगर कोई भी मामला दर्ज होता है, तो तीन माह के अंदर उन्हें अपने आपको सच्चा प्रमाणित करना पड़ेगा, नहीं तो उन्हें दंड दिया जायेगा।
  7. पुलिस, आर. टी. आई. क़ानून से भी सरकार भ्रष्टाचार को कम करने में सफल हो सकेगी।

इन सभी समाधानों के अलावा सबसे अच्छा एवं सक्रिय समाधान यह है कि अगर राजा एवं प्रजा दोनों सचेत हो जाएँ तथा सच्चे सदाचार को अपना लें, तो भ्रष्टाचार का नामो निशान मिट जायेगा। जनता एवं सरकार दोनों को जागृत होना पड़ेगा।

कहा जाता है- यथा राजा तथा प्रजा, इस तरह समाज से भ्रष्टाचार दूर हो कर सदाचार पनप सकता है।

प्रवीण


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समन्वय छात्र पत्रिका 2012 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
संत कबीर की भक्ति भावना में श्री जगन्नाथ मदन मोहन दाश (पारंगत) 1
गजल ज्ञान प्रकाश पाण्डेय (पारंगत) 2:1
विरोधाभास तिलक राज शर्मा (पारंगत) 2:2
हिंदी की बिंदी क्षत्रिय भूपेन्द्र कुमार डी (निष्णात) 2:3
हिंदी की जय हो भबानि शंकर नाएक (प्रवीण) 2:4
स्वामी विवेकानन्द का शैक्षिक चिंतन धनंजय लहामगे (निष्णात) 3
गम ही सच्चा साथी भोसले उद्धव (निष्णात) 4:1
जिंदगी क्या है? तिरम सुनानी (पारंगत) 4:2
"हाय! ये दोस्ती क्या रंग लाती है" ध्रुति सुन्दर साहु (प्रवीण) 4:3
विद्या सबसे बड़ी शोभा अक्षय बल्लभ दाश (पारंगत) 5:1
ओड़िशा का सबसे बड़ा मेला "बालियात्रा" नब किशोर बेहेरा (पारंगत) 5:2
मत आओ मत आओ! श्रीमती सागरिका महाराणा (प्रवीण) 6:1
माँ रंजीत एम. मेश्राम (प्रवीण) 6:2
तेरी कमी धनजंय (निष्णात) 7:1
संस्थान की आरती अजित कुमार पंडा (प्रवीण) 7:2
चाँद बीबी एक पराक्रमी योद्धा मनोज शिंदे (निष्णात) 8
प्रार्थना (सन्तजनों के चरणों में) सुतारी राजेन्द्र रेड्डी (प्रवीण) 10:1
स्मृति मु. मुहिबुल्लाह (निष्णात) 10:2
वृक्ष की मानव से अपील नव किशोर बेहेरा (पारंगत) 11:1
सिर्फ पापा अभय अंजन दे (प्रवीण) 11:2
हमारा संस्थान प्रबीर कुमार पट्टायत (प्रवीण) 12:1
कभी नहीं भूलूँगा मैं हिंदी संस्थान को देबराज पधान (पारंगत) 12:2
चिंता विरेन्द्र कुमार नाग (पारंगत) 13:1
वजूद विष्णु खडसे (निष्णात) 13:2
तुम मुहम्मद गफूर यु. केरल (प्रवीण) 13:3
अपनी कक्षा पारंगत प्रमोद कुमार यादव (पारंगत) 14
हिंदी ही काम आई है प्रमोद कुमार यादव (पारगंत) 15:1
शर्म खाऊँ तो क्यों? तोफान पधान (पारंगत) 15:2
फतेहपुर सीकरी के दर्शन तोफान पधान (पारंगत) 16
नमस्ते गंगा सीताकांत पट्टनायक (पारंगत) 17
हे ताजमहल ! मिथुन दास (प्रवीण) 19
कौआ और पाँकपाँक चानवेनी किकोन (तृतीय वर्ष) 20:1
नेताजी-नेताजी, आप ये क्या कर रहे हो? भुरिया विनुभाई (निष्णात) 20:2
बेटा हो या बेटी संसारी नायक (पारंगत) 20:3
हाथी से बना हस्ती संसारी नायक (पारंगत) 21:1
बेटी शेख सगीर (प्रवीण) 21:2
कब मैं पराई हो गई? एस. तुलसी (पारंगत) 22
हे ईश्वर इतनी शक्ति दो! सुदाम पटेल (पारंगत) 23
प्रायश्चित (हिंदी नाटक) विष्णु खडसे (निष्णात) 24
प्रेम परीक्षा (हिंदी नाटक) विष्णु खडसे (निष्णात) 25
जो भी हो... लिलिश्री भोई (पारंगत) 26
मुस्कान लिलिश्री भोई (पारंगत) 26
उगादि एस. राजशेखर (निष्णात) 27:1
स्वयं करो पी. शिवशंकर पात्र (पारंगत) 27:2
संघर्ष विरेन्द्र कुमार नाग (पारंगत) 28:1
बदनाम एस. फाल्गुनी देवी (निष्णात) 28:2
भ्रष्टाचार तीर्थ बघार (पारंगत) 28:3
छोड़ दे। अर्चना सिंह (निष्णात) 28:4
अरलाउ न्यानो लोथा (तृतीय वर्ष) 29:1
चूजे भी शाहीनों से लड़ जाते हैं मोहम्मद तिर्जा जहिरूद्दीन (पारंगत) 29:2
परीक्षा भबानि शंकर नाएक 29:3
संस्थान में नुआँखाई का वह दिन कान्हा त्रिपाठी 30
"एक खत यार को" नीतिश कुमार पति 31
नूआँखाई पर्व तीर्थ बघार 32:1
तेरे आँसू शेख हारून 32:2
आतंकवाद जितेन्द्र पधान 32:3
कुछ कर दिखलाते हैं अर्चना सिंह 33:1
कैसा प्यार? बबन सिंह 33:2
मेरा जिला "नर्मदा जिला" वसावा रविन्द्र कुमार शांतिलाल 34
और कर भी क्या सकती हो तुम ! पंचानन मेहेर 36:1
भगवान की प्रतिज्ञा शेख हारून 36:2
"शहरीकरण का मानव पर प्रभाव" प्रमोद कुमार यादव 37
भ्रष्टाचार वृद्धि के कारण एवं समाधान सुश्री रश्मिता पाणिग्रही 38
राजभाषा हिंदी की संवैधानिक स्थिति जवीर सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, (सीनियर स्केल) 39
केंद्रीय हिंदी आगरा 43
साहित्य सभा का गठन 45
शिक्षणाभ्यास कार्यक्रम वर्ष : 2011-2012 45
भारत स्काउट एवं गाइड प्रशिक्षण शिविर 46
विषय- साहित्यिक प्रतियोगिताएँ 50
विभागीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ 51
विजेताओं की सूची 51
खेलकूद प्रतियोगिता सत्र – 2011-12 53
विभागीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ 54
आंतरिक परीक्षा 55
अध्यापक शिक्षा विभाग के संकाय सदस्य 55
अध्यापक शिक्षा विभाग में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं की सूची 55
श्रद्धांजलि 57
केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल की शासी परिषद के सदस्यों की सूची 58
वैयक्तिक औज़ार

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