स.पू.अंक-13,अक्टू-दिस-2011,पृ-43

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जब वह घर पहुँची तो उसकी पत्नी उसे बिल्कुल पहचान न पाई कि यही उसका पति है। उसकी पत्नी कहने लगी – “औरों के तो बड़े सुंदर सपूत देखने को मिलते रहते हैं, एक मेरे वो हैं, इतने बदसूरत और खूँसट, आएगा तो फिर यहीं न, उसके चेहरे को देखकर पूरी तरह ऊब चुकी हूँ, मैं।” पति ने कहा – “मैं वही कोरदुमबेला ही तो हूँ।” उसकी पत्नी अश्चर्य से आँखें फाड़–फाड़कर उसे देखने लगी फिर अपने पति से बेहद प्यार करने लगी। अपने पिता का जाल भी लौटा आई। पहले वह अपने माइके जाती तो देर–देर तक रह जाती थी, पर इस बार दरवाजे से ही अंदर की ओर उछालती हुई – “यह लीजिए आपका जाल” करकर तुरंत लौट कर चली आई। उसके पिता ने “अरे क्या बात हो गई? पिछले दिनों जब हमारे घर आती थी तो घंटों रूककर लौटती थी., आज इतनी हड़बड़ाहट ?” पिता भी उनके घर जा पहुँचा। अपने दामाद कोरदुमबेला से मिला। उसके इतने अच्छे हो जाने के बारे में पूछताछ की। कोरदुमबेला ने भी मछली पकड़ने, नहाने आदि सभी के बारे में कह सुनाया।

राजा में भी एक सुंदर पुरूष बनने की लालसा जाग उठी। वह भी नदी में जा उतरा। उसने एक दूसरी किस्म की मछली को पकड़ा भी। उस मछली ने भी उससे वही बात कही – “मुझे छोड़ दो तो तुम्हारी भलाई की बात कहूँ। जाकर नहाओ और खुरदरे पत्थर से अपने बदन को रगड़ो,” यह सुन राजा बहुत खुश हुआ और सहर्ष जाकर नहाने लगा और उसने अपने बदन को खुरदुरे पत्थर से खूब रगड़ा। नहाने के बाद जब उसने स्वयं को परखा तो उसका पूरा बदन खुरदरा हो गया था यहाँ तक कि उसका चेहरा कुरूप और भयानक हो गया था। वह घर पहुँचा। जिस किसी ने भी उसे देखा डर के मारे भाग गए। अब तो उससे सब डरने लग गए थे। राजा को बड़ी चिंता हुई। लोग पूछने लगे – “हे राजन आपको यह क्या हो गया है ? इतने कुरूप और बदसूरत ? राजा कोरदुमबेला पर लांछन लगाते हुए कहा– “कोरदुमबेला के कहने के अनुसार मैं भी नदी में गया और एक मछली पकड़ डाली, इस मछली ने मुझसे कहा – “जाकर नहाओ और खुरदुरे पत्थर से अपने बदन को रगड़ो।” “मैंने वैसा ही किया जैसे उसने कहा था परंतु अच्छा और सुंदर होने के बजाय मैं और अधिक कुरूप हो गया,” राजा ने अपनी बात पूरी की।

संपर्क सूत्र:
प्रवक्त्ता, हिंदी, डाइट,:
आइजोल, मिजोरम, मो. 09615820493

जायीबोने

(गालो भाषा से)
संकलन एवं भाषांतरण- सुश्री क्रिस्टिना कामसी
धरती की राजकुमारी और जल के राजा के वियोग में संसार में प्रलय सृष्टि हो गई। नद–नदी, पर्वत चट्टान और पेड़–पौधे सब नष्ट हो गये। इस प्रकार प्रलय में कितने हिरन अपनी हिरनी से बिछड़ गये।

‘जायीबोने’ की कहानी एक गीति कथा है। इसे लोक–गीतों के रूप में भी बखान करते हैं। यह प्रेम, बेवफा तथा प्रतिशोध से भरी एक नाटिका भी है जायीबोने धरती की बेटी थी। वह इतनी सुन्दर थी कि हाथ लगते ही मैली हो जाए। देखने वाले यही कहते यह सचमुच रूप और लावण्य की देवी है। सूर्य में गर्मी और चन्द्रमा में धब्बे है, त्रिभुवन में उसकी उपमा के लिए कुछ भी नहीं है।

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