गवेषणा 2011 पृ-63

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हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार

श्रवण कुमार मीणा


दि मानव की विकास परंम्परा का आधार मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ 'भाषा' भी मुख्य रहा है। 'भाषा' के बिना मनुष्य, समाज और राष्ट्र गूंगा कहा जाता रहा है। 'भाषा' राष्ट्र को जोड़ने, संस्कृति और समाज का संगठित करने, संवाहित करने तथा अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का सशक्त आधार है। अर्थात् भाषा का मानव, समाज, संस्कृति और बाजार से घनिष्ठ संबंध रहा है। भाषा के प्रयोग-संदर्भों से होने वाली विविधता को मुख्यत: दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है :-

प्रथम वर्ग में भाषा का वह स्वरूप आता है, जिससे मनुष्य को रस और सौन्दर्य की अनुभूति होती है, जो मानवीय मूल्य-संवेदना के संवर्धन और संरक्षण की भूमिका का निर्वाह करती है तथा जिसमें कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि साहित्य की विधाओं का सृजन होता है।

द्वितीय वर्ग मे मानव की बोली और साहित्य से भिन्न-विभिन्न प्रयोजनों की भाषा को रखा जाता है, जो कामकाज, लोक-व्यवहार और बाजार की भाषा होती है। प्रथम वर्ग की भाषा को ही हम हिंन्दी भाषा के नाम से अभिहित करते हैं, जो मूलत: संस्कृत से निसृत हो प्राकृत, पालि, अपभ्रंश, अवहट्ठ, अवहत्त, ब्रज, अवधी, मैथिली से होती हुई आधुनिक युग तक आई है। वहीं प्रयोजनमूलक हिन्दी की संकल्पना स्वतंत्र भारत के सांविधानिक प्रावधानों के सहारे की गयी। यह सर्वविदित है कि हिन्दी भाषा का प्रयोजन भावों या विचारों की अभिव्यक्ति तथा ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा ह्दयगत भावों की अभिव्यक्ति है जबकि प्रयोजनमूलक हिन्दी का क्षेत्र है प्रशासन, व्यापार, संचार, विज्ञान, विधि आदि। 'काव्यशास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम्र' के सिद्घान्त को छोड़कर प्रयोजनमूलक भाषा सामाजिक, प्रशासनिक, व्यावसायिक, प्राविधिक संदर्भों की सूचना देती है। अर्थात् प्रयोजनमूलक हिन्दी 'हिन्दी भाषा' का एक विशिष्ट रूप है। जो राजकाज, व्यवसाय, संचार, विधि और ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखाओं का सफलतापूर्वक सम्प्रेषण करती है। यह राष्ट्रीय, सामाजिक व्यवस्था के विभिन्न प्रयोजनों का सिद्घ करने मे समर्थ है। राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी की स्थिति चाहे जिस किसी क्षेत्रीय, प्रान्तीय उलझनों में उलझी रही हो, राजभाषा के रूप में उसका स्वरूप अनेक नियमों, अधिनियमों, शासकीय आदेशों और संसदीय संकल्पों से निर्धारित हुआ है। इसलिए सम्पूर्ण राष्ट्र की भाषा राजकीय भाषा का स्वरूप प्रयोजनमूलक हिन्दी ही है।



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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
वैयक्तिक औज़ार

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