गवेषणा 2011 पृ-166

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कवि ने शब्द चयन में ही नाद पैदा करने का प्रयास किया है। तेलुगु के भाव कवियों ने गीतात्मक कविताएँ लिखी हैं, जिनमें अधिंकाश में नाद सौंदर्य उभरा है। गरिमेल्ला सत्यनारायण जैसे कवियों ने अपनी कविताओं को गीतात्मक बनाते हुए उसे लोकधुन में प्रस्तुत किया है। गरिमेल्ला की निम्न समाज सुधारवादी पक्तियाँ इसकी साक्षी हैं-
कल्लु त्रागबोकु-कडुपु माड्चुकोकु
नी इल्लु गुल्ल सेयकोरि तम्मुड-नी इल्लु...
पिल्लजेल्ला लेड्वा- तल्लिदंडुलु वगव
नी मुल्ले व्यर्थमु सेयकोरि तम्मुड-नी इल्लु...
इल्लालुसुरू पोद-इतरूलेल्लतिट्टा
कल्लु त्रागबोकु रोरि तम्मुड-कल्लु...

कवि ने इसमें गीतात्मकता को अपनाकर बिंब के संप्रेषण को और सरल बनाया है।

हिंदी की छायावादी कविता तथा तेलुगु की भाव कविता अपने-अपने क्षेत्रों की श्रेष्ठ कविता मानी जाती है। इन दोनों की भाषाई अस्मिता की खोज अद्भुद है। दोनों का उदय लगभग उस समय हुआ जब दोनों भाषाओं में भाषा सुधार हो रहे थे। हिंदी में द्विवेदी युगीन भाषा सुधार छायावादी कवियों के लिए सरलास्त्र बन गया था। छायावादी कवियों ने अपने भाषा-प्रयोग से खड़ी बोली पर आधारित भाषा को काब्य भाषा के रूप में समृद्घ किया है। अनेक तत्सम शब्दों का प्रयोग करके हिंदी काव्य की नयी शैली का ही उन्होंने आविष्कार किया है। छायावादी कवियों के सुप्रयासों से ही खड़ी वोली पर आधारित हिंदी काव्य भाषा के रूप प्रतिष्ठित हो पायी है। तेलुगु में भाव कवियों के पहले ही व्यवहारिक भाषा का दौर चला पड़ा था। उसे भाव कवियों ने सहर्ष स्वीकार किया है। अपने प्रयोगों से उसे और समृद्घ किया है, जिससे तेलुगु कविता सरल और जनसुलभ बन गयी है। भाषाई अस्मिता की खोज शिल्पात्मक तत्व है जो मूलत: रस, छंद, अलंकार, बिंब, प्रतीक आदि काव्यशास्त्रीय तत्वों से जुड़ी रहती है। प्रस्तुत लेख में सिर्फ बिंब को ही आधार बना लिया गया है। बिंब के अतिरिक्त प्रतीक, रसनिरूपण और छंद प्रयोग में भी भाषा का विशेष प्रयोग होता है। इन सभी मामलों में हिंदी की छायावादी कविता और तेलुगु की भाव कविता में स्रोतमुलक एवं दर्शन मूलक समता रखने के कारण शिल्पात्मक प्रयोग में भाषागत समानताएँ ही अधिक उभर कर आयी हैं। दोनों कवियों ने कविता के लिए अनुकूल तत्सम शब्दों का बड़ी उदारता से उपयोग किया है।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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