हिंदी का विश्वरूप

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लेखक- अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी

स्वर्ण जयंती के अवसर पर 15 वर्षों से संस्थान के गुवाहाटी केंद्र के साथ अपने घनिष्ठ संबंधों का स्मरण करना छोड़ कर दूसरी प्रासंगिक बात क्या हो सकती है। संस्थान का गुवाहाटी केंद्र पूर्वोत्तर भारत में स्थापित होने वाला सबसे पुराना केंद्र है। इस केंद्र के प्रयासों से पूर्वोत्तर भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार तथा तुलनात्मक भाषा/साहित्य के क्षेत्र में सार्थक अध्ययन को नई दिशा मिली। मैं इस संस्थान के कार्यकलाप से इन 15 वर्षों से जुड़ा रहा हूँ और इस बीच अब अनुवाद पाठ्यक्रम यहाँ संचालित हुआ तो उसमें अतिथि अध्यापक भी रहा हूँ।

वर्ष 1996 की वह दुपहरी, डॉ. अश्विनी कुमार श्रीवास्तव ने मुझे संस्थान के नवीकरण पाठ्यक्रमों में बुलाया था अध्यापन के लिए। स्वाधीनता सेनानी भवन के स्वागत कक्ष में धवल कुर्ते पायजामे में असम के विदग्ध विद्वान और विनम्र हिंदी सेवी डॉ. परेशचंद्र देवशर्मा सोफे पर बैठे प्रगल्भ हास बिखेर रहे थे। उनके नाम और कीर्ति से परिचय था ही, अब साक्षात देख रहा हूँ। संस्थान के गुवाहाटी केंद्र की गतिविधियों का यह उत्कर्ष काल था।

इस समय संस्थान का यह केंद्र गणेशगुड़ी में कामरूप होटल के पास दूसरी मंजिल पर स्थित था। एक तरफ कार्यालय कक्ष और दूसरी ओर कक्षा एवं अतिथिगृह था। वर्ष 1997 में यहाँ एक संगोष्ठी का आयोजन हुआ था। 'पूर्वोत्तर भारत में हिंदी की दिशा-दिशा' पर। मैंने तत्कालीन केंद्र प्रभारी डॉ. हेमराज मीणा 'दिवाकर' के साथ मिलकर इस संगोष्ठी के विशेषज्ञों की सूची तैयार की और उनके अल्पाहार की जिम्मेदारी संभाली। मुझे इस संगोष्ठी में एक पर्चा पढ़ना था। पर समयाभाव की वजह से ऐसा न हो पाया।

यह संगोष्ठी मेरे लिए पूर्वोत्तर भारत में हिंदी का विश्वरूप दर्शन जैसी थी।

डॉ. बी. कुमार, डॉ. देवराज और जगमल सिंह सदृश समर्पित तथा समर्थ अध्यापकों एवं व्रती हिंदी सेवियों से मिलने का यह पहला और अत्यंत ही विरल अवसर था। इस संगोष्ठी के बाद डॉ. रवि प्रकाश गुप्त, केंद्र प्रभारी के रूप में आये। उनके आगमन से संस्थान को एक नई रौनक मिली। वे इसके बाद विदेश की प्रतिनियुक्ति पर चले गये। फिर डॉ. शकुन्तलम्मा रेड्डी और उनके कर्मठ सहयोगी यथा डॉ. एम. ज्ञानम ने मिलकर संस्थान की शैक्षिक गतिविधियों को नये आयाम दिये। पहली बार संस्थान ने राजभाषा से जुड़े कर्मचारियों का सप्ताह भर की अवधि का पुनश्चर्या पाठ्यक्रम चलाया।

डॉ. रवि प्रकाश गुप्त ने विदेश से लौटने के बाद, गुवाहाटी केंद्र का कार्य संभाला और लंबे समय तक यहाँ रहे। उनके कार्यकाल में ही केंद्र प्रभारी का पदनाम क्षेत्रीय निदेशक हुआ। अब संस्थान का गणेशगुड़ी भवन के आगे पानी जमने लगा था।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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