एक वैश्विक उपस्थिति 2

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पिछली अर्धशती से केंद्रीय हिंदी संस्थान भारतीय व विदेशी छात्रों के लिए विशिष्ट प्रकृति वाले हिंदी पाठ्यक्रम चलाकर जो शैक्षिक-सांस्कृतिक भूमिका निभाता रहा है, सचमुच वह सराहनीय है। आज विश्व के लगभग सभी देशों व क्षेत्रों में केंद्रीय हिंदी संस्थान से हिंदी सीखकर गए हुए लोग मिल जायेंगे। मुझे अमेरिका, एशिया व यूरोप के अनेक विश्वविद्यालयों में जाने और वहां अनेक आयोजनों में शामिल होने का अवसर मिला है और लगभग हर अवसर पर वहाँ मुझे कोई न कोई ऐसा अध्यापक या अनुवादक या शोधार्थी या दुभाषिया जरूर मिला है, जो कभी न कभी केंद्रीय हिंदी संस्थान का विद्यार्थी न रह चुका हो। विश्व भर में हिंदी जानने वाले लोग मिल जाते हैं और उनमें से अनेक लोग केंद्रीय हिंदी संस्थान से ही दीक्षित होकर गये हुए लोग होते हैं। ये लोग केंद्रीय हिंदी संस्थान की सबसे बड़ी कमाई हैं।

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संस्थान के अनेक प्रकाशन अपनी स्तरीयता व संदर्भितता के लिए जाने जाते हैं। विश्व भर के विश्व विद्यालयों व भाषा संस्थानों में इस संस्थान से प्रकाशित पुस्तकों को पाठ्य सामग्री, शोध-स्त्रोत, संदर्भ-सामग्री के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। अपनी प्रकाशन गतिविधियों के साथ-साथ संस्थान पिछले कुछ वर्षों से हिंदी की अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं तथा अनेक आयोजनों के लिए अपना अर्थिक सहयोग जुटा रहा है, जो हिंदी रचनात्मक व विचार-विमर्श को नई संभावनाएँ प्रदान कर रहा है। इस समय जापान के ओसाका विश्वविद्यालय में पढ़ा रहा हूँ, पर संस्थान से मेरा संपर्क किसी न किसी रूप में लगभग लगातार बना रहता है। अब जब कि संस्थान अपनी स्वर्ण जयंती मनाने की राह पर है, संस्थान के साथ अपने जुड़ाव पर गर्व की अनुभूति होना स्वाभाविक ही है। मैं यह नहीं कहता हूँ कि संस्थान पूरी तरह चौबीस कैरेट वाला स्वर्णिम संस्थान है, इसमें कुछ कमियाँ जरूर रही होगी और हैं। पर चौबीस कैरेट के आभूषण नहीं बनते, यह हम सब जानते ही हैं। संस्थान के इस स्वर्णिम अवसर पर मुझे फिर से अपना वही अनुभव याद हो आता है कि दुनिया भर के देशों में संस्थान द्वारा गढ़े गए अनेक हिंदी आभूषण आज अध्यापकों, शोधार्थियों, अनुवादकों व दुभाषियों के रूप में मौजूद हैं, जो हमारे इस पृथ्वी नामक ग्रह को सुंदरतर बनाने में अपने-अपने ढंग से प्रभावी व सार्थक भूमिकाएँ निभा रहे हैं।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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