गवेषणा 2011 पृ-167

ज्ञानकोश से
EditorR (वार्ता | योगदान)ने किया हुवा 14:44, 11 नवम्बर 2012का अवतरण

(अंतर) ← पुराना संस्करण | वर्तमान संशोधन (अंतर) | नया संशोधन → (अंतर)
यहां जाएं: भ्रमण, खोज


साहित्य का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश

(अशोक वाजपेयी के काव्य-सिद्घान्तों के संदर्भ में)

प्रकाश साव


'स्वराज' मूलत: एक राजनीतिक पद (Term) है। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान हमारे देश के अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने इस पद का व्यापक राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अर्थ-संदर्भों में इस्तेमाल किया था। इस पद के सर्वप्रमुख प्रयोक्ताओं में महात्मा गांधी एक थे। गोखले, तिलक, चितरंजन दास, विनोबा, नेहरू आदि अन्य अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने भी अपने-अपने विचार विमर्शों में इस पद का उपयोग और व्याख्या की है।

लेकिन वास्तव में देखें तो 'स्वराज' बहुश्रुत शब्द स्वतंत्रता का पर्याय है। 'स्वराज' शब्द का संधि-विच्छेद करें तो यही अर्थ प्राप्त होता है- 'स्व+राज'। यानी अपना राज।

स्वराज शब्द किसी व्यक्ति अथवा समाज द्वारा अपने स्वायत्त क्षेत्र के नियंत्रण में आने वाली बाह्य स्थितियों पर अधिकार कायम करने के साथ-साथ व्यक्ति और समाज की अपनी आंतरिक मन:स्थिति पर भी 'अन्य' के नियंत्रण से मुक्ति की सूचना देता है। राजनैतिक पद के रूप में जब इस शब्द का प्रयोग होता है तो आंतरिक और बाह्रा स्वतंत्रता यानी स्वराज का सम्मिलित अर्थ एक साथ उससे ध्वनित होता है।

इस राजनैतिक पद को अशोक वाजपेयी एक साहित्यिक और सांस्कृतिक पद के रूप में परिवर्तित करते हैं, उसकी अर्थाभा को निजी विचार-संवेदनाओं का स्पर्श देते हुए। उनके द्वारा राजनैतिक शब्दावली से आयत्त और रंगात्मक ढंग से सुपोषित किया गया यह साहित्यिक-सांस्कृतिक पद अब 'साहित्य के स्वराज' के नाम से जाना जाता है।

साहित्य का स्वराज और उसकी स्वायत्ता का प्रश्न पिछले लगभग पांच दशकों से अशोक वाजपेयी के काव्य-चिंतन का प्रमुख सरोकार रहा है। अशोक वाजपेयी साहित्य के स्वराज में साहित्य अथवा कविता की भूमिका को एक स्वाधीन और संप्रभु अनुशासन के रूप में प्रथमत: और अंतत: केंद्रीय महत्ता प्रदान करते हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि हमारे समय में साहित्य की स्वायत्त-संप्रभु सत्ता पर राजनीति सहित अन्यान्य ज्ञानानुशासनों का जोरदार हमला है। इनमें राजनीति तो प्रधान और अत्यंत आंतककारी दृष्टि है। समय में मौजूद, समय को समझने और निर्धारित करने वाली ये विविध अनुशासन-दृष्टियाँ विधियाँ अपनी-अपनी स्वायत्त सत्ता से लैस होकर साहित्य की स्वायत्त सत्ता का अकसर अतिक्रमण करती रहती हैं। ऐसे अतिक्रमणों से अपनी असहमति व्यक्त करते हुए अशोक वाजपेयी अपने आत्मवृत्त 'पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज' में लिखते हैं, "मैंने दुनिया भर के साहित्य से यह सीखा कि राजनीति का पिछलगुआ बनकर साहित्य का कहीं भी भला नहीं हुआ है। मुझे यह भी लगा कि साहित्य को राजनीतिक या किसी विचारधारा का उपनिवेश बनाने की चेष्टा, साहित्य की अपनी वैचारिक सत्ता का अस्वीकार है।"[1]


पीछे जाएँ
166
167
168
आगे जाएँ


गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ

टीका-टिप्पणी

  1. 'पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज', राजकमल प्रकाशन, प्र. सं.-2003, पृ. 101
वैयक्तिक औज़ार

संस्करण
क्रियाएं
सुस्वागतम्
सहायता