स.पू.अंक-13,अक्टू-दिस-2011,पृ-131

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संदर्भ:

  1. सृजनगाथा – साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच–लेख: ‘अहिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी’ – डॉ. महीप सिंह, हिंदी विश्व, दिल्ली, प्रकाशन – 1.4.2008
  2. लेख – ‘पूर्वोत्तर और हिंदी’ लेखक – गोपाल प्रधान, samalochan.blogspot.com (posted by aruna dev) on 29.7.2011)
  3. ‘गवेषणा’ – अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान, भाषाशिक्षण तथा साहित्य चिंतन की पत्रिका, प्रधान संपादक – शंभुनाथ, संपादक– परमलाल अहिरवाल, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा, अंक 88, अक्टूबर – दिसंबर, 2007
  4. ‘सृजनगाथा’– साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच–लेख– ‘अहिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी –‘डॉ. महीप सिंह, हिंदी विश्व, दिल्ली।
  5. ‘आन्तर भारती’ लेख – ‘हिंदीत्तर प्रदेशों में हिंदी भाषा–शिक्षण’ – डॉ. विद्याश्री, रीडर एवं विभागाध्यक्षा, हिंदी विभाग़, महाराजा कालेज मैसूर विश्वविद्यालय, बनतर भारती प्रकाशन, सितम्बर – 11–2009

संपर्क सूत्र:
शोधार्थी, हिंदी विभाग
असम विश्वविद्यालय, सिलचर – 78801
मो. 09401425441

हिंदी परसर्गीय पदबंध

श्री चंदन सिंह
इसके विपरीत कभी एक ही परसर्ग के अनेक अर्थ निकल आते हैं तथा कभी परसर्ग योग या परसर्गवियोग से वाक्य विपरीत अर्थ देने लगता है, यथा ‘वह विद्यालय से लौट आया।’ में से यदि ‘से’ परसर्ग हटा दिया जाए तो वाक्य विपरीत अर्थ देगा।

1.परसर्ग:
परसर्ग भाषा विज्ञान में अध्ययन का एक प्रमुख व्याकरणिक पक्ष होता है तथा वाक्य संरचना को प्रभावित करता है। यद्यपि वाक्य के गठन में संज्ञा एवं क्रिया की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, क्रिया की तो केंद्रिय भूमिका होती है, फिर भी वाक्य का गठन इन्हीं से पूर्ण नहीं हो पाता। वाक्य के गठन में अव्यय, निपात, क्रियाविशेषण एवं परसर्ग आदि की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि वाक्य संरचना के संदर्भ में परसर्ग की भूमिका का अवलोकन करें तो यह स्पष्ट होता है कि हिंदी में परसर्ग से तात्पर्य उन कारक चिन्हों से होता है जो संज्ञा या सर्वनाम के बाद जोड़े जाते हैं तथा जिनका विकास स्वतंत्र शब्दों से हुआ है और इसलिए इनकी स्वतंत्र सत्ता है। यद्यपि परसर्गों के कोशीय अर्थ तो नहीं होते किंतु इनका व्याकरणिक प्रकार्य महत्वपूर्ण होता है। दूसरे शब्दों में परसर्ग कोशीय शब्द की भाँति ‘अर्थ’ के मुख्य वाहक नहीं होते, अपितु अर्थ संरचक होते हैं। व्याकरणिक शब्द होने के कारण उनके अभाव में वाक्य अव्याकरणिकता से आक्रांत हो जाते हैं। पुन: परसर्ग वाक्य के जिस घटक के साथ प्रयुक्त होता है, यदि उसमें परिवर्तन कर दिया जाए तो वाक्य संरचना ही बदल जाएगी और तब वाक्य का अर्थ भी परिवर्तित हो जाएगा। अत: वाक्य में परसर्गों का प्रयोग निश्चित अर्थ में निश्चित घटक के साथ करना चाहिए। हिंदी में ‘ने’, ‘को’, ‘से’, ‘में’, ‘पर’, ‘के’ मूल परसर्ग कहलाते हैं। इनके अतिरिक्त मिश्र व यौगिक परसर्ग भी होते हैं। परसर्ग वाक्य में शब्दों के तिर्यक रूपों के साथ प्रयुक्त होकर किसी कारक संबंध को अभिव्यक्त करते हैं।

