स.पू.अंक-13,अक्टू-दिस-2011,पृ-91

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दानवीर बलि के वंशज

श्री शेखर ज्योतिशील
सोनोवाल शब्द की व्युत्पत्ति के पीछे यह माना जाता है कि किसी समय ये लोग नदी से सोना काढ़ते थे।

कश्यप, अदिति के पुत्र वामन ने तीन पग भूमि के बहाने त्रिलोक नाप लिया तो बलि को पाताल चले जाना पड़ा। बलि का पुत्र बाण विष्णु बैरी बन उठा और उसने अपना राज्य शिव की कृपा से बसाया। अंतत: बाण के पतन के बाद उसका पौत्र हग्रा उस वंश की धारा को अविच्छिन्न रखने के लिए प्राय: एक हजार प्रजा और सात मिसिङ परिवारों को लेकर अन्यत्र जा बसा। उसने सदिया के आस–पास के क्षेत्र में हालालि नामक राज्य की स्थापना की। यहीं से शुरू होती है सोनोवाल जाति की कथा।

बाण के पौत्र हग्रा के नाम से हग्राल वंश की स्थापना हुई। इसके अलावा उनके अन्य चौदह वंश हैं, वे हैं- हग्राल, मुक्ताल, मदन, मानिकियाल, आहमल, फरमान, बर हजुवाल, सरू हजुवाल, कुमराल, ढेकियाल, लथियाल, डङराल और चट्तियाल।

सोनोवाल शब्द की व्युत्पत्ति के पीछे यह माना जाता है कि किसी समय ये लोग नदी से सोना काढ़ते थे। इसी कारण ये सोनोवाल कहलाए। असम में सोने की खान नहीं है, परंतु सुवनसिरी, भरली व दिक्रं जैसी पहाड़ी नदियों में सोने के कण पाए जाते हैं। साहाबुद्वीन तालिस के 1662 ई. में लिखे विवरण के अनुसार करीब दस–बारह हजार असमिया लोग इस काम में जुटे थे। आहोम राजा स्वर्गदेव चक्रध्वजसिंह के दिनों में करीब बीस हजार लोग और स्वर्गदेव गौरीनाथ सिंह के शासन काल में करीब सोलह हज़ार लोगों ने इस काम को जीविका के रूप में ग्रहण किया।

सोना काढ़ने का काम अत्यंत कष्ट साध्य था। ये लोग हर वर्ष बाढ़ की प्रतीक्षा करते और पानी सूखते ही ये सोना काढ़ने जुट जाते। सबसे पहले तट के बालू की परीक्षा करने के बाद यदि उन्हें लगता कि सोना मिलने के आसार मौजूद हैं तो नदी की धारा को रोककर उस स्थान के ऊपर से प्रवाहित कर देते। उस धारा के साथ ऊपर की चिकनी मिट्टी और बालू के बह जाने के बाद नीचे के पत्थर पर ठोस बालू के कण रह जाते। फिर एक बाँस की बड़ी छलनी में सोना मिश्रित बालू रख दिया जाता और उस पर पानी डाला जाता है। छलनी के छिद्र से सोना एक लकड़ी की थाल में गिरता और बाकी अवांछित तत्व हट जाते। इस प्रकार सोने के कण जुट जाने पर उसे एक सीपी में भरकर उसमें आग लगा दी जाती। सीपी जलकर चूना बन जाता और सोने के कण जम जाते। इन सीपियों को पानी भरे थाल में रखने पर ये सोने के कण तल में जमा हो जाते। इसी प्रकार से सोनोवाल लोग सोना काढ़ते थे।

सोनोवाल शब्द के पीछे एक और व्युत्पत्ति बतायी जाती है। आउनीआती सत्र के सत्राधिकार केशव देव गोस्वामी को सोना देकर दीक्षा या शरण लेने के कारण ये लोग सोनोवाल कहलाए। विदित है कि असम में अनाडम्बर वैष्णव धर्म के प्रचारार्थ श्रीमंत शंकर देव ने अपने कई सहयोगियों को नियोजित किया था। इसी क्रम में माधव देव और दामोदर देव ने असम के निचले हिस्सों में सत्र स्थापित कर धर्म प्रचार किया। उनके द्वारा स्थापित बरपेटा और पाटबाउसी सत्र प्रसिद्ध हैं। असम के ऊपरी हिस्सों में राजनैतिक कारणों से ही होया अन्यान्य सामाजिक, साम्प्रदायिक बाधाएँ हों, वहाँ धर्म प्रचार करने में विलंब अवश्य हुआ। दामोदर देव के सुयोग्य शिष्य वंशी गोपाल देव की अथक कोशिशों से उन अछूते हिस्सों में भी धर्म प्रचार का काम शुरू हो गया।

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