स.पू.अंक-13,अक्टू-दिस-2011,पृ-141

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लिपि–उत्पत्ति के संदर्भ में कोई सर्वग्राह्य सिद्धान्त नहीं है। मनुष्य सभ्यता की शैशवास्था से ही अपनी वस्तुओं की पहचान सुरक्षित रखने हेतु विभिन्न चिह्नों का प्रयोग करता रहा है। वस्तुओं की पहचान के लिए अनेक प्रकार के चित्र बनाये जाते थे। पहाड़ों, नदियों, जीव–जन्तुओं और ऐसे अनेक विशिष्ट वस्तुओं का चित्र बनाकर उसे स्मरण रखा जाता था। ऐसा कोई विशेष उद्देश्य को ध्यान में रखकर नहीं किया जाता था। आदिम मनुष्य का यह स्वाभाविक प्रयत्न आगे चलकर चित्र लिपि के रूप में परिणत हो गया। आज तक उपलब्ध प्राचीनतम सामग्री के आधार पर कहा जा सकता है कि लिपि की उत्पत्ति 10000 ई. पू. से 4000 ई.पू. के बीच हुई। लिपि का प्राचीनतम और प्रारम्भिक रूप चित्र लिपि को माना जाता है। चित्र लिपि अपने समय में तब तक व्यापक प्रयोग में रही, जब तक निर्मित किये जाने वाले चित्र मूल में रहे। धीरे–धीरे विकसित होते हुए जब चित्र लिपि के सभी चित्र प्रतीकात्मक हो गये, तब उन चित्रों को सम्पूर्ण विश्व में एक ही प्रकार से समझने की क्षमता समाप्त हो गयी। इसके साथ ही इसकी सबसे बड़ी त्रुटि यह थी कि उनमें केवल स्थूल वस्तुओं का ही उल्लेख हो सकता था, सूक्ष्म तथा अमूर्त वस्तुओं का नहीं।

चित्र लिपि से उत्पन्न कठिनाईयों का समाधान करते–करते मानव समुदाय की बुद्धि किसी ऐसी लिपि की ओर अग्रसर हुई, जिसमें त्रुटियाँ कम से कम हों। इसी अनुसंधान के क्रम में भाव लिपि का विकास हुआ। भाव लिपि चित्र लिपि का ही विकसित रूप रही है। भाव लिपि में स्थूल वस्तुओं के चित्र निर्माण के साथ–साथ उसमें अंर्तनिहित भावों को भी अभिव्यक्त किया जाता था। चित्र लिपि में किसी पहाड़ का चित्र बनाने के लिए अनेक आड़ी–तिरछी रेखाओं की जरूरत होती थी, जो श्रम साध्य था। भाव लिपि में कुछेक रेखाओं के सहारे पर्वत का भाव उत्पन्न करना निश्चय ही सरल और सुबोध हो गया। चित्र लिपि की अपेक्षा भाव लिपि में संक्षिप्तता आ गयी। इस प्रकार भाव लिपि चित्र लिपि तथा सूत्र लिपि की अपेक्षा अधिक समुन्नत और अभिव्यक्ति कौशल में दक्ष रही है।

कालांतर में किसी वस्तु के भाव बोध के लिए उसका किया गया सूक्ष्म अंकन स्वाभाविक न होकर रूढ़ होता चला गया। वस्तु–बोध के लिए प्रयुक्त विशिष्ट संकेतों से उन्हीं समाज में भावों की अभिव्यक्ति हो सकती थी, जिनमें वे संकेत प्रचलित रहे हों। जैसे–जैसे समाज विकसित होता गया, विचारों का फैलाव बढ़ा। मनुष्य की प्रगतिशील बुद्धि एक ऐसी लिपि की रचना की ओर अग्रसर हुई, जिनके द्वारा ध्वनियों को लिखा जा सके। सतत अन्वेषण के पश्चात ध्वनि लिपि का विकास हुआ। चित्र और भाव के स्तर से ऊपर उठकर प्रत्येक ध्वनि को एक निश्चित रूप में लिखने की पद्धति का विकास इसकी महत्वपूर्ण उपलब्धि रही है। देवनागरी, रोमन, अरबी आदि लिपियाँ इसी कोटि में आती हैं।

