हिंदी विश्व भारती छात्र पत्रिका-2011 पृ-58

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हिन्दी प्रेमी–श्रीमती इंद्रा दसनायक

इंद्राकुमारी दसनायक (श्रीलंका)
कक्षा-400
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हिंदी प्रेमी श्रीलांकीय छात्रों के भाषात्मक ज्ञान को सशक्त बनाने और हिंदी प्रचार-प्रसार करने में जिस व्यक्ति ने इतना परिश्रम किया है उतना परिश्रम करने वाला आज श्रीलंका में दिखाई नहीं देता। वे हैं, सन 2005 में भारतीय सरकार द्वारा जोर्ज ग्रियसन सम्मान से पुरस्कृत कँलणिय विश्वविद्यालय श्रीलंका की भूतपूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर इन्द्रा दसनायक जी। इन्होंने अपना पूरा जीवन लगन और रूचि के साथ हिंदी की सेवा में लगा दिया। आज श्रीलंका में जो हिंदी का फैलाव और प्रभाव है, उसका पूरा श्रेय श्रीमती इन्द्रा दसनायक जी को है। इनका जीवन भी श्रीलंका के हिंदी प्रमियों के लिए प्रेरणा प्रद रहा है।

राजस्थान प्रदेश में एक मध्यम वर्गीय परिवार में इन्द्रा जी का जन्म 28 जून 1946 में हुआ था। वे अपने माता-पिता की सबसे बड़ी पुत्री थीं। भारत में पैदा होने के कारण उनकी मातृभाषा हिंदी थी। किंतु उनके माता-पिता श्रीलांकीय थे। इन्द्रा जी ने अपनी पूरी पढ़ाई हिंदी के माध्यम से भारत में ही की थी। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से बी.ए. की उपाधि प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसी विश्वविद्यालय में आपने एम.ए. (हिंदी साहित्य) की उपाधि भी प्रथम श्रेणी में प्राप्त की। वे भाषा से अधिक साहित्य पर अधिक ध्यान देती थीं। क्योंकि उन्हें पता था कि साहित्य के बिना भाषा अधूरी है। भाषा के पोषण के लिए साहित्य का अध्ययन करना आवश्यक है। भाषा का वास्तविक रूप और विकास उसके गद्य साहित्य से ही परखा जाता है। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए इन्द्रा जी ने पी.एच.डी. उपाधि के लिए हिंदी गद्य साहित्य को चुना। अपनी तीव्र रूचि और जिज्ञासु स्वभाव से प्रेरणा लेकर उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के शोध निर्देशक प्रोफेसर प्रभाकर शुक्ल के अधीन अपना अनुसंधान का कार्य आरंभ कर दिया। शोध का विषय ऐतिहासिक उपन्यासकार वृन्दावनलाल वर्मा पर केन्द्रित था। अत: निसंदेह इन्द्रा जी हिंदी भाषा और साहित्य की महान विदुषी और कर्मठ महिला थीं, किंतु इससे ज़्यादा उनका प्रचारक और अध्यापकीय रूप अधिक प्रभावपूर्ण था। अपने प्रचारक कार्यक्रमों के माध्यम से देश-विदेश में उनका नाम जाना जाने लगा। उनको सन 1983 में ‘वर्धा हिन्दी कोविद’ पुरस्कार मिला। उनके हिंदी प्रचार-प्रसार से संबंधित अनेक प्रशंसनीय कार्यों से प्रभावित होकर लंका और भारत की अन्य संस्थाओं और विश्वविद्यालयों ने उन्हें पुरस्कृत किया। इन्द्रा जी को श्रीलंका के प्रमुख विश्वविद्यालय में ने सन् 1999 में हिंदी प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति प्रदान की। इस विश्वविद्यालय का नाम ‘कैलणिय विश्वविद्यालय’ है। उसमें उन्होंने ‘आधुनिक भाषा विज्ञान’ में काम किया। कुछ वर्षों के बाद वे वहीं विभागाध्यक्ष बन गयीं। विभागाध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने सर्व प्रथम श्रीलंका में हिंदी के लिए स्वतंत्र विभाग खुलवाने की कोशिश की। अपने अथक प्रयत्न के परिणाम स्वरूप कुछ समय बाद ही ‘हिंदी’ के लिए ‘एक स्वतंत्र विभाग’ कैलणिय विश्वविद्यालय को मिला। द्वितीय विदेशी भाषा ‘हिंदी’ के लिए एक स्वतंत्र विभाग लंका जैसे विकासशील देश में स्थापित करवाना, बहुत कठिन कार्य को प्रमाणित कर दिखाया। यह स्वतंत्र विभाग आज सफलता के साथ अपना कार्य कर रहा है।

