स.पू.अंक-13,अक्टू-दिस-2011,पृ-153

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नाटक के रूप में ‘शोणितकुँवरी’ में कोई दुर्बलता नहीं है, ऐसी बात नहीं है। उनके ‘शोणितकुँवरी’, ‘निमाती कईना’, ‘सोणपखिली’ आदि काव्यधर्मी नाटक हैं। जबकि ‘रूपालिम’,‘सोनपखिली’, ‘लभिता’, ‘खनिकर’, ‘कनकलता’, ‘सुन्दरकोवर’ आदि नाटकधर्मीय रचना हैं। उनकी ‘शोणितकुँवरी’एक पौराणिक आख्यानात्मक रचना है। जिस समय (1917) उन्होंने इस नाटक की रचना की थी, उस समय असम की जनता के बीच पौराणिक तथा ऐतिहासिक नाटकों का आदर था तथा इस प्रकार के नाटकों की भारी जनप्रियता थी। इसी अवसर पर 14 वर्ष की उम्र में ज्योति प्रसाद ने भी इसका फायदा उठाया। उन्होंने असम के एक अत्यन्त लोकप्रिय आख्यान को लेकर पहला नाटक लिखा है। उषा अनिरूद्ध का प्रेम, उनके गन्धर्व विवाह, चित्रलेखा की कुशलता, हरि–हर का युद्ध आदि इस नाटक में सम्पृक्त है। विषद मंच निर्देशन, नाटकीय सज्जा, आधुनिक नाटकों की तरह प्राचीन असमिया संगीत का व्यवहार, चुम्बन के दृश्य की अवतारणा आदि कारणों से ज्योति प्रसाद का यह नाटक आधुनिक नाट्य जगत का एक उत्कृष्ट दृष्टान्त है।

‘रूपालिम’ नाटक की कथावस्तु सम्पूर्णत: मोहन राकेश के ‘आधे–अधूरे’ तथा ‘पैर तले की जमीन’ की तरह काल्पनिक हैं। इसका चरित्र–चित्रण, परिवेश, गतिविधि आदि सभी दृष्टि से एक रोमांटिक नाटक है। ज्योति प्रसाद के इस नाटक पर बेल्जियम के नाटककार मोरिस मेटारलिंक के नाटक ‘मन्नाभेन्ना’ का प्रभाव पड़ता हुआ दिखाई पड़ता है। फिर भी ज्योति प्रसाद का यह ‘रूपालिम’ नाटक एक उत्कृष्ट रोमांटिक त्रासदी है। यह नाटकीयता गुण सम्पन्न एक क्षिप्र गतिशील नाटक है। संवाद, रचना शैली, चरित्र–चित्रण, नाटकीय गठन प्रणाली आदि विभिन्न दिशाओं में इसका महत्व अस्वीकार नहीं कर सकते। ‘लभिता’ 42 के स्वतंत्रता आन्दोलन तथा द्वितीय महायुद्ध की पृष्ठभूमि पर कतिपय वास्तविक घटनाओं पर आधारित नाटक है। उक्त समय पर असम के गाँवों में सेना की असंख्य टोलियाँ स्थापित हुई थीं। ग्रामीण असमिया युवक–युवतियाँ सेना के द्वारा अत्याचारित हुए थे। इनके अत्याचारों से अपनी इज्जत बचाने के लिए असंख्य युवतियाँ आत्मघाती हो गई थीं। इसी प्रकार की एक युवती इस नाटक की नायिका है। नाटककार ज्योति प्रसाद के अनुसार इस नाटक का कोई नायक–नायिका नहीं है। बल्कि समग्र असमिया जाति ही इस नाटक के नायक तथा नायिका हैं। ‘लभिता’ एक वास्तविक कथा वस्तु पर आधारित राजनैतिक नाटक है। राजनीति की दृष्टि से यह नाटक असमिया नाट्य साहित्य में अत्यन्त उल्लेखनीय नाटक है।

‘निमाती कन्या’ तथा ‘सोनपखिली’ उनके दो शिशु नाटक है। ‘सोनपखिली’ को वे पूरा नहीं कर पाए। आधुनिक असमिया नाटक और मंच के प्रति ज्योति प्रसाद की सबसे उल्लेखनीय देन है, उनका नाटक ‘कारेङर लिगिरी’। इस नाटक के सभी चरित्र तथा कथा वस्तु काल्पनिक है। किन्तु नाटकीय शैली, तकनीकी उपयोग आदि दिशाओं पर ‘कारेङर लिगिरी’ एक वास्तविक चिन्तामूलक सामाजिक नाटक है। ज्योतिप्रसाद के नाटकों में पाश्चात्य प्रभाव भी दिखाई पड़ता है। पहले रचित नाटकों में पाँच/सात अंक हैं। फिर परवर्ती नाटकों में तीन–तीन अंक हैं। मोहन