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प्रो. के. बिजय कुमार
केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के अंतर्गत स्थापित केंद्रीय हिंदी संस्थान की 50 वर्ष की विकास यात्रा के संदर्भ में कहना चाहूँगा कि हमने विद्वत समाज को कुछ दिया और संभवत: इससे ज्यादा हमें शैक्षिक जगत से मिला है। हमने देश-विदेश में हिंदी के प्रति जागृति पैदा करने और हिंदी की मशाल जलाने वाले लोगों को तैयार किया है। इस महायज्ञ में हिंदी के विद्वान, मनीषी, लेखक, हिंदी के कार्यान्वयन से जुड़े अधिकारी, भाषा विशेषत: हिंदी के क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों का भरपूर सहयोग मिला है, मार्ग दर्शन और दिशा निर्देश प्राप्त हुआ है, जिसके बिना संस्थान अपने कार्यों में और उद्देश्यों की पूर्ति में सफल नहीं हो सकता है।

मुझे विशेष रूप से आभार प्रकट करना है समस्त पूर्ववर्ती अध्यक्षों, उपाध्यक्षों, निदेशकों का जिनके सारस्वत प्रयत्नों और अथक प्रयासों से संस्थान आज अपनी वर्तमान स्थिति पर पहुँचा है, उन मनीषियों ने हिंदी के बढ़ते आयामों के बढ़ते संदर्भ में हिंदी की भूमिकाओं को पहचाना, तदनुरूप संस्थान की कार्य योजनाओं को गतिशील बनाया। उन्हीं के सद् प्रयासों से संस्थान आज उच्च स्तरीय शोध और शिक्षण प्रशिक्षण का केंद्र बन सका है।

संस्थान के कर्मठ प्राध्यापकों एवं सक्रिय कर्मचारियों का योगदान भी अविस्मरणीय है। हर प्राध्यापक ने भाषा शिक्षण के क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प किया और अपने ज्ञान तथा अनुभव का लाभ संस्थान को दिया। सभी पूर्ववर्ती और वर्तमान कर्मचारियों ने कार्यक्रमों को कार्य रूप में परिणत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सबके समन्वित प्रयासों की सार्थक प्रस्तुति ही संस्थान का आज का साकार रूप है। संस्थान से जुड़े इन मनीषियों की सद्भावना और संस्थान के लिए उनकी शुभकामनाओं को पुन: प्राप्त करने के लिए स्मारिका एक वाहिका है। इसे हिंदी जगत के सामने प्रस्तुत करते हुए संस्थान हर्ष का अनुभव कर रहा है।


प्रो. के. बिजय कुमार
निदेशक

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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