स.पू.अंक-13,अक्टू-दिस-2011,पृ-72

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ललित निबंध-मंजरी

बादलों को उतरने के लिए थोड़ी जगह दें

डॉ. अरूणेश 'नीरन'

पहाड़ टूटे, जंगल कटे, नदियाँ बँटी और धीरे-धीरे सब सूखने लगा। वर्षा का वह नैसर्गिक संगीत जो पूरे भारत के जीवन में बजता और बहता था, धीरे-धीरे मौन होने लगा।

कृष्ण जब जनमें तब रात अंधेरी थी लेकिन आकाश जल भरे बादलों से भरा हुआ था। काले–काले मेघों की पंचायत जुटी थी और अंधेरा उनसे मिल कर कृष्ण का सृजन कर रहा था। राधा उनकी वर्षा बनी और कृष्ण बरस कर रिक्त हो गये। राधा भी बरस कर रिक्त हो गयीं। काले मेघों की उज्ज्वल वर्षा ने बरस–बरस कर पृथ्वी को उर्वर बना कर रस से भर दिया। यही रस भारतीय साहित्य, संस्कृति और जीवन में बार–बार छलका। जब–जब हम अनुर्वर हुए, वे बार–बार बरस कर हमें उर्वर बनाते रहे। राष्ट्रजीवन की पुण्यसलिलाओं का अमृत–कुंभ भरते रहे। मेघों की वर्षा में निसर्ग तो उतरता ही था, पूरा का पूरा सर्ग भी उसमें भीग कर पुनर्नवा होता रहता था। भूख, बाढ़, विध्वंस के साथ उसमें कुहार, रिमझिम, गीत, नृत्य, पर्व, विरह, विषाद, रस की धाराएँ भी बहती थीं और वह संगीत भी होता था, जिसका महफिल में अलग–अलग राग, ताल, और चाल–ढाल की बंदिशे मिलकर एक ऐसी मनोरम इकाई की रचना करती थीं, जिसे भारत कहा गया।

मेघ हैं तो जल है। जल है तो जीवन है। जीवन है तो रस है। यह रस सूख रहा है, इसलिए सब व्याकुल हैं। नदियों ने महान संस्कृतियों को जन्म दिया और संस्कृति-पुत्रों ने नदियों की धाराएँ मोड़कर, उन पर बाँध बना कर, उन्हें नहरों में बाँट कर उन्हें ऐसा निर्जल कर दिया कि अर्ध्य देने के लिए भी जल नहीं बचा। बनारस के दशाश्वमेध घाट पर गंगा के भरे हुए जल को देखिये तो, संस्कृति की शव-यात्रा निकलती हुई दिखाई देती है। मथुरा-वृंदावन में राधा-कृष्ण की जमुना में आचमन के लिए भी जल नहीं है। महेश्वर में नर्मदा पर डूबता हुआ सूरज और पिघलती हुई शाम उदास कर देती है। नदियों को काट कर नहरें तो निकाल दी गयीं, लेकिन हम क्या किसी नदी को भी जन्म दे सकते हैं ?

पहाड़ टूटे, जंगल कटे, नदियाँ बँटी और धीरे-धीरे सब सूखने लगा। वर्षा का वह नैसर्गिक संगीत जो पूरे भारत के जीवन में बजता और बहता था, धीरे-धीरे मौन होने लगा। लोग आबे ज़मज़म के पास पहुँच कर भी प्यास से मरने लगे। शब्द, जो सर्ग और निसर्ग की गाठें खोलकर, हमारी जीवन नौका पर पाल की तरह तन कर उसे बहाते थे और हवा की मार से हमें बचाते थे- उनके भीतर का जल भी सूखने लगा। प्रवाह रूक गया और नौका बालू में फँस कर रुक गई। उन्हें देख कर जब आँखे भर जाती थी, तब वे रुक कर आँसू सूखने की प्रतीक्षा करते थे। दृश्य किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, आगे बढ़ जाता है। सब कुछ दृश्य हो गया और अदृश्य के अस्तित्व पर संदेह होने लगा। सब मिटने लगा- गीत, नृत्य, संगीत, साहित्य, संस्कृति और वह सब, जो जीवन की आपाधापी में हमें रस देता था, सांत्वना देता था, शक्ति देता था और वेदना-संवेदना और प्रार्थना से जोड़ता था। इसीलिए नदियाँ कंकाल होती गयी, जल के स्रोत सूखने लगे और पानी पर भी बाज़ार का कब्जा हो गया।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
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