राकेश की तरह उन्होंने भी रंगमंचीयता के प्रति पूरा–पूरा ध्यान रखा था। कथा वस्तु में भी कोई अवान्तर कथा की संयोजना किसी ने नहीं की है। दोनों के नाटकों में मूल कथा वस्तु को केन्द्र करके अति संक्षिप्त आकार में कम समय के अन्दर नाटक सम्पूर्ण किया गया है। दोनों के नाटकों में मूल विषय वस्तु, उपयुक्त वातावरण, चरित्र–चित्रण, परिस्थिति, द्वन्द्व, संवाद आदि की जो अति आवश्यकता अनुभव की गयी थी, उन्हीं की संयोजना की गयी थी। ज्योतिप्रसाद के चरित्र सृष्टि में भी विचित्रता थी। उनके नाटकों में मोहन राकेश के नाटकों की तरह अल्पसंख्यक चरित्रों का समावेश किया गया है।

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समन्वय पूर्वोत्तर अक्टूबर-दिसम्बर 2011 अनुक्रम
क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
संगीत-साहित्य के महाप्राण हज़ारिका का महाप्रयाण : विशेष आलेख
1. संस्कृति के महानायक भूपेन हज़ारिका का महाप्रस्थान डॉ. नवकांत शर्मा 1
2. भूपेन हज़ारिका का जीवन दर्शन और व्यक्तित्व डॉ. दिलीप मेधि 4
3. आम आदमी की पीड़ा ही भूपेन हज़ारिका के गीत थे श्री रविशंकर रवि 17
4. सुधाकंठ डॉ. भूपेन हज़ारिका : असमिया जाति के अलिखित दस्तावेज डॉ. प्रवीन कोच 19
5. असमिया संगीत और डॉ. भूपेन हज़ारिका श्री गौतम पातर 22
6. डॉ. भूपेन हज़ारिका के गीतों में समाज संहति और संप्रीति का प्रस्फुटन श्री अखिल चंद्र कलिता 25
7. असम के सांस्कृतिक दूत भूपेन हज़ारिका डॉ. माधवेन्द्र 29
8. असम रत्न डॉ. भूपेन हज़ारिका की कुछ अनमोल रचनाएँ भाषांतरण सुश्री नन्दिता दत्त 33
9. डॉ. भूपेन हज़ारिका का निधन... कलाक्षेत्र की एक अपूर्णीय क्षति श्रीमती रीता सिंह ‘सर्जना’ 37
लोकमानस
लोककथा संकलन एवं भाषांतरण
1. राङगोला (कॉकबरक भाषा से) सुश्री रूपाली देबबर्मा 38
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3. झील का रहस्य (ताङसा भाषा से) सुश्री मैखों मोसाङ 40
4. कोरदुमबेला (मिजो भाषा से) श्री एच. वानलललोमा 42
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लोकगीत संकलन एवं भाषांतरण
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2. का तिङआब (कौआ) (खासी भाषा से) श्रीमती जीन एस. ड्खार 47
कथा-मंजरी
भाषांतरित
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2. श्रीमती इंदिरा : एक शोक गीत (मिजो भाषा से) मूल स्व. (श्रीमती) ललसाङजुआली साइलो 50
भाषांतरण श्री एच. वानलललोमा 50
दो कविताएँ
1. The Heart मूल प्रो. (श्रीमती) एस. ड्खार 51
हृदय भाषांतरण (श्रीमती) जीन एस. ड्खार 51
2. The Truth of Gender मूल प्रो. (श्रीमती) एस. ड्खार 51
लिंग की सच्चाई भाषांतरण (श्रीमती) जीन एस. ड्खार 51
मौलिक
1. खासी राजा शहीद उतिरोत सिंह डॉ. (श्रीमती) फिल्मिका मारबनियाङ 52
2. त्रिपुरेश्वरी का त्रिपुरा सुश्री खुमतिया देबबर्मा 53
3. सूख रहे दुनिया के प्राण श्री लालसा लाल ‘तरंग’ 54
4. अवश्य साथ देना डॉ. सीताराम अधिकारी 55
5. फूल सुश्री उमा देवी 56
6. मंच सुश्री विनीता अकोइजम 56
कथा-मंजरी भाषांतरित
1. श्रृंखल मूल डॉ. (श्रीमती) रूपश्री गोस्वामी 57
