गवेषणा 2011 पृ-168

ज्ञानकोश से
यहां जाएं: भ्रमण, खोज


केवल राजनीति ही नहीं, इतिहास, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, दर्शन, धर्म आदि सभी अन्य अनुशासन दृष्टियों और विधियों को साहित्य की वैचारिक सत्ता में हस्तक्षेप करने देने से अशोक वाजपेयी अपनी असहमति जताते हैं।

उनके अनुसार कविता की वैचारिक सत्ता अन्यान्य अनुशासनों की विराट और अधिक प्रभावकारी सत्ताओं के बड़े-बड़े सचों के समक्ष जीवन के अपेक्षाकृत छोटे-छोटे सचों का प्रतिनिधित्व करती है। लेकिन इसी प्रतिनिधित्व में कविता का मान भी है। क्योंकि अपनी सीमित शक्ति और सत्ता के बूते वह अपने रहस्य का बखान भी करती है और अपनी स्वायत्तता और निजता को 'अन्यो' के आंतक से बचाए रखने का साहस भी जुटा पाती है।

कविता का यह स्वराज हासिल करने के लिए अशोक वाजपेयी कविता का सत्याग्रह भी प्रस्तावित करते हैं, "वह (यानी कविता) अपने छोटे-छोटे सच की छोटी-सी दुनियाँ की बड़े, सच या बड़ी दुनिया के लिए बलि नहीं दे सकती है। इसी अर्थ में कविता सत्याग्रह है। वह अपने सच की तानाशाही का इजहार नहीं, बल्कि उसकी उपस्थिति का विनम्र आग्रह है।"[1]

अन्य ज्ञान-दृष्टियों के बड़े-बड़े सचों के आंतक से मुक्त कविता के निजी छोटे-छोटे सचों के बचाव का अशोक वाजपेयी का प्रस्ताव हिंदी में अनोखा और मौलिक प्रस्ताव है। ये छोटे-छोटे सच हैं-अध्याय, आत्म, नियति, भविष्य, अंनत, प्रेम, रति, आसक्ति, शब्द, भाषा, और मृत्यु। इन अनुभवों और इनके संग-साथ को अशोक वाजपेयी की कविता पिछले लगभग पांच दशकों से आत्मसात करती आ रही है और अपने समय की कविता से भी उनका निरंतर यही आग्रह रहा है।

अक्सर जीवन के इन छोटे-छोटे सचों को बड़े-बड़े सचों द्वारा विचारधारागत रूप से प्रभावित करने की कोशिश की जाती रही है। एक बड़े सामाजिक या राजनैतिक सच के सम्मुख शब्द या भाषा या नियति जैसे छोटे-छोटे सचों की भला क्या हैसियत हो सकती है: इस उपभोक्तावादी भूमण्डलीकृत राजनीतिक समय में कविता और जीवन के छोटे-छोटे सचों को लीलकर उसे विचारों का उपनिवेश बना लिए जाने का गंभीर खतरा उपस्थित है।

अशोक वाजपेयी साहित्य के स्वराज का अतिक्रमण करने वाली और उसे अपने विचारों का उपनिदेशक बनाने वाली बीसवीं सदी में बनी और ध्वस्थ हुई एक दैत्याकार राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्था और विचारधारा का जिक्र अपने लेखों और साक्षात्कारों में बराबर करते हैं। पूर्व सोवियत व्यवस्था से जुड़ी यह मार्क्सवादी विचारधारा है। साहित्य में प्रतिबद्घता का मामला भी इसी विचारधारा से जुड़ा है और हिंदी साहित्य के एक बड़े खेमे में प्रतिबद्घता एक अनिवार्य रचना-मूल्य की तरह स्थापित है।


पीछे जाएँ
167
168
169
आगे जाएँ


गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ

टीका-टिप्पणी

  1. वही, पृ. 78
वैयक्तिक औज़ार

संस्करण
क्रियाएं
सुस्वागतम्
सहायता