कपिल सिब्बल संदेश

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कपिल सिब्बल
KAPIL SIBBAL
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मंत्री

मानव संसाधन विकास
संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी
भारत सरकार, नई दिल्ली-110115
MINISTER OF
HUMAN RESOURCE DEVELOPMENT,
COMMUNICATIONS AND INFORMATION TECHNOLOGY
GOVERNMENT OF INDIA

NEW DELHI-110115
संदेश

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मुझे यह जानकर अति प्रसन्नता हुई है कि मार्च, 1960 में स्थापित केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा (उच्चतर शिक्षा, मानव संसाधन विकास मंत्रालय) ने अपनी शानदार सेवा के 50 वर्ष पूरे कर लिए हैं और इस वर्ष अपना स्वर्ण जयंती वर्ष मना रहा है।

किसी देश के लोगों की यदि एक आम भाषा हो, जिसे वे अपनी भाषा मानते हों, तो उनकी यह भावना देश की एकता को मजबूती प्रदान करने में अन्य सभी प्रयासों की तुलना में अधिक योगदान देती है चाहे वे कितने ही सशक्त क्यों न हों। यह बात हमारे देश के संबंध में और भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि हमारा देश विभिन्न धर्मों, समुदायों और प्रदेशों का एक बहुरंगी चित्र है। भाषा केवल शाब्दिक अभिव्यक्ति ही नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की अंतरात्मा की आवाज भी होती है।
ऐसी भाषा होने के कारण, जिसमें भारत का एक आम आदमी एक दूसरे के साथ बातचीत कर सकता है, हिंदी किसी व्यक्ति के भारतीय होने की सर्वोच्च पहचान बन गई है। हिंदी की क्षमता को स्वीकार करते हुए तथा भारी संख्या में जनता की भावनाओं से जुड़ी होने के कारण देश के संस्थापकों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा होने को विशिष्ट दर्जा प्रदान किया था।
केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा द्वारा संचालित विभिन्न कार्यक्रमों ने इस लक्ष्य को प्राप्त करने में उल्लेखनीय योगदान दिया है और मुझे विश्वास है कि भविष्य में भी संस्थान समय की कसौटी पर खरा उतरेगा और राष्ट्रभाषा हिंदी के जरिए देश की जनता में एकता कायम करके देश को तथा साथ ही इस अतिसुंदर भाषा को सीखने में अभिरुचि रखने वाले विश्व के विभिन्न भागों के लोगों को अपनी अमूल्य सेवाएँ प्रदान करता रहेगा।

मैं, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के स्वर्ण जयंती समारोह के अवसर पर अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ तथा इसके समस्त भावी कार्यक्रमों की सफलता की कामना करते हुए गौरवान्वित महसूस करता हूँ।
(कपिल सिब्बल)

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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