स.पू.अंक-13,अक्टू-दिस-2011,पृ-121

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हिंदी भाषा को सीखने के प्रति जितनी जिज्ञासा ‘रामचरित मानस’ के कारण पैदा हुई। उतनी विश्व वाङम्य में किसी भी ग्रन्थ के कारण पैदा नहीं हो सकी। इसके लिए किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ी। किसी आन्दोलन का सहारा नहीं लिया गया, लोगों ने स्वान्त:सुखाय हिंदी को अपनाया। महिलाओं में ‘रामचरित मानस’ के प्रति सर्वाधिक रूचि रही। उन्होंने ‘रामचरित मानस’ पढ़ने के लिए ही हिंदी सीखी और साक्षर बनी। यद्यपि उन्हें साक्षर बनाने के लिए विद्यालय नहीं थे। अब तो छोटी कक्षाओं से लेकर उच्चतम कक्षाओं के पाठ्यक्रम में ‘रामचरित मानस’ का कोई–न–कोई प्रसंग अवश्य रहता है। उसके बिना हिंदी का ज्ञान अधूरा माना जाता है।

ऐसा नहीं है कि हिंदी भाषा–भाषी क्षेत्रों में ही ‘रामचरित मानस’ ने हिंदी के प्रति निष्ठा को बढ़ाया और उसे बनाये रखा वरन् हिंदीतर क्षेत्रों के निवासियों में, जो हिंदी भाषी नहीं हैं, यदि उनमें हिंदी निष्ठा जीवित है तो उसकी पृष्ठभूमि में वह रामकथा है जिसका वर्णन गोस्वामी तुलसी दास ने ‘रामचरित मानस’ में किया है। भारत में ही नहीं, हिंदी का ध्वज़ आज तो, विश्व के अनेक देशों में लहरा रहा है। डेढ़ सौ वर्ष पहले बिहार और उत्तर प्रदेश के गिरमिटिया मजदूर ‘रामचरित मानस’ का गुटका लेकर भारत से बाहर गये थे। उसी के सहारे वे वहाँ अपार कष्टों को झेलते हुए अपने धर्म और संस्कृति से जुड़े रहे। नेपाल, मारीशस, फिजी, थाईलैण्ड़, सुरीनाम, गुयाना, त्रिनीडाड़ टुबैगो आदि देशों में उन्हीं गिरमिटिया भारतीय मजदूरों की सन्तानें आज सत्ता और संस्कृति के चरमोत्कर्ष पर हैं। आज भी वे ‘रामचरित मानस’ से प्रेरणा लेकर भारत और हिंदी भाषा के प्रति आस्था से पूरित हैं। सच तो यह है कि गोस्वामी तुलसीदास की ‘रामचरित मानस’ ने ही हिंदी को विश्व भाषा के स्थान पर स्थापित किया है। आज तो एक सौ पैंतीस देशों के लोगों ने अपनी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार किया है। विश्व के अनेक देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है, तो इसके मूल में ‘रामचरित मानस’ ही है, जिसने प्रवासी भारतीयों को अपनी सभ्यता और संस्कृति से जुड़े रहकर जीने की प्रेरणा प्रदान की है।