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मौलिक
1. गुरु–दक्षिणा श्री संजीब जायसवाल ‘संजय’ 60
2. नई सुबह श्रीमती रीता सिंह ‘सर्जना’ 66
3. तीन लघु प्रेरक कथाएँ डॉ. अकेलाभाइ 69
ललितनिबंध-मंजरी
1. बादलों को उतरने के लिए थोड़ी जगह दें' डॉ. अरूणेश ‘नीरन’ 72
2. पागल यौवन का विप्लवकारी महानर्तव डॉ. भरत प्रसाद 74
आलेख
संस्कृति और समाज
1. कारबि समाज का प्राचीन शैक्षिक डॉ. (श्रीमती) जूरि देवी 79
अनुष्ठान : जिरकेदाम (जिरछङ)
1. मणिपुरी संस्कृति की आधार भूमि मणिपुरी रास : प्रो. एच. सुवदनी देवी 86
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3. पूर्वोत्तर भारत की भाषा और संस्कृति पर अनुसंधान की असीम संभावनाएँ डॉ. संतोष कुमार 95
भक्ति-दर्शन
1. हिंदी एवं असमिया भक्ति काव्य समरूपता का सबल पक्ष : राष्ट्र के भावात्मक डॉ. राधेश्याम तिवारी 101
भाषा-चिंतन
1. हिंदी के प्रति दृष्टि – गांधी की डॉ. दिलीप मेधि 109
2. हिंदी के विकास में मानस का योगदान डॉ. राजेन्द्र परदेसी 120
3. पूर्वोत्तर भारत की भाषाएँ और संस्कृत–हिंदी का संबंध प्रो. शंभुनाथ 122
4. पूर्वोत्तर भारत में हिंदी : विकास की संभावनाओं का मूल्याँकन सुश्री एल. डिम्पल देवी 127
5. हिंदी परसर्गीय पदबंध श्री चंदन सिंह 131
6. नागा भूमि एवं हिंदी प्रचार–प्रसार की स्थिति डॉ. वी.पी. फिलिप जुविच 135
7. नोक्ते जनजाति की मौखिक लोक साहित्य की लेखन समस्या देवनागरी लिपि एक समाधान डॉ. अरुण कुमार पाण्डेय 140
तुलनात्मक अंतरण
1. मोहन राकेश और ज्योति प्रसाद अगरवाला के नाटक श्री अमरनाथ राम 149
2. असमिया उपन्यासकार विरिंचि कुमार बरूआ और प्रेमचंद के उपन्यासों की नायिकाएँ श्री आब्दुल मतिन 154
3. प्रेमचंद एवं शरतचंद्र के कथा–साहित्य में स्त्री पात्र डॉ. दिनेश कुमार चौबे 157
समालोचन
1. हिंदी यात्रा साहित्य को नागार्जुन का प्रदेय डॉ. श्यामशंकर सिंह 162
2. स्वातंव्योत्तर हिंदी कविता में बदलती प्रणयानुभूति डॉ. (श्रीमती) अनीता पंडा 169
3. जातीय स्वाभिमान : दलित कहानियों के विशेष संदर्भ में सुश्री उमा देवी 175
4. जनजातीय हिंदी उपन्यास : परिचयात्मक विवेचन सुश्री खुमतिया देबबर्मा 179
भाषा-शिक्षण
1. मिज़ोरम और हिंदी शिक्षण डॉ. (श्रीमती) लुईस हाउनहार 185
2. हिंदी शिक्षण की समस्याएँ : सिक्किम के संदर्भ में श्रीमती छुकी लेप्चा 190
लोक-जीवन
1. डाक की उक्तियाँ और असमिया लोकजीवन में उसका प्रभाव सुश्री नंदिता दत्त 192
2. मणिपुरी लोकसाहित्य : एक पूर्वावलोकन डॉ. (श्रीमति) बेमबेम देवी 197
इतिहास
1. अरुणाचल प्रदेश का इतिहास लेखन डॉ. राजेश वर्मा 201
2. मदन-कामदेव मंदिर : असम का खजुराहो श्रीमति काकोली गोगोई 204
व्यक्तित्व
1. स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना कनकलता बरूआ श्री अखिल चंद्र कलिता 206
2. महाराज कुमारी विम्बावती मंजरी : मणिपुरी मीरा प्रो. जगमल सिंह 208
लघु यात्रा-संस्मरण
1. एक नदी द्वीप में विकसित विशाल संस्कृति श्री अतुलेश्वर 212
साक्षात्कार
1. लेखक लिखे नहीं पढ़े भी साक्षात्कारकर्त्री : एन. कुंजमोहन सुश्री धनपति सुखाम 214
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