गवेषणा 2011 पृ-89

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मीडिया की हिंदी

दुर्गेश नंदिनी


संसंसार में लोगों के बीच संप्रेषण के लिए शब्द ही माध्यम होते हैं। अनेकानेक भाषाओं के शब्द भंडार इसके मूलाधार होते हैं। अमेरिका, यूरोप, एशिया, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया महादेशों के विभिन्न देशों की भिन्न-भिन्न भाषाएँ हैं।

भारतवर्ष प्राचीन देश है जिसका पूर्व या शास्त्रीय नाम ‘आर्यावर्त’ था। इस आर्यावर्त की भाषा संस्कृत भी और इसके शब्द-भंडार के अनेक कोश थे। और अभी भी हैं।

संचार बहुस्तरीय गतिविधि है। जनसंचार की इन सारी दिशाओं में संप्रेषण की सफलता देने का सारी संयोजना भाषा करती है। भाषा के बिना जनसंचार का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता, चाहे माध्यम कुछ भी हो। इसीलिए जनसंचार के सभी संसाधनों के लिए हर युग में किसी न किसी भाषा का उपयोग अनिवार्यत: होता आया है। भाषा में जनसंचार के कार्य को सुगम बनाया है, आकर्षण प्रदान किया है और विस्तार भी दिया है।

जनसंचार माध्यमों में हिंदी ने एक ओर हिंदी को न जाने कितने व्यापक भू-भाग तक फैलाया है तो दूसरी ओर हिंदी भाषा की संरचना और प्रयुक्ति में कई करवटें उपस्थित की हैं। संचार-माध्यमों की हिंदी न तो सामान्य बोलचाल की हिंदी है और न सृजनात्मक स्तर पर उपयोग में आने वाली काव्य-भाषा है। वह निजी और सार्वजनिक उपक्रमों में प्रयुक्त होने वाली शुष्क राजभाषा भी नहीं है। संचार माध्यमों की हिंदी अपने माध्यम विशेष के प्रति ईमानदार भाषा है। यही कारण है कि जनसंचार के विभिन्न माध्यमों में भाषा का प्रयोग करते समय प्रयोक्ता को इस बात का ध्यान रखना होता है कि उसे किस माध्यम के लिए भाषिक संप्रेषण का लक्ष्य प्राप्त करना है। निश्चय ही रेडियो की हिंदी और पत्रकारिता की हिंदी में अंतर है। विज्ञापन की हिंदी और पत्रकारिता की हिंदी में अंतर है। सड़कों पर नज़र आने वाले पोस्टरों के विज्ञापन और आकाशवाणी के विज्ञापन में अंतर है। कम्प्यूटर और माईक्रोचिप्स के इस दौर में जनसंचार-माध्यमों की भाषा के रूप में हिंदी ने अपने बहुआयामी सामर्थ्य को विभिन्न-स्तरों पर इंगित किया है। यही कारण है कि भाषिक मौलिकता और प्रयुक्ति के स्तर पर जनसंचार माध्यमों में हिंदी की असीम संभावनाएँ हैं।



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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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