हिंदी विश्व भारती छात्र पत्रिका-2011 पृ-24

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म्याँमार (बर्मा) में
भारतीयों की स्थित: कल और आज

राकेश (म्यांमार)
कक्षा-400


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सन 1957 से पहले म्यांमार भारत का ही भाग था, जो ब्रिटिश शासन के दौरान ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा शासित एक प्रदेश था। फूट डालो और राज करो की नीति (डिवाइड एण्ड रूल) के तहत सन 1937 में म्याँमार को भारत से विभाजित कर अलग कर दिया गया। 4 जनवरी 1948 ई. को म्याँमार को स्वतन्त्रता मिली। आज म्याँमार एक स्वतंत्र राष्ट्र है।

आज लगभग 15 लाख से ज्यादा हिन्दू म्याँमार में रहते हैं। सन 1826 में ब्रिटिश शासन काल में बर्मा युद्ध के समय प्रथम बार हिन्दू बन्धुआ मजदूर के रूप में दक्षिण भारत से बर्मा लाए गए थे। उन्हें दक्षिणी बर्मा के मौलम्यिन, तठोन क्षेत्र में बसाया गया। शेट्टी, जिन्हें बर्मी में चट्टो कहते हैं, जाति के जमींदार के रूप में सन 1869 ई. में लाया गया। सन 1880 में पूरे द. बर्मा में शेट्टियों का कृषि पर अधिकारा हो गया और उन्होंने कृषि कार्य को पूर्ण रूप से जमींदारी प्रथा में बदल दिया।

सन 1885 में ब्रिटिश–बर्मा युद्ध के बाद मध्य बर्मा के जंगलों को साफ करने के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी भोले-भाले भारतीय किसानों को प्रलोभन देकर बर्मा ले जाने लगी। इस बार की नीति में परिवर्तन कर दिया गया। म्याँमार जाने के लिए 6500 किसानों ने अपना नामांकन करवाया। म्याँमार (बर्मा) जाने के इच्छुक किसानों का नामांकन होने के बाद बड़े विचित्र ढंग से चयन किया गया। उनसे सौ तक की गिनती गिनने को कहा जाता था। जो सौ तक गिनती गिन सकता था, उसे अयोग्य सिद्ध कर दिया जाता था। जो किसान 10 तक गिनती नहीं गिन पाते थे, उन्हें योग्य घोषित कर उनको म्याँमार (बर्मा) जाने वाले किसानों की सूची में जोड़ दिया जाता था। कुछ किसान जान-बूझ कर 10 तक गिनती न गिन पाने का नाटक कर उस सूचि में जुड़ गये।

इस कार्य को कम्पनी ने बिहार प्रान्त के आरा जिले के डुमराव के महाराज दीवान श्री रायबहादुर हरिहर प्रसाद सिन्हा को सौंपा, क्योंकि डुमराव के महाराज ने ब्रिटिश सरकार की हर तरह से मदद की थी। महाराज के मरणोपरान्त रायबहादुर हरिहर प्रसाद सिन्हा (हरि जी) राजा बने। इनके साथ एक अंग्रेज अधिकारी को भी जमींदार बनाकर बर्मा भेजा गया। दोनों ने दो अलग-अलग जंगल साफ कर नगर बसाया।

कम्पनी ने जमींदारों और किसानों के बीच समझौता कराया। शर्तनामा लिखा गया। शर्तनामा में कहा गया था कि किसानों को जंगल काटने के लिए अवश्य हथियार देना उनके बच्चों के लिए स्कूल व औषधालय बनवाने जंगल काटकर जब तक खेती नहीं हो जाती तब तक खाद्यान्न, वस्त्रादि देने और पाँच वर्ष तक उनसे कृषि कार्य न लेना आदि शामिल था। कलकत्ता (कोलकाता) के बन्दरगाह पर किसानों से शर्तनामे का कागजात यह कहकर ले लिया गया कि उनके पास से दास्तवेज गुम हो सकता है।

