सीखने के दिन!

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EditorR (वार्ता | योगदान)ने किया हुवा 15:41, 21 अगस्त 2012का अवतरण

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लेखक- डॉ. जीतेन्द्र वर्मा
डॉ. जीतेन्द्र वर्मा
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केंद्रीय हिंदी संस्थान में काम करना मेरे लिए नया सीखने के अवसर जैसा रहा। वहाँ मेरा चयन कोशकर्मी के रूप में हुआ था। 'भोजपुरी-हिंदी-भोजपुरी लोक शब्दकोश के लिए मुझे गाँव-गाँव जाकर भोजपुरी के ऐसे शब्दों को इकट्ठा करना था, जो अब तक किसी कोश में नहीं थे। समय-समय पर आगरा स्थित संस्थान के मुख्यालय में कार्यशाला आयोजित होती। इसी दौरान वहाँ के लोगों का व्यवहार स्नेहिल लगा, विशेषकर संस्थान के निदेशक शंभुनाथ, कुलसचिव चन्द्रकान्त त्रिपाठी, विभागाध्यक्ष परमलाल अहिरवाल व मीरा सरीन तथा परियोजना प्रभारी अभिषेक अवतंस का।

इस दौरान मुझे अरविन्द कुमार जैसे नामी कोशकार को निकट से देखने-जानने और उनसे बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला। नये-नये शब्दों को जानने की उनकी जिज्ञासा देखकर मैं आश्चर्यचकित रह जाता। वे हिंदी या अंग्रेजी का कोई शब्द बोलते और उसका समानार्थी भोजपुरी शब्द जानना चाहते। भोजपुरी शब्द मिलने पर उनकी खुशी देखने लायक होती। असल में किसी भाषा में मिलने वाले शब्द उस भाषा-भाषी के बारे में बहुत कुछ बता देते हैं। अरविन्द कुमार भोजपुरी के शब्दों को बच्चों की तरह रटने लगते। जो मिलता उसे उस शब्द के बारे में पूरे उत्साह से बताने लगते, चाहे वह व्यक्ति उसमें रुचि ले या नहीं ले।

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मेरे काम के परियोजना पदाधिकारी अभिषेक अवतंस थे। पहली बार मैंने उन्हें कोशकर्मी के लिए होने वाले साक्षात्कार के पहले देखा था। वे साक्षात्कार में जाने से पहले जरूरी कागज जाँच रहे थे। बाद में उनसे नित्य प्रति का पाला पड़ने लगा। बात व्यवहार से मुझे लगा वे जाट हैं। उस समय मेरी धारणा थी कि भाषाविज्ञान एक नीरस विषय है और भाषावैज्ञानिक तो एकदम शुष्क होते हैं। अवतंस के साथ काम करते हुए मेरी धारणा और पुष्ट हो गई। वे काम और काम के सिवा और कोई बात ही नहीं करते थे। हालाँकि बाद में मेरी उपरोक्त दोनों धारणाएँ गलत साबित हुईं। वे जाट नहीं बिहारी निकले और वह भी भोजपुरी भाषी। गंभीरतापूर्वक पढ़ने पर भाषाविज्ञान की दुनिया मुझे मोहक लगी और अवतंस मोहिनी मंत्र मारने वाले।

मेरे काम के परियोजना पदाधिकारी अभिषेक अवतंस थे। पहली बार मैंने उन्हें कोशकर्मी के लिए होने वाले साक्षात्कार के पहले देखा था। वे साक्षात्कार में जाने से पहले जरूरी कागज जाँच रहे थे। बाद में उनसे नित्य प्रति का पाला पड़ने लगा। बात व्यवहार से मुझे लगा वे जाट हैं। उस समय मेरी धारणा थी कि भाषाविज्ञान एक नीरस विषय है और भाषावैज्ञानिक तो एकदम शुष्क होते हैं। अवतंस के साथ काम करते हुए मेरी धारणा और पुष्ट हो गई। वे काम और काम के सिवा और कोई बात ही नहीं करते थे। हालाँकि बाद में मेरी उपरोक्त दोनों धारणाएँ गलत साबित हुईं। वे जाट नहीं बिहारी निकले और वह भी भोजपुरी भाषी। गंभीरतापूर्वक पढ़ने पर भाषाविज्ञान की दुनिया मुझे मोहक लगी और अवतंस मोहिनी मंत्र मारने वाले। संस्थान की व्यवस्था से जुड़ी एक घटना मुझे कभी नहीं भूलती। मुझे संस्थान की कार्यशाला में भाग लेना था। मैं सीवान से वैशाली ट्रेन पकड़कर टूण्डला उतरा। उस समय रात्रि के दो बज रहे थे। हल्की ठंड पड़ रही थी। कोई व्यक्ति रुकने का नाम नहीं ले रहा था। सबके साथ मैं भी बाहर चला आया। वहाँ सभी अपने-अपने गंतव्य की ओर रवाना हो रहे थे। मैं भी बिना सोचे-समझे आगरा की ओर चल पड़ा। टेम्पूवाले ने करीब चार बजे संस्थान के गेट पर उतार दिया। मैंने सोचा तीन-चार घंटे संस्थान के गेट पर काटने होंगे। वहाँ के रात्रि पहरी ने मेरा परिचय जानकर गेट खोला और एक चाबी लेकर कहा- चलिए अपने कमरे में। सच कहता हूँ पहले तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। मुझे लगा कि रात्रि पहरी को भ्रम हो गया है। मैं झिझका पर उसने मेरा नाम लेते हुए बताया कि आपके लिए कमरे की व्यवस्था है। मैं ठाट से कमरे में पहुँचा और रजाई ओढ़ कर सो गया। ऐसी सुव्यवस्था बहुत कम जगह मिलती है।

संस्थान से जुड़ी ऐसी कई यादें है।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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