हिंदी की ज्योति

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लेखक- प्रो. वी. रा. जगन्नाथन
प्रो. वी. रा. जगन्नाथन

संस्थान गीत की एक पंक्ति है- 'जन-जन का पथ ज्योतिर्मय हो'। भारत जननी एक हृदय हो।' यह बड़ी सारगर्भित उक्ति है, जो भाषा के माध्यम से लोगों के जीवन में ज्योति जलाने की बात कहती है। इसी आशय की दूसरी उक्ति है भारतेंदु की, जब वे कहते हैं 'निज भाषा उन्नति अहै'। हम भाषा के शक्तिमान स्वरूप को आधुनिक युग में ही अधिक स्पष्ट रूप से समझने लगे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी चिंतन के महत्व को सही परिप्रेक्ष्य में देखा जाने लगा है। वही समाज उन्नति कर सकता है, जो मौलिक चिंतन में प्रवृत्त हो। जिस व्यक्ति में चिंतन करने की शक्ति न हो, वह सृजनशील नहीं बन सकता। यह भी निर्विवाद सत्य है कि व्यक्ति अपनी भाषा में ही चिंतन कर सकता है, परायी भाषा का काम चलाऊ ज्ञान उसे कार्य निपटाने का कौशल तो प्रदान कर सकता है, मौलिक चिंतन और सृजनात्मक शक्ति प्रदान नहीं कर सकता।

भारत में 1975 के आस-पास भाषा के नाम पर पहला विश्वविद्यालय बना। यहाँ तंजाऊर नगर में स्थापित तमिल विश्वविद्यालय था। उस समय इस संदर्भ में कुछ विवादी स्वर उठे थे। कुछ लोगों का कहना यह था कि केवल एक भाषा के नाम पर एक विश्वविद्यालय कैसे बन सकता है। सवाल उठाने वालों के मन में शायद यही भावना थी कि तमिल की भूमिका इतनी ही तो है कि वह बी. ए. में अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाई जाती है और कुछ लोग विशेष अध्ययन कर बी. ए. या एम. ए. की उपाधि प्राप्त कर लेते हैं। फिर विश्वविद्यालय की आवश्यकता क्या है? उनकी दृष्टि पाठ्यचर्चा विकास तक ही सीमित रही।

आधुनिक युग में भाषाविज्ञान के बढ़ते प्रभाव के कारण हम भाषाओं के महत्व को समझने लगे हैं। गणित का विषय क्षेत्र संख्याओं का गुणा-भाग करना है, भौतिक विज्ञान का विषय क्षेत्र विद्युत शक्ति, ऊर्जा, बल, चुंबकत्व आदि वस्तुओं के गुणों का अध्ययन करना है। इस तरह भाषा के अध्ययन की वस्तु क्या है? वास्तव में भाषा पाठ्यक्रमों की अपनी कोई विषय वस्तु नहीं है, दूसरी तरफ यह भी कह सकते हैं कि ब्रह्मांड की सभी चीजें भाषा के अध्ययन की वस्तु हो सकती हैं। हम भौतिक जगत का विश्लेषण और व्याख्या करते हैं, अपने इतिहास और अपनी संस्कृति का वर्णन करते हैं, एक दूसरे से अपनी आवश्यकताओं और मनोभावों का आदान-प्रदान करते हैं। वास्तव में भाषा ही वह साधन है, जिससे हम समस्त विषयों के बारे में ज्ञानार्जन करते हैं और जीवन के समस्त कार्यकलाप भाषा के माध्यम से ही संपन्न होते हैं। इस प्रकार यह नयी सोच है कि सुसंस्कृत मानव जीवन के केंद्र में भाषा का स्थान है।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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