रामकथा के गायक के रूप में गोस्वामी तुलसीदास ने धर्म और दर्शन का गायन किया है, जनता की भाषा में, बोलचाल की भाषा में, उन्होंने मानवीय मूल्यों का गायन किया है। इसी गायन को दोहराते हुए विदेशों में भारतीय प्रवासी ही नहीं, अन्य धर्मावलम्बी भी जीने की कला सीख सके हैं और बराबर सीख रहे हैं। मानवीय मूल्य किसी देश–काल की सीमा को नहीं स्वीकार करते। तुलसी ने राम को मानवता के पोषक के रूप में प्रस्तुत किया है। शाश्वत मानवीय मूल्यों की स्थापना और उनकी रक्षा करना तुलसी के राम का लक्ष्य है। इसीलिए उन्होंने मनुज तन धारण किया है। मानवीय मूल्य किसी धर्म विशेष की सीमा में भी नहीं बँधते वरन् वे स्वयं मानव धर्म बनते हैं। यह मानव धर्म हिंदू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिक्ख धर्म में भेद नहीं करता है। स्वाभाविक है कि जो ग्रन्थ इस प्रकार के वातावरण की सृष्टि करेगा, उसके प्रति अन्य धमावलम्बियों में भी आर्कषण पैदा होगा हुआ भी है। ऐसे अनेक विदेशी हैं जिन्होंने मूल ‘रामचरित मानस’ को पढ़ने के लिए हिंदी सीखी है और फिर उसी के कारण वे हिंदी में निष्णात बन सके हैं। ऐसे विद्वानों और मनीषियों में फादर कामिल बुल्के, जार्ज ग्रियर्सन, एच.एच. विल्सन, डॉ. एल.पी. तैस्तीतौरी, डॉ. जे.एन. कारपेण्टर, अकादमीशियन वारान्निकोव, सर शिवसागर रामगुलाम, वासुदेव पाण्डेय, छेदी जगन, अनिरूद्ध जगन्नाथ आदि के नाम ध्रुवतारे की भाँति प्रभा–मण्डित हैं और प्रभामण्डित है हिंदी भी जिसके प्रचार–प्रसार को उन्होंने अपना मिशन बनाया। ऐसी उत्प्रेरणा उन्हें ‘रामचरित मानस’ से ही प्राप्त हुई है।

विश्व के ऐसे अनेक देश हैं जहाँ के विश्वविद्यालयों से हिंदी के पाठ्यक्रम में ‘रामचरित मानस’ सम्मिलित है और उसे प्रतिष्ठापूर्ण स्थान प्राप्त है।

