स.पू.अंक-13,अक्टू-दिस-2011,पृ-38

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लोकमानस

लोककथा

राडगोला (रुपये का खजाना)

(कॉकबरक भाषा से)
संकलन एवं भाषातंरण- सुश्री रूपाली देबबर्मा
आयचुक की अच्छी कमाई के कारण परिवार की स्थिति में सुधार आ गया किन्तु इसके साथ ही आयचुक के माता–पिता को धन की लालच भी बढ़ाती गयी।


यह त्रिपुरा राज्य के गाँव की एक लोक कथा है।

किसी गाँव में एक किसान का परिवार रहता था। परिवार में एक बेटा आयचुक व पत्नी थी। आयचुक के किसान पिता को बचपन से ही खेती बाड़ी संभालनी पड़ी थी। जिसके कारण पढ़ाई–लिखाई नसीब नहीं हो सकी थी। इसलिए किसान अपने बेटे को पढ़ाकर अपनी इच्छा को पूरी करना चाहता था। वह अपने पुत्र को दिन–रात मेहनत करके उसे पढ़ाई करने के लिए शहर भेज देता है। जिस स्कूल में आयचुक पढ़ता था उसी स्कूल में उसके गाँव के जमींदार का पुत्र फानगुनाङ (शक्तिशाली) नाम का लड़का भी पढ़ता था। फानगुनाङ पढ़ाई में कमजोर होने के कारण आयचुक से पीछे रह गया और आगे की पढ़ाई छोड़नी पड़ी। जिसके कारण वह मन ही मन आयचुक से ईर्ष्या करने लगा और उसे हर समय अपने से नीचा दिखाने के लिए मौका ढूँढ़ता था। जब आयचुक पढ़ लिखकर एक सफल व्यक्ति बन गया और नए विचारों के कारण पढ़ी–लिखी पत्नी भी मिली। अब वह एक बेटे का पिता भी है। आयचुक की अच्छी कमाई के कारण परिवार की स्थिति में सुधार आ गया किन्तु उसके साथ ही आयचुक के माता–पिता को धन का लालच भी बढ़ता गया। एक दिन फानगुनाङ को पता चला और अब उसे बदला लेने का अच्छा अवसर मिल गया। चूंकि आयचुक के माता–पिता अनपढ़ होने के कारण अंधविश्वासों पर भी विश्वास करते थे। इसका फायदा उठाने के लिए फानगुनाङ ने एक आदमी को रूपये का लालच दिलाकर साधुवेश में भेजा। उस गाँव के रास्ते में गुजरते हुए लोग साधु बाबा को हाथ दिखाने लगे। एक दिन आयचुक के माता–पिता को भी पता चला और दोनों हाथ दिखाने के लिए साधु के पास आए। साधु ने दोनों के हाथों की रेखा को पढ़कर आश्चर्य के साथ कहा कि ––– अरे ॐ तुम दोनों तो लखपति हो सकते हो यह बात सुनकर वे दोनों निराश हो जाते हैं और कहते हैं कि हमारे नसीब में कहाँ लखपति होना लिखा है। इस पर साधु दोनों के कान के पास जाकर कहता है, तुम्हारा खजाना तुम्हारे घर में ही मौजूद है परन्तु उसे प्राप्त करने के लिए तुम्हारे पोते की बलि चढ़ानी होगी। परन्तु यह तभी सफल होगा जब यह बात गुप्त रखी जाए। हो सके तो यह काम जल्दी करो जितना जल्दी करोगे उतना ही तुम दोनों के लिए फायदेमंद होगा यह कहकर साधु चला जाता है। दोनों पति–पत्नी सोच में पड़ जाते हैं कि अब क्या किया जाए। एक दिन फिर से साधु आता है और कहता है कि अब तुम्हारे पास एक दिन का ही समय है। वरना यह खजाना किसी और के पास चला जाएगा। यह सुनते ही दोनों अपने पोते की बलि चढ़ाने के लिए अवसर ढूंढ़ने लगे। उसके अगले दिन अवसर मिल जाता है। जब उनकी बहू व बेटा बाहर जाते समय अपना बच्चा सौंप जाते हैं और उस बच्चे को लेकर दोनों पति–पत्नि साधु के पास जाते हैं। साधु कहता है कि बच्चे की बलि अभी चढ़ायी जायेगी।

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