सर्वप्रथम पुरस्कार

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EditorR (वार्ता | योगदान)ने किया हुवा 13:28, 21 अगस्त 2012का अवतरण

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लेखक- डॉ. बालशौरी रेड्डी
डॉ. बालशौरी रेड्डी

भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के प्रचार-प्रसार, शिक्षण प्रशिक्षण, लेखन-पत्रकारिता तथा भाषा एवं साहित्य के विकास तथा संवर्धन के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रलय के अधीन केंद्रीय हिंदी निदेशालय, वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग इत्यादि संस्थानों की स्थापना के साथ गृह मंत्रलय के अधीन प्रशिक्षण योजना के द्वारा अनेक कार्यक्रम कार्यान्वित करने का संकल्प किया, तदानुसार उचित व्यवस्था भी की, किंतु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के विकास और प्रचार-प्रसार के लिए आगरा में केंद्रीय हिंदी संस्थान की स्थापना की। गत पचास वर्षों से संस्थान विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा सराहनीय कार्य करता आ रहा है और अपनी महती सेवाओं द्वारा विश्व पटल पर संस्थान ने अपनी छवि अंकित की। अब की वर्ष वह अपनी स्वर्ण जयंती मनाने जा रहा है।


संस्थान की स्थापना के 25 वर्ष का सफल कार्यकाल निश्चय ही आनंददायक है। रजत जयंती समारोह दिल्ली स्थित विज्ञान भवन के सभागार में आयोजित हुआ। उसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमान राजीव गांधी ने किया और उस भव्य समारोह में प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी के हाथों से ही राष्ट्र के लिए बलिदान करने वाले हुतात्मा श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के नाम पर प्रवर्तित पुरस्कार ग्रहण करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। यह संस्थान का प्रथम पुरस्कार था और मेरे साथ हिंदी के मूर्धन्य पत्रकार श्री धर्मवीर भारती को भी यही पुरस्कार प्राप्त हुआ। और इससे भी अधिक प्रसन्नता की बात यह है कि केंद्रीय हिंदी परिषद के संस्थापक तथा हिंदी के वरद पुत्र 'पद्म विभूषण' श्रीमान मोटूरि सत्यनारायण जी ने उसी मंच पर हिंदी के प्राण श्री गंगाशरण सिंह पुरस्कार को ग्रहण किया। हिंदी के विकास संवर्धन में स्पृहणीय योगदान देने वाले महान विभूतियों के साथ उसी मंच पर, जिस पर भारत के प्रधानमंत्री के हाथों से संस्थान द्वारा सर्वप्रथम प्रवर्तित पुरस्कार प्रथम स्थान पर ग्रहण करना मेरे जीवन में एक अविस्मरणीय घटना ही मानी जाएगी।


1952 में यह संस्थान एक स्वायत्त संस्था के रूप में अखिल भारत हिंदी परिषद, आगरा के नाम से स्थापित हुआ। तदनंतर आठ वर्ष पश्चात 1961 में यह संस्थान केंद्र सरकार को सौंपा गया, तब से यह संस्था "केंद्रीय हिंदी संस्थान", आगरा के नाम से विख्यात हुआ।

मेरा सौभाग्य था कि इस संस्थान के कार्यकलापों के साथ मैं किसी न किसी रूप में जुड़ा रहा। जब यह संस्थान परिषद के नाम से व्यवहृत था, तब भी संस्था के सम्मेलनों में आमंत्रित होता रहा। मुख्यत: श्री रामकृष्ण नावड़ा तथा डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा के कार्यकाल में एकाध गोष्ठियों में सम्मिलित होने या अध्यक्षता करने का सुयोग भी प्राप्त हुआ।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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