देवनागरी लिपि की उत्पत्ति भारत की प्राचीनतम लिपि ‘ब्राह्मी’ से हुई है, ऐसा अनेक विद्वानों का मानना है। ब्राह्मी लिपि शुद्ध भारतीय लिपि रही है। देवनागरी, ब्राह्मी लिपि से उद्भूत है और दुनिया की श्रेष्ठ लिपि है, इसे अपनी तर्क की कसौटी पर प्रमाणित करते हुए गौरी शंकर हीराचन्द ओझा ने लिखा है, "मनुष्य की बुद्धि में सबसे बड़े मह्त्त्व के दो कार्य भारतीय ब्राह्मी लिपि और वर्तमान शैली के अंको की कल्पना है। इस बीसवीं शताब्दी में भी हम संसार की बड़ी उन्नतशील जाति की लिपियों की तरफ देखते हैं तो उनमें उन्नति की गंध भी नहीं पायी जाती। कहीं तो ध्वनि और उसके सूचक चिह्नों में साम्य ही नहीं है, जिससे एक ही चिह्न से एक से अधिक ध्वनियाँ प्रकट होती हैं और कहीं एक ही ध्वनि के लिए एक से अधिक चिह्नों का व्यवहार होता है और अक्षरों के लिए कोई शास्त्रीय क्रम ही नहीं है। कहीं लिपि वर्णात्मक नहीं किंतु चित्रात्मक ही है।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
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2. भूपेन हज़ारिका का जीवन दर्शन और व्यक्तित्व डॉ. दिलीप मेधि 4
3. आम आदमी की पीड़ा ही भूपेन हज़ारिका के गीत थे श्री रविशंकर रवि 17
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5. असमिया संगीत और डॉ. भूपेन हज़ारिका श्री गौतम पातर 22
6. डॉ. भूपेन हज़ारिका के गीतों में समाज संहति और संप्रीति का प्रस्फुटन श्री अखिल चंद्र कलिता 25
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मौलिक
1. खासी राजा शहीद उतिरोत सिंह डॉ. (श्रीमती) फिल्मिका मारबनियाङ 52
2. त्रिपुरेश्वरी का त्रिपुरा सुश्री खुमतिया देबबर्मा 53
3. सूख रहे दुनिया के प्राण श्री लालसा लाल ‘तरंग’ 54
4. अवश्य साथ देना डॉ. सीताराम अधिकारी 55
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तुलनात्मक अंतरण
1. मोहन राकेश और ज्योति प्रसाद अगरवाला के नाटक श्री अमरनाथ राम 149
2. असमिया उपन्यासकार विरिंचि कुमार बरूआ और प्रेमचंद के उपन्यासों की नायिकाएँ श्री आब्दुल मतिन 154
3. प्रेमचंद एवं शरतचंद्र के कथा–साहित्य में स्त्री पात्र डॉ. दिनेश कुमार चौबे 157
समालोचन
1. हिंदी यात्रा साहित्य को नागार्जुन का प्रदेय डॉ. श्यामशंकर सिंह 162
2. स्वातंव्योत्तर हिंदी कविता में बदलती प्रणयानुभूति डॉ. (श्रीमती) अनीता पंडा 169
3. जातीय स्वाभिमान : दलित कहानियों के विशेष संदर्भ में सुश्री उमा देवी 175
4. जनजातीय हिंदी उपन्यास : परिचयात्मक विवेचन सुश्री खुमतिया देबबर्मा 179
भाषा-शिक्षण
1. मिज़ोरम और हिंदी शिक्षण डॉ. (श्रीमती) लुईस हाउनहार 185
2. हिंदी शिक्षण की समस्याएँ : सिक्किम के संदर्भ में श्रीमती छुकी लेप्चा 190
लोक-जीवन
1. डाक की उक्तियाँ और असमिया लोकजीवन में उसका प्रभाव सुश्री नंदिता दत्त 192
2. मणिपुरी लोकसाहित्य : एक पूर्वावलोकन डॉ. (श्रीमति) बेमबेम देवी 197
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1. अरुणाचल प्रदेश का इतिहास लेखन डॉ. राजेश वर्मा 201
2. मदन-कामदेव मंदिर : असम का खजुराहो श्रीमति काकोली गोगोई 204
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