हिंदी वैकल्पिक हो गई है 2

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प्रश्नोत्तर

प्रो. अश्विनी श्रीवास्तव- आप संस्थान के स्वरूप निर्माताओं में से रहे हैं। आज संस्थान के स्वरूप के विषय में आपकी क्या धारणा हैं?

हमने हिंदीतर प्रांतों के शिक्षकों को न केवल हिंदी बल्कि अन्य विषयों को भी हिंदी में पढ़ाने की ट्रेनिंग दी। नागालैण्ड आदि प्रदेशों के विद्यार्थियों के लिए सामग्री बनाई। बैंकिंग पाठ्यक्रम, राजभाषा परियोजना, प्रयोजनमूलक हिंदी एवं उसके पाठ्यक्रम की संकल्पना, मध्यप्रदेश की आदिवासी बोलियों की परियोजना, नाबार्ड परियोजना, ट्रेनिंग कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के लिए उच्च नवीकरण आदि ऐसे कार्य हैं जिनके कारण संस्थान को हमेशा याद किया जाएगा।

प्रो. रमानाथ सहाय- मुझे लगता है कि संस्थान अपने मार्ग से थोड़ा भटक गया है। संस्थान द्वितीय एवं विदेशी भाषा के रूप में अध्ययन-अध्यापन एवं अनुसंधान की अकेली संस्था है। यही इसकी विशेषता है जो इसे अन्य संस्थाओं व विश्वविद्यालयों से अलग करती है। यह प्रांरभ में ही कहा गया था कि संस्थान का कार्य स्वरूप विश्वविद्यालय से बहुत अलग और बड़ा है लेकिन आज इसे हम भूल गये हैं। मान्यता का सवाल बेकार में उठाया गया है। हमार प्रादेशकि सरकारों से यह एग्रीमेंट था कि हम आपके शिक्षकों को ट्रेन्ड करेंगे और आप अन्य विषयों के समान ट्रेन्ड मानकर उन्हे वे सभी सुविधाएँ व लाभ देंगे।

प्रो. अरुण चतुर्वेदी- सर, आपने सभी संस्थान के स्वर्ण युग की बात की है। संस्थान के भावी स्वरूप व योजनाओं के बारे में आपकी क्या संकल्पना है?

प्रो. रमानाथ सहाय-पहले हिंदी भाषी प्रदेशों में हिंदी फल-फुल रही थी। नये-नये क्षेत्रों में विकसित हो रही थी, और संस्थान हिंदी प्रदेशों में उसके विकास व प्रसार की काशिशों में लगा था और काफ़ी हद तक इसमें सफल हुआ। आज हिंदी सभी जगह दुर्दशा को प्राप्त है। हिंदीतर प्रदेशों में आज एक भी साइनबोर्ड हिंदी में नहीं है। कर्नाटक के स्कूलों में कुछ समय पूर्व हिंदी कम्पल्सरी विषय थी लेकिन शिक्षकों व उचित पुस्तकों के अभाव में 90 प्रतिशत छात्र फेल हो गये। फलत: हिंदी वैकल्पिक हो गई। आवश्यकता है लाइज़न ऑफिसर की जो हर प्रदेश में ज़रूरत को समझे और संस्थान उनकी पूर्ति करे। इसीलिए विभिन्न पहले भाषा-भाषी शिक्षकों को संस्थान में नियुक्त किया जाता था। कंप्यूटर के आधुनिक पाठ बनाए जाएँ। संस्थान विभिन्न कंपनियों को हिंदी क्षेत्र में उनकी जरूज़रूरत जानकर प्रयोजनमूलक पाठ तैयार करके दें। समय बहुत बदल गया। आज की तकनीक को देखते हुए हिंदी संभावनाएं तलाशनी होंगी और तदनुसार ज़रूरत को पूरा करना होगा।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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