स्मृति के गलियारों से 4

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हिंदी शिक्षण की मौखिक कक्षाओं में अधिक समस्या नहीं थी, लेकिन लिपि शिक्षण एक असंभव कार्य-सा दिखने लगा। कारण यह था कि अपनी आयु के 25-30 वर्ष तक उसने यह कभी नहीं जाना था कि जो कुछ बोला जाता है, वह लिखा या पढ़ा भी जा सकता है। उसके लिए लिखने और पढ़ने का कोई महत्व ही न था। सारा कार्य मौखिक रूप से सम्पन्न हो जाता था। फिजी में वह गन्ने के खेत में काम करता था। वहाँ लिखने व पढ़ने की कोई भी आवश्यकता न थी।

संस्थान के सहयोगियों का पारस्परिक व्यवहार अकथनीय था। उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया और समस्या को हल करने का विश्वास दिलाया। विशेष रूप से महिला सहकर्मियों ने मेरी सहायता की और उन्होंने ही मुझे इस संकट से उभारा भी। मेरी पत्नी से उनकी दोस्ती ने काम लिया था। नौकरी भी बच गई और पारिवारिक जीवन भी। हाँ, मैंने सभी पाठों को सफलतापूर्वक सम्पूर्ण कर दिया।

संस्थान में आकृतिमूलकता के आधार पर लिपि सिखाई जाती है। प्रथम पाठ में 'न', 'ग' का अभ्यास होता है। लगभग दस दिन तक ये तीन शब्द सिखाने का प्रयत्न किया गया। हासिल कुछ न हुआ। सिखाने के बाद अगली कक्षा में, वह इन अक्षरों के नाम अपने मन से कुछ और ही बोलता था। इन अक्षरों के आधार पर बनने वाले शब्द भी वह मुक्त रूप से कुछ भी बोलता था। अध्यापकों का परिश्रम व्यर्थ हो रहा था। कागज पर लिखकर अक्षर सिखाने का कार्य हमने रोक लिया। इन अक्षरों का रूप गत्ते से काट कर बनाया। फिर एक-एक करके गत्ते के ये अक्षर छात्र को दिए गए। एक कक्षा में केवल एक अक्षर दिया जाता था। कुछ दिनों के परिश्रम से कार्य सिद्घ हो गया। गत्ते पर कटा अक्षर और उसका नाम छात्र को याद हो गया। वर्णमाला सिखाने का कार्य प्रगति कर रहा था। अब वह इन अक्षरों को प्रयत्नपूर्वक लिख भी लेता था।

'र', 'त', 'न' और 'ब' भी सीख लिए थे। इन अक्षरों से बनने वाले छोटे-छोटे शब्द भी लिखने लगा था।
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शब्द बोला गया 'बरतन'। कुछ दिक्कत के बाद उसने 'ब' अक्षर लिखा। फिर से शब्द बोला गया। छात्र ने आगे कुछ नहीं लिखा। दोनों हाथ मेज पर जोर से पटके और ठहाका मार कर हँसने लगा। बोला, "बरतन एक और मैंने दो बनाए। और कितने बनाऊँ?" अर्थात अब भी उसके मस्तिष्क में यह लक्ष्य पूरी तरह से नहीं बैठा था कि जगत में प्रस्तुत वस्तुओं को लिपि द्वारा अंकित किया जा सकता है, वस्तु के रूप-रंग द्वारा नहीं। पर्याप्त गहन अभ्यास के पश्चात ही वह अबोध कैविती छात्र देवनागरि लिपि सीख सका और उसका वह उन्मुक्त स्वभाव भी परिमार्जित हो गया। अब वह अंग्रेजी लिखने-पढ़ने की इच्छा भी व्यक्त करने लगा था।

संस्थान में कार्य करना चुनौतीपूर्ण तो है ही, पर मनोरंजक भी है। नव्यताओं के प्रयोग का अवसर मिलता रहता है। लक्षित उद्देश्य की पूर्ति होने पर अपार प्रसन्नता प्राप्त होती है। अनुभव तो यहाँ से जुड़े हर व्यक्ति के पास है। बस, ऐसे अवसर मिलते रहें, अवश्य व्यक्त होंगे।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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