उन्होंने हिंदी की संवृद्धि के लिए केवल भौतिक सम्पत्ति ही आयोजित नहीं की, अपितु मानव सम्पत्ति भी पैदा की। आज इन सम्पत्तियों में प्रतिष्ठित प्रोफेसर उपुल रंजित हेवावितानगमगे (Phd. Jhu) वर्तमान विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर लक्ष्मण सेनेविरनन (Phd. Ilahabad), वरिष्ठ प्राध्यापक, अनूषा सलवलुर (M. Phiil Kelaniya) आदि प्रमुख हैं। ये लोग श्रमती इन्द्रा जी के कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं और उसमें संवृद्धि भी कर रहे हैं।

उपर्युक्त कार्यों के अलावा इन्द्रा जी श्रीलंका में एक प्रसिद्ध लेखिका के रूप में भी जानी जाती हैं। हिंदी साहित्य और भाषा से संबंधित निबंधों, लेखों के अतिरिक्त उन्होंने प्रसिद्ध हिंदी काव्य-ग्रंथ ‘पद्य कुसुम’, ‘काव्य-कुसुम’ आदि पुस्तकें भी प्रकाशित की हैं। श्रीलांकीय हिंदी प्रेमी प्यास बुझाने के लिए इन ग्रंथों को रूचि से पढ़ते हैं। उनके अनेक प्रिय छात्र हिंदी की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए हिंदी प्रचार-प्रसार का काम करते हैं। इन छात्रों में केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा के पूर्व विद्यार्थी प्रोफेसर लक्ष्मण सेनेविरतन जी प्रधान हैं। वे आज श्रीलंका में हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक हैं। उनके द्वारा लिखित ‘हिंदी व्याकरण शिक्षा’, ‘हिंदी लेखन शिक्षा’, ‘हिंदी मौखिक शिक्षा’ आदि अमूल्य ग्रंथ आज समस्त श्रीलांकीय हिंदी अध्ययन क्षेत्रों में प्रचलित हैं। श्रीलंका के अधिकांश पाठशालाओं, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालय क्षेत्र में ये पुस्तकें पढ़ी जाती हैं। इन ग्रंथों के कारण आज विदेशी भाषा के रूप में हिंदी सीखने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस प्रकार हमारी भूमि में हिंदी प्रचार-प्रसार से संबंधित अनेक तरह की सामग्री पैदा करने वाली माँ श्रीमती इन्द्री जी ही हैं। उनके नाम से कैलणिय विश्वविद्यालय में एक हिंदी पुस्तकालय भी है। पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर उपुल रंजित हेवावितानगमगे ने इस पुस्तकालय का नाम इन्द्रा जी के नाम से अभिहित किया। इस पुस्तकालय का नाम है– ‘इन्द्रा दसनायक हिंदी पुस्तकालय’ इसमें हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति से संबंधित सभी पुस्तकें हैं। इस प्रकार ऐसे महान चरित्र वाली इन्द्रा दसनायक आज भी हमारे लिए परम पूज्यनीय विदुषी हैं। श्रीलंका में हिंदी से संबंधित उनके अनेक अमूल्य कार्यों के कारण सुदूर भविष्य में भी वे हिंदी की सूत्रधार और जनक के रूप में जानी जाती रहेंगी।


