जिन खोजा तिन पाइयाँ

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EditorR (वार्ता | योगदान)ने किया हुवा 13:06, 21 अगस्त 2012का अवतरण

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केंद्रीय हिंदी संस्थान की स्थापना करते समय मोटे रूप से यह विधान किया गया था कि इसमें सामान्य विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे पाठ्यक्रमों से इतर ऐसे विषय भी शामिल हों, जिनका संबंध अहिंदी भाषी राज्यों से हो, ताकि भाषा शिक्षण के क्षेत्र में अद्यतन शिक्षण प्रणाली का उपयोग करके इसके अंतर्गत देश-विदेश में विकसित शिक्षण प्रणाली का भी उपयोग हो सके। इसके अलावा केंद्रीय हिंदी संस्थान में विदेशियों के हिंदी अध्यापन के लिए भी सुविधा प्राप्त हो और भारत से देश के विभिन्न हिंदी विद्वानों को विदेशों में भेजकर अध्यापन कार्य करवाया जाए

लेखक- प्रो. सूरजभान सिंह
प्रो. सूरजभान सिंह

केंद्रीय हिंदी संस्थान हिंदी भाषा, हिंदी भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा शिक्षण का एक ऐसा सागर है, जिसमें से आधुनिक युग के उपयुक्त मोतियों को तराश कर निकालने की ज़रूरत पड़ती है। अहिंदी भाषी अध्यापकों को प्रशिक्षण देने के लिए भारत सरकार ने केंद्रीय हिंदी संस्थान को अंगीकार किया है। यह वह युग था, जब हिंदी को राजभाषा स्वीकार करने के बाद इसके विकास के लिए सरकार ने व्यापक कार्यक्रम प्रस्तुत किए और यह भी स्वीकार किया कि हिंदी के विकास और समृद्घि के लिए समस्त देश में प्रयास किए जाएँ और साथ-ही विदेशों में इसके अध्यापन के लिए उचित विधान किया जाए।

केंद्रीय हिंदी संस्थान की स्थापना करते समय मोटे रूप से यह विधान किया गया था कि इसमें सामान्य विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे पाठ्यक्रमों से इतर ऐसे विषय भी शामिल हों, जिनका संबंध अहिंदी भाषी राज्यों से हो, ताकि भाषा शिक्षण के क्षेत्र में अद्यतन शिक्षण प्रणाली का उपयोग करके इसके अंतर्गत देश-विदेश में विकसित शिक्षण प्रणाली का भी उपयोग हो सके। इसके अलावा केंद्रीय हिंदी संस्थान में विदेशियों के हिंदी अध्यापन के लिए भी सुविधा प्राप्त हो और भारत से देश के विभिन्न हिंदी विद्वानों को विदेशों में भेजकर अध्यापन कार्य करवाया जाए। इसी तरह हिंदी सीखने के इच्छुक विदेशी छात्रों को छात्रवृत्ति देकर संबंधित विदेशी भाषाओं में हिंदी शिक्षण की सुविधा दी जाए। 1995 में केंद्रीय हिंदी तकनीकी शब्दावली आयोग के अघ्यक्ष के रूप में सेवानिवृत्त होने के बाद मैं कई रूपों में संस्थान से जुड़ता रहा। मुझे बार-बार यह खयाल आता रहा कि जिस काल में मैंने संस्थान में प्रवेश किया, वह सचमुच संस्थान का स्वर्णिम युग था, जब हर अध्यापक, रीडर, प्रोफ़ेसर बड़ी निष्ठा के साथ अनुसंधान कार्य करता था।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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