जापान में संस्थान

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KHSadmin (वार्ता | योगदान)ने किया हुवा 15:16, 20 अगस्त 2012का अवतरण

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लेखक- प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण

आज से लगभग 38-39 वर्ष पहले, जाने-अनजाने मेरा परिचय केंद्रीय हिंदी संस्थान से हो गया था। संभवत: यह सन 1972 की बात रही होगी। उस वर्ष मेरे सहपाठी श्री विवेकानंद शर्मा जी, जो फिजी के सांसद बन चुके थे, एक सरकारी यात्रा पर भारत आए हुए थे। विदेश मंत्रलय के तत्कालीन हिंदी विशेषाधिकारी श्री बच्चू प्रसाद सिन्हा जी हम दोनों को केंद्रीय हिंदी संस्थान ले गये थे। उससे पहले मैंने इस संस्थान का बस नाम भर ही सुना था।

प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण

केंद्रीय हिंदी संस्थान विश्व भर में हिंदी शिक्षण के क्षेत्र में भारत के एक विशिष्ट संस्थान के रूप में जाना जाता है। आज विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में कार्यरत विदेशी हिंदी अध्यापकों का संबंध किसी न किसी रूप में इस संस्थान के साथ अवश्य रहा है। भारत सरकार द्वारा प्रदत्त विभिन्न छात्रवृत्तियाँ पाकर हिंदी का शिक्षण पाने वाले अधिकांश हिंदी प्रेमी छात्र यहीं आकर शिक्षा प्राप्त करते हैं और अपने-अपने देशों में लौटकर वहाँ हिंदी के प्रचार-प्रसार के कार्य से जुड़ जाते हैं। इस तरह यह संस्थान हिंदी के संदर्भ में अपनी एक वैश्विक पहचान रखता है।

सन 1976 के आस-पास जब मेरे एक अन्य सहकर्मी मित्र डॉ. रवि प्रकाश गुप्त (वर्तमान में दिल्ली केंद्र के क्षेत्रीय निदेशक) संस्थान में स्थायी नियुक्ति पर आ गए तो संस्थान से एक नए तरह का जीवंत सम्पर्क हो गया और अवाजाही बढ़ गयी तथा कई बार विभिन्न अधिवेशनों एवं कार्यशालाओं में भी भाग लेने का अवसर मिलता रहा। सन 1993-1994 के शैक्षिक सत्र में, मैं स्वयं अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान डिप्लोमा का छात्र बनकर संस्थान में पढ़ने लगा। उस दौरान डॉ. सूरजभान सिंह, डॉ, वी. रा. जगन्नाथन, श्रीशचंद्र जैसवाल, डॉ. महेन्द्र सिंह राणा, डॉ. प्रमोद कुमार आदि से भी परिचय हुआ। समय-समय पर शैक्षणिक एवं साहित्यिक सहयोग के कार्यक्रम भी बनते रहते थे।

सन 1988-1992 के बीच में ट्रिनीडाड एण्ड टोबैगो में एक राजनयिक के रूप में प्रतिनियुक्ति पर गया था और उस देश में हिंदी भाषा शिक्षण के प्रसार के लिए युनिवर्सिटी ऑफ द वेस्टइंडीज में एक हिंदी कोर्स का आंरभ किया। उस दौरान ट्रिनीडाड के अनेक विद्यार्थियों को केंद्रीय हिंदी संस्थान में हिंदी पढ़ने के लिए भेजा ताकि प्रवासी भारतीयों की इस देश की नयी पीढ़ी हिंदी भाषा के जीवंत संसार से जुड़ सके। उनमें से कई विद्यार्थी आज ट्रिनीडाड में हिंदी शिक्षण का कार्य कर रहे हैं।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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