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हिंदी विश्व भारती छात्र पत्रिका-2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
हिन्दी लोक-नाटक तक्षिला मेंडिस 6:1
मेरा जन्म दिन बोल्द 6:2
होरी और मृत्यु... तक्षिला मेन्डिस 7:1
कैसे छोडूँ? 7:2
सिंहली लोक साहित्य विसाला दनंजनी मल्लव आरच्चि 8
प्यार का गुलशन आदम 9:1
ऋणी हूँ मैं विसाला दनंजनी मल्लव आरच्चि 9:2
मेरा तुर्कमेनिस्तान आगान्थाजोवा शैकेर 10:1
देना: सबसे बड़ा सुख आगान्थाजोवा शैकेर 10:2
आइये चलें, ट्रिनिडाड और टुबेगो.....! वासुदेव 11
रूस में क्रिसमस वाल्या पोगोदीना 12
हमारी अपेक्षा..... अदुम इद्रीस अदुम 13
मधुरानी (अनुवादित रचना) तुरेब अबूज़र 14:1
ताजिकी (मूल रचना) जोनी शिरीन 14:2
भारत और श्रीलंका का अटूट रिश्ता के.वी.जे. कोषली 15:1
मैं चला जाता हूँ 15:2
गरीब साजन 15:3
मंगोलिया उंदरमा 16
मेरी यात्रा बेसुजीन 17
मेरी जिंदगी में भारत उमीदा 18
क्षणिकाएँ.... उमीदा 19:1
जापान की कथा यूकी तामागावा 19:2
चाड को जानिए नूर ब्राहीम 20
रूसी साहित्य अन्ना स्तेपानोवा और वाल्या पोगोदीना 21
सिरिलिक लिपिक याना यार्वोस्काया 22:1
जाना है मुझे कौशल्या समली 22:2
शोध क्या है? कौशल्या समली 23
म्याँमार (बर्मा) में भारतीयों की स्थित : कल और आज राकेश 24
हैदर अलीयेव मिरज़ायेवा साईदा 25
म्याँमार देश (बर्मा) के प्रमुख सांस्कृतिक त्यौहार राकेश 26
मेरा शहर उलानबाथर नारनतुया 27
अर्मेनिया मनात्साकानयान नारिने 28
तुम्हारी दोषी हूँ मनात्साकानयान नारिने 29
हंगरी को पहचानिए बैआता यकुशोब्स्कि 30
राजा मात्यारा और बूढ़ा आदमी बैआता यकुशोब्स्कि 31
मेरी भारत यात्रा वितावात रेक्ताविलजय 32:1
मेरा देश वितावात रेक्ताविलजय) 32:2
मेरी गोवा यात्रा अलगिरमा 33:1
मैं और भारत ओन्द्रह 33:2
मेरा देश कोरिया शिनजोंग 34
चीनी ड्रम मंदिग 43
‘मेरी दीवाली’ जंग यांग ए 44
भाषा सीखने का शौक श्रीमती समर बारी 45:1
मेरा देश मिस्त्र श्रीमती समर बारी 45:2
मर्जीशोर के त्योहार रालूका 46
‘श्रीमती देवी’ मिर्चआ ऐलियादे की नज़र में रालूका 47
चीनी नया साल और लाल बसंत चांग लू 48
मुझे तड़पाया-अनुदित रचना मोहम्मद खालिद 49:1
हर चा व जुरावलम पश्तो-मूल रचना मोहम्मद खालिद 49:2
अफगानिस्तान। मोहम्मद खालिद 50
रूसी भाषा वियोलेता 51
बर्फीली गुड़िया (रूसी कहानी) वियोलेता 52
सुहाग सुराजिनी दिसानायक 54
मेरी भारत यात्रा– जीवन की सुहानी यात्रा सुराजिनी दिसानायक 55
कुछ नहीं बदला सुराजिनी दिसानायक 56:1
चलिए, कोई बात नहीं सुराजिनी दिसानायक 56:2
तुर्की भाषा जानान एर्देमीर 57:1
सूर्य की देवी आसूमी तानाका 57:2
हिन्दी प्रेमी–श्रीमती इंद्रा दसनायक इंद्राकुमारी दसनायक 58
थ्रेशन लोग रोसित्सा 59
चालाक पेतर और दो झूठे रोसित्सा 60
मंगोलिया का राष्ट्र ध्वज मुन्ह–एतेनि 61
भाषा सीखना चीका ओगुरी 62
बाल्कन देशों का खान-पान गालेना त्स्वेत्कोवा 63
रोमन लिपि काया ब्रिक्स 65
सूरज सुगन्धि मधुभाषिनी 66:1
दिल का बाग सुगन्धि मधुभाषिनी 66:2
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी शिक्षण विभाग
साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियाँ 67
विभाग के सदस्यों की सूची 69
वार्षिक प्रतिवेदन 70
विभागीय सेमिनार का प्रतिवेदन (सत्र 2010–2011) 71
छात्र सूची 2010-11 73
वैयक्तिक औज़ार

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