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समन्वय पूर्वोत्तर अक्टूबर-दिसम्बर 2011 अनुक्रम
क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
संगीत-साहित्य के महाप्राण हज़ारिका का महाप्रयाण : विशेष आलेख
1. संस्कृति के महानायक भूपेन हज़ारिका का महाप्रस्थान डॉ. नवकांत शर्मा 1
2. भूपेन हज़ारिका का जीवन दर्शन और व्यक्तित्व डॉ. दिलीप मेधि 4
3. आम आदमी की पीड़ा ही भूपेन हज़ारिका के गीत थे श्री रविशंकर रवि 17
4. सुधाकंठ डॉ. भूपेन हज़ारिका : असमिया जाति के अलिखित दस्तावेज डॉ. प्रवीन कोच 19
5. असमिया संगीत और डॉ. भूपेन हज़ारिका श्री गौतम पातर 22
6. डॉ. भूपेन हज़ारिका के गीतों में समाज संहति और संप्रीति का प्रस्फुटन श्री अखिल चंद्र कलिता 25
7. असम के सांस्कृतिक दूत भूपेन हज़ारिका डॉ. माधवेन्द्र 29
8. असम रत्न डॉ. भूपेन हज़ारिका की कुछ अनमोल रचनाएँ भाषांतरण सुश्री नन्दिता दत्त 33
9. डॉ. भूपेन हज़ारिका का निधन... कलाक्षेत्र की एक अपूर्णीय क्षति श्रीमती रीता सिंह ‘सर्जना’ 37
लोकमानस
लोककथा संकलन एवं भाषांतरण
1. राङगोला (कॉकबरक भाषा से) सुश्री रूपाली देबबर्मा 38
2. तीन भाई और एक बहन (पनार भाषा से) डॉ. संतोष कुमार 39
3. झील का रहस्य (ताङसा भाषा से) सुश्री मैखों मोसाङ 40
4. कोरदुमबेला (मिजो भाषा से) श्री एच. वानलललोमा 42
5. जायीबोने (गालो भाषा से) सुश्री किस्टिना कामसी 43
लोकगीत संकलन एवं भाषांतरण
1. कोम जनजाति के पारंपरिक गीत (मणिपुर से) सुश्री टी. जेलेना कोम 44
2. का तिङआब (कौआ) (खासी भाषा से) श्रीमती जीन एस. ड्खार 47
कथा-मंजरी
भाषांतरित
1. प्रगति–गान (असमिया भाषा से) मूल श्री उमेश वैश्य 49
भाषांतरण श्रीमती काकोली गोगोई 49
2. श्रीमती इंदिरा : एक शोक गीत (मिजो भाषा से) मूल स्व. (श्रीमती) ललसाङजुआली साइलो 50
भाषांतरण श्री एच. वानलललोमा 50
दो कविताएँ
1. The Heart मूल प्रो. (श्रीमती) एस. ड्खार 51
हृदय भाषांतरण (श्रीमती) जीन एस. ड्खार 51
2. The Truth of Gender मूल प्रो. (श्रीमती) एस. ड्खार 51
लिंग की सच्चाई भाषांतरण (श्रीमती) जीन एस. ड्खार 51
मौलिक
1. खासी राजा शहीद उतिरोत सिंह डॉ. (श्रीमती) फिल्मिका मारबनियाङ 52
2. त्रिपुरेश्वरी का त्रिपुरा सुश्री खुमतिया देबबर्मा 53
3. सूख रहे दुनिया के प्राण श्री लालसा लाल ‘तरंग’ 54
4. अवश्य साथ देना डॉ. सीताराम अधिकारी 55
5. फूल सुश्री उमा देवी 56
6. मंच सुश्री विनीता अकोइजम 56
कथा-मंजरी भाषांतरित
1. श्रृंखल मूल डॉ. (श्रीमती) रूपश्री गोस्वामी 57
भाषांतरण सुश्री राजश्री देवी 57
मौलिक
1. गुरु–दक्षिणा श्री संजीब जायसवाल ‘संजय’ 60
2. नई सुबह श्रीमती रीता सिंह ‘सर्जना’ 66
3. तीन लघु प्रेरक कथाएँ डॉ. अकेलाभाइ 69
ललितनिबंध-मंजरी
1. बादलों को उतरने के लिए थोड़ी जगह दें' डॉ. अरूणेश ‘नीरन’ 72
2. पागल यौवन का विप्लवकारी महानर्तव डॉ. भरत प्रसाद 74
आलेख
संस्कृति और समाज