वहाँ उन्हें जंगल काटने के लिए आवश्यक उपकरण एक-एक जोड़े बैल, खाद्यान्न वस्त्रादि सभी कर्ज के रूप में दिए गये। जंगल काटते समय अनेकों किसान हिंसक पशुओं का आहार बन गए। सर्पादि विषैले जन्तुओं के काटने पर उनका इलाज यह कहकर नहीं किया गया जाता था कि उसने तो कुछ काम किया ही नहीं तो इलाज कैसा? अगर उसे इलाज कराना है तो पहले दिए कर्जे को ब्याज समेत भर दें, तब उसका इलाज कराया जायेगा। सभी किसान अपने-अपने द्वारा साफ की गई कृषि योग्य भूमि पर गाँव बसाकर खेती करने लगे। किसानों द्वारा उगाया गया अन्न जमींदार कर्ज के रूप में वसूल लेते थे। किसानों के पास खाने तक का अन्न नहीं रह जाता था। तब जमींदार फिर कर्ज के रूप में किसानों को खाने के लिए अन्न देते थे। जिसके कारण किसान हमेशा ही कर्ज में दबे रहते थे। स्कूल के नाम पर तीन प्राइमरी स्कूल खोल दिये गये जिसमें दूसरी कक्षा से अधिक किसी को पढ़ने का अधिकार नहीं था। हरि जी ने जयावती आजकल जियावडी नगर बसाया और अंग्रेज अफसर ने जियावडी से 30 मील दक्षिण में चौतगा नामक नगर बसाया।

सन 1885 से 1902 तक 9000 भारतीय किसानों को म्याँमार (बर्मा) में ले जाया गया। अनपढ़ होने का बहाना कर जो किसान वहाँ गए उन्होंने हरि जी से विद्रोह छेड़ दिया और अपने गाँव के लोगों को शिक्षित करने लगे तो राज्य द्रोही करार देकर उन्हें वहाँ से भारत वापस भेज दिया गया। किसानों का खूब शोषण हुआ। किसान अनपढ़ थे पर श्री रामचरित मानस कण्ठस्थ था। श्री रामचरित मानस के बल पर ही आज म्याँमार में हिन्दी भाषा, भोजपुरी बोली का रूप आज भी ज्यों का त्यों कायम है। म्याँमार के हिन्दुओं की संस्कृति में पाश्चात्यकरण नहीं हुआ है।

सन 1942 में नेता जी सुभाषचन्द्र बोस म्याँमार में जापानी सेना के साथ आए जिसमें बहुत सारे हिन्दू युवक सैनिक बने। ब्रिटिश सरकार के पैर उखड़ गए। चारों तरफ जापानी सेना ही दिखाई देने लगी। जापानियों के अत्याचार से म्याँमार में नृसंहार शुरू हो गया। जिसमें अनेकों भोले भाले किसानों को मार डाला गया। बहु-बेटियों का बलात्कार करते और उसे मार डालते। जिसके कारण बहुत से लोग थलमार्ग से अपने देश वापस लौटे तो सही लेकिन वे अपने देश नहीं पहुँच पाए। भारत-बर्मा सीमा पर ही उन्हें मार डाला गया।

सन 1948 में जनवरी 4 को म्याँमार को आजादी मिली। पर हिन्दुओं को जमींदारों से आजादी नहीं मिली। सन 1962 में म्याँमार में सैन्य शासन सोशलिज्म के रूप में आया। जिसके चलते सोशलिस्ट सरकार ने जमींदारों को उनके देश वापस भेज दिया। सरकार की इस नीति से हिन्दुओं को तो जमींदारों से मुक्ति मिली। उनके बच्चों ने स्कूलों में पढ़ना शुरू कर दिया। बहुत से डॉक्टर इंजीनियर हुए। धीरे-धीरे प्रगति पथ पर बढ़ने लगे। सन 1998 से म्याँमार सरकार ने कृषिकर न लेने की घोषणा कर दी। उसके बाद केवल हिन्दू ही नहीं बल्कि बर्मा (म्याँमार) के सभी किसान बहुत तेजी से प्रगति की ओर बढ़ रहे हैं। आज अनेकों हिन्दू उद्योगपति म्याँमार में हैं।

सभी हिन्दू किसान जब भारत से म्याँमार ले जाए गए थे, तब वे अपने साथ श्री रामचरित मानस ले गए थे, इसकी प्रत्येक चौपाई उन्हें कण्ठस्थ थी। उन्होंने अपना धर्म संस्कृति और भाषा आज भी भारत की तरह ही जिंदा रखी है। उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया है। यह केवल श्री रामचरित मानस का ही प्रभाव है।


