स.पू.अंक-13,अक्टू-दिस-2011,पृ-175

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जातीय स्वाभिमान : दलित कहानियों के विशेष संदर्भ में

सुश्री उमा देवी
समकालीन दलित कहानियाँ दलित अस्मिता की लड़ाई का एक ऐसा पक्ष भी सामने लाती है, जहाँ दलित स्त्रियाँ अपने यौन-शोषण और शारीरिक शोषण के विरूद्ध उठ खड़ी हुई है।

साहित्य को जनता की चित्रवृत्ति का संचित प्रतिबिंब माने या समाज का दर्पण दोनों ही स्थितियों में साहित्य समाज का आइना होता ही है। इस परिपेक्ष्य में देखें तो अस्सी के बाद का समय भारतीय साहित्य में सामाजिक – राजनैतिक दृष्टि से काफी उथल–पुथल का समय रहा है। तत्कालीन समस्याओं और घटनाओं–परिघटनाओं ने हिंदी कथा साहित्य को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। अनेक विमर्शों और विचारधाराओं में समकालीन जीवन सपांदित होने लगा। सबसे ज्यादा प्रभावकारी रहें स्त्री–विमर्श और दलित विमर्श। इन दोनों विमर्शो को हिंदी कहानियों ने एक नया मुकाम दिया है। दलित कहानियों में डॉ। अम्बेडकरवादी विचारधारा को लेकर कहानीकार दलितों में जातीय स्वाभिमान की भावना जगा रहे हैं। डॉ. अम्बेडकर ने स्वयं कहा है : “मुझे गर्व है कि मैं दलित समाज में पैदा हुआ हूँ”[1]

बाबा साहब के इन्हीं विचारों ने सदियों से वंचित, शोषित और पीड़ित समाज को एक नई आशा दी है। आज वे भी अपने दलित होने पर गर्व करने लगे हैं। अपने खोए हुए स्वाभिमान और आत्मसम्मान को पुन: पाने के लिए संघर्षरत है। उनमें परिवर्तन की चाह जगी है। समकालीन दलित कहानीकार समाज–व्यवस्था के विरोधी रूपों को अपनी कहानियों में उजागर कर उनसे मुक्ति की प्रेरणा दे रहे हैं – “अंबेडकरवादी कहानीकारों ने दूसरी दुनिया के यथार्थ के विविध स्तर पर होने वाले बदलाव को उनकी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक आकांक्षाओं, उनके दुखदर्द, उन पर होने वाले अमानवीय अत्याचारों और क्रूरताओं और उससे उत्पन्न संघर्षशील चेतना के विविध रूपों को बड़ी ही ईमानदारी से अपनी कहानियों मे अभिव्यक्त किया हैं।”[2]

भारतीय समाज में कर्म जातीय आधार पर बाँटे गए हैं। जहाँ दलित समाज निकृष्ट और घृणित समझे जाने वाले कामों को करने के लिए मजबूर है। उसे सवर्णो की तरह सम्मानजनक व्यवसाय करके जीवन–यापन करने का अधिकार न था। किन्तु आज दलित अपने दलितपन को अपनी कमजोरी बनने देना नहीं चाहता। तब भी समाज के अन्य वर्गों की तरह सम्मान का जीवन जीना चाहता है। वह भूखे मर सकता है किन्तु अपनी अस्मिता और स्वाभिमान से समझोता करना नहीं चाहता। मोहनदास नैमिशराय की कहानी ‘हमारा जवाब’[3] का नायक हिम्मत सिंह मिठाई बेचता है। सवर्ण उसे अछूत और गंदी जात का कहकर मिठाई बेचने से रोकते हैं। अत: उसकी हत्या कर दी जाती है। वह अंतिम साँस तक स्वाभिमान की लड़ाई लड़ता रहा, क्योंकि वह मिठाई बेच रहा था ‘जात’ नहीं। किन्तु तथाकथित आभिजात्य वर्ग ये समझना ही नहीं चाहता। इसी प्रकार सूरजपाल चौहान की कहानी ‘परिवर्तन की बात’[4] में किसना ठाकुर की मरी गाय उठाने से मना कर देता है। वह समय के साथ बदलना चाहता है – “अब समय बदल रहा है – हम दूसरा अन्य कोई भी काम कर अपना पेट भर लेंगे लेकिन मरा जानवर हम नहीं उठाएंगे।”[5] दूसरी ओर अपनी श्रेष्ठता बोध से ग्रसित समाज उनकी प्रगति और परिवर्तन की चाह को रौंदने का यथासंभव प्रयत्न करता रहा है। जयप्रकाश कर्दम की ‘सांग’[6] कहानी भी दलित मजदूरों पर हो रहे जुल्म, अत्याचार और उत्पीड़न के विरूद्ध संघर्ष की चेतना जगाती है।

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पाठ–टिप्पणी

  1. भूमिका – दलित साहित्य सृजन के संर्दभ: डॉ. पुरूषोत्तम सत्यप्रेमी, कुमार पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली।
  2. अम्बेडकरवादी साहित्य का समाजशास्त्र : डॉ. तेज सिंह. पृष्ठ 285, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली – 2007 ई.
  3. हमारा जवाब : मोहनदास नैमिशराय, पृष्ठ – 48, श्रीनटराज प्रकाशन, दिल्ली।
  4. परिवर्तन की बात : सूरजपाल चौहान, हैरी कब आएगा (संग्रह), पृष्ठ 17
  5. वही, पृ. 21
  6. सांग : जयप्रकाश कर्दम, पृष्ठ 5, सं. डॉ. कुसुमवियागी ‘चर्चित दलित कहानियाँ’।

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