स.पू.अंक-13,अक्टू-दिस-2011,पृ-140

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नोक्ते जनजाति की मौखिक-लोक साहित्य की लेखन समस्या : देवनागरी लिपि एक समाधान

डॉ. अरूण कुमार पाण्डेय
नोक्ते जनजाति की अपनी कोई लिपि नहीं होने के कारण उनका लोक साहित्य मौखिक है, अत: आज विलुप्त होने के कगार पर खड़ी है। देवनागरी लिपि उनके लोक साहित्य के लेखन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

भाषा को प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में ईश्वर द्वारा प्रदत्त दैवी अंश माना गया है। मनुष्य अपने वाग् व्यवहार के द्वारा ही चर–अचर जगत का स्वामी बना हुआ है। ज्ञान–विज्ञान के सभी क्षेत्रों में अपना प्रभुत्व जमाया हुआ है। वाक्यपदीय ग्रन्थ में कहा गया है –

'वाग् रूपता चेदुत्क्रामेदवबोधस्य शाश्वती।'
'न प्रकाश: प्रकाशेत सा हि प्रत्यवमर्शिनी।'[1]

अर्थात् भाषा मानव शरीर में दैवी अंश है, जो इस सृष्टि में मनुष्य मात्र को ही प्राप्त है। यदि मनुष्य के पास भाषा जैसा अमोघ अस्त्र नहीं होता तो मनुष्य भी पशु–पक्षियों के तुल्य होता। "यह भाषा रूपी दिव्य ज्योति ही समस्त संसार में अपना प्रकाश फैलाये हुए है। इस भाषा रूपी ज्योति के बिना यह संसार घोर अंधकारमय होता।"[2]

भाषा की देवोत्पत्ति सिद्धान्त के विषय में वेद, उपनिषद, स्मृतियों आदि में अनेक प्रमाण मिलते हैं –

देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपा: प्शवो वदन्ति।[3] वाग्देवी (भाषा) को देवों ने उत्पन्न किया और सभी प्राणी उसे बोलते हैं। अइउण... आदि 14 माहेश्वर सूत्र शिव के डमरू से उत्पन्न हुए थे, ऐसा पाणिनी का मानना है। भाषा निर्माण या उत्पत्ति के इस दैवी सिद्धान्त पर पर्याप्त मतभेद भी है। प्रतिष्ठित जर्मन विद्वान हेर्डेर ने अपनी पुस्तक 'Origine of Language' में भाषा के इस दैवी सिद्धान्त को सिरे से खारिज करते हुए लिखा है – "यदि भाषा ईश्वर कृत होती तो यह अधिक सुव्यवस्थित और तर्क संगत होती। लेकिन अधिकांश भाषाएँ अव्यवस्थित और त्रुटिपूर्ण हैं।"[4] अनेक मतभेदों के बावजूद लगभग सभी विद्वान इस तथ्य से पूर्णत: सहमत हैं कि भाषा की उत्पत्ति दैवी हो या न हो, परन्तु एक बात सत्य है कि सार्थक एवं उच्चारण के योग्य ध्वनि–यन्त्र और उसको संचालित करने वाली बुद्धि ईश्वर द्वारा दिया गया मनुष्य को अनुपम उपहार है।

किसी भी भाषा की मूलाधार ध्वनियाँ होती हैं। इन्हीं ध्वनियों के उच्चारण और श्रवण के पश्चात भाषा का रूप बनता है। अत: ध्वनियाँ काल विशेष में उच्चरित होती हैं और एक विशेष स्थान तक ही सुनी जा सकती हैं। वह तब तक सुनी जा सकती है, जब तक बोली जा रही होती है और वहाँ तक सुनी जा सकती हैं, जहाँ तक उस ध्वनि की आवाज जाती है। इसलिए ध्वन्यात्मक भाषा क्षण स्थायी होती है। काल और स्थान की परिधि से भाषा को मुक्त करने का काम लिपि करती है। लिपि के प्रयोग से कोई भी भाषा सर्वकालिक और सार्वदेशिक हो जाती है। लिपि भाषा की क्षण स्थायिता को चिर स्थायिता में परिणत कर देती है। जहाँ भाषा का संबंध मनुष्य के जीवन से होता है, वहाँ लिपि सभ्यता के विकास को परिलक्षित करती है। लिपि भाषिक ध्वनियों को व्यक्त करने का एक माध्यम होती है। सभी भाषाओं में एक ही ध्वनि के लिए भिन्न लिपि संकेत होते हैं।

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पाठ संदर्भ

  1. वाक्य पदीय, 1–124।
  2. इदमन्धतम: कृत्स्नं जायते भुवनत्रमय। यदि शब्दाह्ययं ज्योतिरासंसारं न दीपयते।। (काव्यादर्श 1–4)
  3. ऋग्वेद, 8–100–11
  4. 'Origine of Language', Johann Herder, p.27.

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