गवेषणा 2011 पृ-12

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भारत मे आधुनिक युग के प्रांरभ में देशी-विदेशी प्राच्यवादियों ने इस देश के इतिहास, परंपरा, कला, संस्कृति, धर्म, दर्शन, के साथ-साथ भाषाओं और बोलियों को भी हेय नजरिए से देखने की दृष्टि और सैद्घान्तिकी गढ़ी। इस दृष्टि और सैद्घान्तिकी के अनुसार इस देश का समग्र अतीत, जिसमें इस देश की बोलियां और भाषाएं भी जीवंत रूप से अंतर्भुक्त है, पश्चिमी सभ्यता और अंग्रेजी के मुकाबले, फूहड़ तर्को और कुतर्को के मार्फत हीनतर साबित की गई। उन्होने (हिंदी नहीं) उर्दू सहित हिन्दुस्तानी को इस देश की संपर्क भाषा के रूप में देखा और इस्तेमाल किया; लेकिन कभी भी इस भाषा को उसकी स्वाभाविक गरिमा के साथ स्वीकार नहीं किया।

बाद में स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में हिंदी का गुरूत्व बढ़ा और आजादी के बाद वह देश की राजभाषा बनी। किंतु हिंदी के प्रति प्राच्यवादी दृष्टिकोण अब इस देश के कुछ प्रभावशाली लोगों ने अपना लिया, जिनकी नजरों में इस देश का अतीत, इतिहास, सभ्यता, संस्कृति, पंरपरा, कला और भाषाएं भी हीनतर हैं और बाहर के लोंगो की भाषाएँ उनके पूर्वग्रही दृष्टिकोण समेत उपयोगी और व्यावहारिक हैं।

ऐसी दयनीय समझ वाले लोग हिंदी को यथार्थवादी दृष्टिकोण से देखने के नाम पर व्यावहारिकता का हवाला देते है और निरर्थक छिद्रान्वेषण करते हुए हिंदी को वर्तमान परिदृश्य में नई चुनौतियों के समक्ष अनुपयोगी बताते हैं।

हिंदी की वर्तमान स्थिति को देखकर उसका आकलन करते समय हमे उपरोक्त दोनों दृष्टियों के अतिरेक को छोड़ना होगा। आज की हिंदी न तो भाववादियों का कल्पवृक्ष है और न प्राच्चवाद से ग्रस्त सतही यथार्थवादियों की अनुपयोगी, अव्यावहारिक, अप्रासंगिक और दुर्बल भाषा।

हिंदी की दुर्बलता वास्तव में हिंदी के प्रयोक्ताओं की मानसिक दुर्बलता है। यह हिंदीजनों की आत्महीनता से उपजी दुर्बलता है। हिंदी का सुदृढ़ व्यक्तित्व हिंदीजनों के व्यक्तित्व की सबलता और पूर्णता से संबद्घ है। हिंदी के व्यक्तित्व पर यथार्थ के नाम पर जो देशी-विदेशी प्राच्यावादी हलकों का हमला है, वह वस्तुत: हिंदी के 'आत्म-व्यक्तित्व' पर 'अन्य-व्यक्तित्व का प्रबल आघात है। हिंदी इसमें अपने-आप नहीं उबर पाएगी। उसे सक्रिय और सबल व्यक्तित्व से युक्त हिंदीजनों के साहसपूर्ण कृतित्व की प्रतीक्षा है।

हिंदी को उसका व्यक्तित्व उसे 'कल्पवृक्ष' समझने वाला पहला अतिवादी खेमा नहीं उपलब्ध करा सकेगा। यह दक्षिणपंथी भाववादी खेमा हिंदी की वास्तविक जमीन, जोकि उसका वास्तविक व्यक्तित्व है, के निकट आने की तैयारी करता नहीं दीखता। उनकी दृष्टि में हिंदी एक स्वनिर्मित स्वर्ण-महल है, जिसे निहारना और निहारकर आत्ममुग्ध होते रहने में ही उनके कर्तव्य की इति है वास्विकता का आकलन करना उनके बूते का काम नहीं।

'गवेषणा' के इस अंक को हमने प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूपों पर केंद्रित किया है। 'गवेषणा' का यह अंक इक्कीसवी सदी में हिंदी को देखने की उपरोक्त दोनों अतिवादी दृष्टियों का प्रतिपक्ष उपस्थित करने का विनम्र प्रयास है।

भाषा के विशुद्घ प्रयोजन का पक्ष उपयोगितावादी, यथार्थधर्मी, अनावश्यक रागात्मक एवं भावुकता से मुक्त और समय की मांग को पूरा करने वाला है। प्रयोजन के कारण भाषा की प्रयुक्ति के भी विविध रूप होते हैं। विज्ञान, व्यापार, चिकित्सा, ज्योतिष, धर्म, दर्शन, राजनीति-ये भाषा की प्रयुक्तियों के विभिन्न क्षेत्र हैं।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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