स्मृति के गलियारों से

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लेखक- डॉ. मोहनलाल सर
डॉ. मोहन लाल सर

अपने आविर्भाव से ही संस्थान सुनिश्चित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य करता रहा है, कार्य की विशिष्टता के कारण भारत के सभी क्षेत्रों से चयनित मेधा यहाँ आकर्शित होती रही है। गौरव-गाथा यह है कि देश की सभी मुख्य भाषाओं के प्रतिभावान व्यक्ति यहाँ हिंदी अध्ययन, अध्यापन और अनुसंधान का कार्य करते रहे हैं। उपलब्ध उन्मुक्त वातावरण ने, संस्थान के सभी सदस्यों को, इच्छानुसार विकास करने का अवसर भी प्रदान किया। आगरा के एक सीमित स्थान से प्रारंभ होने के पश्चात, आज संस्थान की शाखाएँ न केवल भारतवर्ष में, बल्कि विदेशों में भी सक्रिय हैं। सीमित स्थान के साथ-साथ, उस समय की जनशक्ति भी सीमित ही थी। विशेषता यह थी कि श्रीगणेश में जुटे वे सभी समर्पित सदस्य, एकजुट होकर, यज्ञ अनुष्ठान की तरह कार्य करते रहे। आज संस्थान का जो स्वरूप हम देख रहे हैं, यह उन गिने-चुने व्यक्तियों के अथाह और निस्वार्थ परिश्रम का ही प्रतिफल है। उल्लेखनीय बात यह भी है कि संस्थान को दिशा देने वाले व्यक्तियों ने समय-समय पर उचित मार्गदर्शन देकर इसकी प्रगति को व्यावहारिकता प्रदान की।


प्रारंभ से ही संस्थान के दो मुख्य कार्य-संदर्भ रहे हैं। पहला अनुसंधान तथा सामग्री निर्माण तथा दूसरा शिक्षण-प्रशिक्षण। अनुसंधान तथा सामग्री निर्माण के अंतर्गत द्वितीय भाषा तथा विदेशी भाषा के रूप में हिंदी पढ़ने-पढ़ाने से सम्बद्ध अनुसंधान तथा उसके अनुकूल सामग्री-निर्माण का कार्य संदर्भित है। शिक्षण-प्रशिक्षण के तहत व्यावहारिक शिक्षण-प्रशिक्षण के साथ ही अनुसंधानात्मक उपलब्धियों के सैद्घांतिक प्रशिक्षण का उत्तरदायित्व भी संस्थान निभाता रहा है। लक्षित वर्ग को ध्यान में रखकर ही पाठ्यक्रमों की रूप-रेखा बनाई जाती रही हैं। उदाहरण के लिए, 1973 में संसद सदस्यों के लिए जो पाठ्यक्रम बनाया गया, उसमें संसद में प्रयुक्त हिंदी के शब्दों और पदबंधों को ही ध्यान में रखा गया तथा मुहावरा भी संसद का ही रहा। इसी प्रकार सिद्धांतमूलक विषय-वस्तु हेतु एम. ए. उत्तीर्ण शिक्षार्थी ही अपेक्षित रहते हैं।


सैद्धांतिक प्रशिक्षण के साथ-साथ मेरा अधिकांश योगदान विदेशी भाषा के रूप में हिंदी अध्यापन का रहा है। इस कार्य से जुड़े मेरे कुछ अनुभव अविस्मरणीय हैं। बात 1973 के आरंभ की है। भारत सरकार की छात्रवृत्ति प्राप्त, विदेशों से, छात्र-छात्राओं का हिंदी सीखने के लिए, संस्थान में आना प्रारंभ हो गया था।

उस समय यू.एस.एस.आर. सुगठित था। अड़ोस-पड़ोस के देशों पर भी उसका काफी प्रभाव था। मंगोलिया एक स्वतंत्र देश तो था, पर था सोवियत संघ के प्रभाव में। वहाँ से दो छात्र, न्यमदवा और सुखबात्र, हिंदी सीखने के लिए संस्थान में भेजे गए। अभी तक तो संस्थान को उन्हीं छात्रों का अनुभव था, जो थोड़ी-बहुत अथवा अच्छी अंग्रेजी जानते थे, लेकिन इन दोनों को अंग्रेजी का लेशमात्र ज्ञान भी न था। हाँ मंगोलयाई भाषा के अतिरिक्त रूसी भाषा जानते थे।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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