स्मृति के गलियारों से 2

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पाठ्यक्रम से सलंग्न, संस्थान के अध्यापक, इन दोनों में से कोई भी भाषा नहीं जानते थे। शिक्षण संयोजन मेरे सुपुर्द हो गया। कार्य चुनौतीपूर्ण था। भाषा शिक्षण की पुस्तकीय विधि काम नहीं कर रही थी। आधारभूत वाक्य संरचना का उपस्थापन एक बड़ा प्रश्न बन गया। पर्याप्त मौखिक अभ्यास के उपरांत भी, मूल वाक्य के घटक छात्रों की पहचान में नहीं आ रहे थे। कुछ नवीन प्रयोग करने का निर्णय हुआ। विदेशी भाषा शिक्षण में लिपि शिक्षण तो प्रारंभिक मौखिक पाठों के पश्चात ही संभव होता है। इसलिए, लिपि के आधार पर घटकों की पहचान नहीं हो सकती थी। यह विचार हुआ कि ज्यामिति की रेखाओं का सहारा लिया जाए। ये रेखाएँ तो सार्वभौमिक हैं। इनमें भाषा विशेष का कोई दखल नहीं है। वाक्य के घटकों को आयतों से अंकित करने का उपाय सूझा। "यह पुस्तक है।" वाक्य के लिए श्यामपट्ट पर तीन आयत अंकित किए गए, यथा- दोनों छात्रों को बात समझ में आ गई। उन्होंने तुरंत एक दूसरे को मंगोलयाई में समझाया। हमारी खुशी का ठिकाना न रहा। समस्य हल हो गई थी। सम्पूर्ण आधारभूत संरचनाएँ इसी विधि से, अनुस्तरित रूप में, प्रस्तुत की गईं। शब्द में यदि लिंग, वचन, पुरुष का भेद स्पष्ट करना होता था, तो आयत के निश्चित कोण पर छोटी रेखा खींची जाती थी।

मैंने प्रारंभिक तीन पाठ बनाए। प्रोफेसर रविन्द्र श्रीवास्तव, दिल्ली केंद्र का कार्य देख रहे थे। तीनो पाठ उनको दिखाए। पहला पाठ तो सरल-सा ही था। परम्परागत हिंदी साहित्य में से कुछ अपशब्द चुन लिए थे। प्रेमचंद जी के उपन्यासों से भी ऐसी सामग्री प्राप्त हुई। ये शब्द या अभिव्यक्तियाँ समस्यामूलक नहीं थीं। "तू मर जा", "तेरा घर जले" आदि बद्दुआएँ संदर्भ सहित पढ़ाना कठिन न था। दूसरा पाठ भी लगभग ऐसा ही था। इसमें आपसी व्यवहार की कुछ स्थितियों को रेखीय क्रम में रखा गया था। अर्थात बातचीत की स्थिति से लेकर "खून खराबा" की स्थिति तक कुल छह प्रकार की भाषा व्यवहार चिह्नित किए गए, यथा- 1. बातचीत, 2. कहासुनी, 3. तू तू मैं मैं, 4. हाथापाई, 5. मारपीट, और 6. खून खराबा। हर स्थिति में प्रयुक्त होने वाली शब्दावली अथवा अभिव्यक्तियाँ चुन लीं गईं थीं। तीसरे पाठ में यौन संबंधी गालियाँ सिखानी थीं। इसके लिए पहले तो निजी अंगों के नाम तथा उनके पर्याय आवश्यक थे। प्रोफेसर श्रीवास्तव ने पाठ देखा और प्रश्न किया। कक्षा छात्रों की नहीं, छात्राओं की है। पढ़ा पाएँगे? मेरी प्रतिक्रिया सहज थी, क्योंकि मैंने सोच लिया था कि जैसे रिश्तेनाते की शब्दावली सिखाई है, वैसे ही इन शब्दों का भी औपचारिक शिक्षण करँगा।


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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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