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हिंदी विश्व भारती छात्र पत्रिका-2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
हिन्दी लोक-नाटक तक्षिला मेंडिस 6:1
मेरा जन्म दिन बोल्द 6:2
होरी और मृत्यु... तक्षिला मेन्डिस 7:1
कैसे छोडूँ? 7:2
सिंहली लोक साहित्य विसाला दनंजनी मल्लव आरच्चि 8
प्यार का गुलशन आदम 9:1
ऋणी हूँ मैं विसाला दनंजनी मल्लव आरच्चि 9:2
मेरा तुर्कमेनिस्तान आगान्थाजोवा शैकेर 10:1
देना: सबसे बड़ा सुख आगान्थाजोवा शैकेर 10:2
आइये चलें, ट्रिनिडाड और टुबेगो.....! वासुदेव 11
रूस में क्रिसमस वाल्या पोगोदीना 12
हमारी अपेक्षा..... अदुम इद्रीस अदुम 13
मधुरानी (अनुवादित रचना) तुरेब अबूज़र 14:1
ताजिकी (मूल रचना) जोनी शिरीन 14:2
भारत और श्रीलंका का अटूट रिश्ता के.वी.जे. कोषली 15:1
मैं चला जाता हूँ 15:2
गरीब साजन 15:3
मंगोलिया उंदरमा 16
मेरी यात्रा बेसुजीन 17
मेरी जिंदगी में भारत उमीदा 18
क्षणिकाएँ.... उमीदा 19:1
जापान की कथा यूकी तामागावा 19:2
चाड को जानिए नूर ब्राहीम 20
रूसी साहित्य अन्ना स्तेपानोवा और वाल्या पोगोदीना 21
सिरिलिक लिपिक याना यार्वोस्काया 22:1
जाना है मुझे कौशल्या समली 22:2
शोध क्या है? कौशल्या समली 23
म्याँमार (बर्मा) में भारतीयों की स्थित : कल और आज राकेश 24
हैदर अलीयेव मिरज़ायेवा साईदा 25
म्याँमार देश (बर्मा) के प्रमुख सांस्कृतिक त्यौहार राकेश 26
मेरा शहर उलानबाथर नारनतुया 27
अर्मेनिया मनात्साकानयान नारिने 28
तुम्हारी दोषी हूँ मनात्साकानयान नारिने 29
हंगरी को पहचानिए बैआता यकुशोब्स्कि 30
राजा मात्यारा और बूढ़ा आदमी बैआता यकुशोब्स्कि 31
मेरी भारत यात्रा वितावात रेक्ताविलजय 32:1
मेरा देश वितावात रेक्ताविलजय) 32:2
मेरी गोवा यात्रा अलगिरमा 33:1
मैं और भारत ओन्द्रह 33:2
मेरा देश कोरिया शिनजोंग 34
चीनी ड्रम मंदिग 43
‘मेरी दीवाली’ जंग यांग ए 44
भाषा सीखने का शौक श्रीमती समर बारी 45:1
मेरा देश मिस्त्र श्रीमती समर बारी 45:2
मर्जीशोर के त्योहार रालूका 46
‘श्रीमती देवी’ मिर्चआ ऐलियादे की नज़र में रालूका 47
चीनी नया साल और लाल बसंत चांग लू 48
मुझे तड़पाया-अनुदित रचना मोहम्मद खालिद 49:1
हर चा व जुरावलम पश्तो-मूल रचना मोहम्मद खालिद 49:2
अफगानिस्तान। मोहम्मद खालिद 50
रूसी भाषा वियोलेता 51
बर्फीली गुड़िया (रूसी कहानी) वियोलेता 52
सुहाग सुराजिनी दिसानायक 54
मेरी भारत यात्रा– जीवन की सुहानी यात्रा सुराजिनी दिसानायक 55
कुछ नहीं बदला सुराजिनी दिसानायक 56:1
चलिए, कोई बात नहीं सुराजिनी दिसानायक 56:2
तुर्की भाषा जानान एर्देमीर 57:1
सूर्य की देवी आसूमी तानाका 57:2
हिन्दी प्रेमी–श्रीमती इंद्रा दसनायक इंद्राकुमारी दसनायक 58
थ्रेशन लोग रोसित्सा 59
चालाक पेतर और दो झूठे रोसित्सा 60
मंगोलिया का राष्ट्र ध्वज मुन्ह–एतेनि 61
भाषा सीखना चीका ओगुरी 62
बाल्कन देशों का खान-पान गालेना त्स्वेत्कोवा 63
रोमन लिपि काया ब्रिक्स 65
सूरज सुगन्धि मधुभाषिनी 66:1
दिल का बाग सुगन्धि मधुभाषिनी 66:2
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी शिक्षण विभाग
साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियाँ 67
विभाग के सदस्यों की सूची 69
वार्षिक प्रतिवेदन 70
विभागीय सेमिनार का प्रतिवेदन (सत्र 2010–2011) 71
छात्र सूची 2010-11 73
वैयक्तिक औज़ार

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सुस्वागतम्
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