1. कारबि समाज का प्राचीन शैक्षिक डॉ. (श्रीमती) जूरि देवी 79
अनुष्ठान : जिरकेदाम (जिरछङ)
1. मणिपुरी संस्कृति की आधार भूमि मणिपुरी रास : प्रो. एच. सुवदनी देवी 86
2. दानवीर बलि के वंशज श्री शेखर ज्योतिशील 91
3. पूर्वोत्तर भारत की भाषा और संस्कृति पर अनुसंधान की असीम संभावनाएँ डॉ. संतोष कुमार 95
भक्ति-दर्शन
1. हिंदी एवं असमिया भक्ति काव्य समरूपता का सबल पक्ष : राष्ट्र के भावात्मक डॉ. राधेश्याम तिवारी 101
भाषा-चिंतन
1. हिंदी के प्रति दृष्टि – गांधी की डॉ. दिलीप मेधि 109
2. हिंदी के विकास में मानस का योगदान डॉ. राजेन्द्र परदेसी 120
3. पूर्वोत्तर भारत की भाषाएँ और संस्कृत–हिंदी का संबंध प्रो. शंभुनाथ 122
4. पूर्वोत्तर भारत में हिंदी : विकास की संभावनाओं का मूल्याँकन सुश्री एल. डिम्पल देवी 127
5. हिंदी परसर्गीय पदबंध श्री चंदन सिंह 131
6. नागा भूमि एवं हिंदी प्रचार–प्रसार की स्थिति डॉ. वी.पी. फिलिप जुविच 135
7. नोक्ते जनजाति की मौखिक लोक साहित्य की लेखन समस्या देवनागरी लिपि एक समाधान डॉ. अरुण कुमार पाण्डेय 140
तुलनात्मक अंतरण
1. मोहन राकेश और ज्योति प्रसाद अगरवाला के नाटक श्री अमरनाथ राम 149
2. असमिया उपन्यासकार विरिंचि कुमार बरूआ और प्रेमचंद के उपन्यासों की नायिकाएँ श्री आब्दुल मतिन 154
3. प्रेमचंद एवं शरतचंद्र के कथा–साहित्य में स्त्री पात्र डॉ. दिनेश कुमार चौबे 157
समालोचन
1. हिंदी यात्रा साहित्य को नागार्जुन का प्रदेय डॉ. श्यामशंकर सिंह 162
2. स्वातंव्योत्तर हिंदी कविता में बदलती प्रणयानुभूति डॉ. (श्रीमती) अनीता पंडा 169
3. जातीय स्वाभिमान : दलित कहानियों के विशेष संदर्भ में सुश्री उमा देवी 175
4. जनजातीय हिंदी उपन्यास : परिचयात्मक विवेचन सुश्री खुमतिया देबबर्मा 179
भाषा-शिक्षण
1. मिज़ोरम और हिंदी शिक्षण डॉ. (श्रीमती) लुईस हाउनहार 185
2. हिंदी शिक्षण की समस्याएँ : सिक्किम के संदर्भ में श्रीमती छुकी लेप्चा 190
लोक-जीवन
1. डाक की उक्तियाँ और असमिया लोकजीवन में उसका प्रभाव सुश्री नंदिता दत्त 192
2. मणिपुरी लोकसाहित्य : एक पूर्वावलोकन डॉ. (श्रीमति) बेमबेम देवी 197
इतिहास
1. अरुणाचल प्रदेश का इतिहास लेखन डॉ. राजेश वर्मा 201
2. मदन-कामदेव मंदिर : असम का खजुराहो श्रीमति काकोली गोगोई 204
व्यक्तित्व
1. स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना कनकलता बरूआ श्री अखिल चंद्र कलिता 206
2. महाराज कुमारी विम्बावती मंजरी : मणिपुरी मीरा प्रो. जगमल सिंह 208
लघु यात्रा-संस्मरण
1. एक नदी द्वीप में विकसित विशाल संस्कृति श्री अतुलेश्वर 212
साक्षात्कार
1. लेखक लिखे नहीं पढ़े भी साक्षात्कारकर्त्री : एन. कुंजमोहन सुश्री धनपति सुखाम 214
पुस्तक-समीक्षा
1. अज्ञेय के रचनाकर्म का एक अनछुआ पहलू समीक्षक “अज्ञेय और पूर्वोत्तर भारत” डॉ. जयसिंह ‘नीरद’ 218


वैयक्तिक औज़ार

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