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हिंदी वैकल्पिक हो गई है:प्रो. रमानाथ सहाय

प्रो. रमानाथ सहाय

मूलत: गणितज्ञ प्रो. रमानाथ सहाय भाषा विज्ञान एवं भाषा शिक्षण जगत के गणमान्य हस्ताक्षर हैं। आप, के.एम. हिन्दी तथा भाषा विज्ञान विद्यापीठ, आगरा से संस्थान में आए। आपने संस्थान को दिशा-निर्देशन के कार्य के साथ शिक्षण सामग्री के रूप में अनेक पाठ्यपुस्तकों एवं अनेक शब्दकोषों का निर्माण कराया। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के विकास की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में आप जाने जाते हैं। स्वर्ण जंयती के अवसर पर हुई कुछ बातें-

प्रश्नोत्तर

प्रो. अरुण चतुर्वेदी: सर, आप लगभग 35-40 वर्षों से संस्थान से जुड़े रहे हैं, कई वर्षों तक कार्यकारी निदेशक का दायित्व भी वहन किया है। तब संस्थान का प्रारंभिक स्वरूप क्या था, और क्या दायित्व तय किए गए थे?
प्रो. रमानाथ सहाय: शिक्षा मंत्रालय ने अपने प्रारंभिक काल में दायित्वों का विभाजन किया था। शैक्षिक चुनौतियों का सामना करने के लिए आई. आई. टी. को तकनीकी, विश्वविद्यालयों को विभिन्न शैक्षिक पाठ्यक्रम दिए गए। भाषाओं के द्वितीय भाषा और विदेशी भाषा के रूप में प्रसार व विकास एवं शिक्षण के लिए भाषा संस्थानों की स्थापना की गई। प्रांतीय भाषाओं का दायित्व प्रांतीय अकादमियों को दिया गया था। जिसे उन्होंने पूरा नहीं किया। संस्थान के हिंदी को द्वितीय एवं विदेशी भाषा के रूप में प्रसार-प्रचार, शिक्षण व अनुसंधान का कार्य सौंपा गया। सभी प्रदेशों की समितियों को मिलाकर एक समितियों का महासंघ था। जो संस्थान व निदेशालय के साथ मिल-बांटकर कार्य कर रहा था। संस्थान का कार्य क्षेत्रीय ट्रेनिंग कॉलेजों को मार्गदर्शन देना भी था। पहले प्रांतीय सरकारों प्रतिनिधि और बाद में शिक्षा विभाग द्वारा प्रतिनियुक्त हिंदी शिक्षक ट्रेनिंग के लिये आते थे। उन्ही से फीडबैक लेकर संस्थान सामग्री तैयार करता था। वो न केवल शिक्षकों बल्कि विद्यार्थियों के लिये भी उपयोगी होता था।
प्रो. अश्विनी श्रीवास्तव: संस्थान द्वारा किये गये कुछ कार्य जो आपकी दृष्टि में महत्वपूर्ण हों।
प्रो. रमानाथ सहाय: हमने हिंदीतर प्रातों के शिक्षकों को न केवल हिंदी बल्कि अन्य विषयों को भी हिंदी में पढ़ाने की ट्रेनिंग दी। नागालैण्ड आदि प्रदेशों के विद्यौर्थियों के लिये सामग्री बनाई। बैंकिग पाठ्यक्रम, राजभाषा परियोजना, प्रयोजनमूलक हिंदी एवं उसके पाठ्यक्रम की संकल्पना, मध्यप्रदेश की आदिवासी बोलियों की परियोजना, नाबार्ड परियोजना, ट्रेनिंग कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के लिये उच्च नवीकरण आदि ऐसे कार्य हैं जिनके कारण संस्थान को हमेशा याद किया जायेगा। हमने 2-3 वर्षों तक भाषा सचेतना शिविर का आयोजन किया था जो मेरी अपनी संकल्पना थी। इस शिविर में विभिन्न प्रांतों के हिंदी शिक्षक एक साथ पढ़ते थे, खेलते थे और शाम को नाचते-गाते थे। राष्ट्रीय एकता का यह अनूठा उदाहरण था।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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