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समन्वय पूर्वोत्तर अक्टूबर-दिसम्बर 2011 अनुक्रम
क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
संगीत-साहित्य के महाप्राण हज़ारिका का महाप्रयाण : विशेष आलेख
1. संस्कृति के महानायक भूपेन हज़ारिका का महाप्रस्थान डॉ. नवकांत शर्मा 1
2. भूपेन हज़ारिका का जीवन दर्शन और व्यक्तित्व डॉ. दिलीप मेधि 4
3. आम आदमी की पीड़ा ही भूपेन हज़ारिका के गीत थे श्री रविशंकर रवि 17
4. सुधाकंठ डॉ. भूपेन हज़ारिका : असमिया जाति के अलिखित दस्तावेज डॉ. प्रवीन कोच 19
5. असमिया संगीत और डॉ. भूपेन हज़ारिका श्री गौतम पातर 22
6. डॉ. भूपेन हज़ारिका के गीतों में समाज संहति और संप्रीति का प्रस्फुटन श्री अखिल चंद्र कलिता 25
7. असम के सांस्कृतिक दूत भूपेन हज़ारिका डॉ. माधवेन्द्र 29
8. असम रत्न डॉ. भूपेन हज़ारिका की कुछ अनमोल रचनाएँ भाषांतरण सुश्री नन्दिता दत्त 33
9. डॉ. भूपेन हज़ारिका का निधन... कलाक्षेत्र की एक अपूर्णीय क्षति श्रीमती रीता सिंह ‘सर्जना’ 37
लोकमानस
लोककथा संकलन एवं भाषांतरण
1. राङगोला (कॉकबरक भाषा से) सुश्री रूपाली देबबर्मा 38
2. तीन भाई और एक बहन (पनार भाषा से) डॉ. संतोष कुमार 39
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5. जायीबोने (गालो भाषा से) सुश्री किस्टिना कामसी 43
लोकगीत संकलन एवं भाषांतरण
1. कोम जनजाति के पारंपरिक गीत (मणिपुर से) सुश्री टी. जेलेना कोम 44
2. का तिङआब (कौआ) (खासी भाषा से) श्रीमती जीन एस. ड्खार 47
कथा-मंजरी
भाषांतरित
1. प्रगति–गान (असमिया भाषा से) मूल श्री उमेश वैश्य 49
भाषांतरण श्रीमती काकोली गोगोई 49
2. श्रीमती इंदिरा : एक शोक गीत (मिजो भाषा से) मूल स्व. (श्रीमती) ललसाङजुआली साइलो 50
भाषांतरण श्री एच. वानलललोमा 50
दो कविताएँ
1. The Heart मूल प्रो. (श्रीमती) एस. ड्खार 51
हृदय भाषांतरण (श्रीमती) जीन एस. ड्खार 51
2. The Truth of Gender मूल प्रो. (श्रीमती) एस. ड्खार 51
लिंग की सच्चाई भाषांतरण (श्रीमती) जीन एस. ड्खार 51
मौलिक
1. खासी राजा शहीद उतिरोत सिंह डॉ. (श्रीमती) फिल्मिका मारबनियाङ 52
2. त्रिपुरेश्वरी का त्रिपुरा सुश्री खुमतिया देबबर्मा 53
3. सूख रहे दुनिया के प्राण श्री लालसा लाल ‘तरंग’ 54
4. अवश्य साथ देना डॉ. सीताराम अधिकारी 55
5. फूल सुश्री उमा देवी 56
6. मंच सुश्री विनीता अकोइजम 56
कथा-मंजरी भाषांतरित
1. श्रृंखल मूल डॉ. (श्रीमती) रूपश्री गोस्वामी 57
भाषांतरण सुश्री राजश्री देवी 57
मौलिक
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आलेख
संस्कृति और समाज
1. कारबि समाज का प्राचीन शैक्षिक डॉ. (श्रीमती) जूरि देवी 79
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5. हिंदी परसर्गीय पदबंध श्री चंदन सिंह 131
6. नागा भूमि एवं हिंदी प्रचार–प्रसार की स्थिति डॉ. वी.पी. फिलिप जुविच 135
7. नोक्ते जनजाति की मौखिक लोक साहित्य की लेखन समस्या देवनागरी लिपि एक समाधान डॉ. अरुण कुमार पाण्डेय 140
तुलनात्मक अंतरण
1. मोहन राकेश और ज्योति प्रसाद अगरवाला के नाटक श्री अमरनाथ राम 149
2. असमिया उपन्यासकार विरिंचि कुमार बरूआ और प्रेमचंद के उपन्यासों की नायिकाएँ श्री आब्दुल मतिन 154
3. प्रेमचंद एवं शरतचंद्र के कथा–साहित्य में स्त्री पात्र डॉ. दिनेश कुमार चौबे 157
समालोचन
1. हिंदी यात्रा साहित्य को नागार्जुन का प्रदेय डॉ. श्यामशंकर सिंह 162
2. स्वातंव्योत्तर हिंदी कविता में बदलती प्रणयानुभूति डॉ. (श्रीमती) अनीता पंडा 169
3. जातीय स्वाभिमान : दलित कहानियों के विशेष संदर्भ में सुश्री उमा देवी 175
4. जनजातीय हिंदी उपन्यास : परिचयात्मक विवेचन सुश्री खुमतिया देबबर्मा 179
भाषा-शिक्षण
1. मिज़ोरम और हिंदी शिक्षण डॉ. (श्रीमती) लुईस हाउनहार 185
2. हिंदी शिक्षण की समस्याएँ : सिक्किम के संदर्भ में श्रीमती छुकी लेप्चा 190
लोक-जीवन
1. डाक की उक्तियाँ और असमिया लोकजीवन में उसका प्रभाव सुश्री नंदिता दत्त 192
2. मणिपुरी लोकसाहित्य : एक पूर्वावलोकन डॉ. (श्रीमति) बेमबेम देवी 197
इतिहास
1. अरुणाचल प्रदेश का इतिहास लेखन डॉ. राजेश वर्मा 201
2. मदन-कामदेव मंदिर : असम का खजुराहो श्रीमति काकोली गोगोई 204
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1. स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना कनकलता बरूआ श्री अखिल चंद्र कलिता 206
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