गवेषणा 2011 पृ-26

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सरकारी संस्थाएँ

सरकारी संस्थाओं के लिए राष्ट्रपति के निर्देश: स्वतंत्रता के बाद संविधान द्वारा जब हिंदी को संघ की "राजभाषा" का दर्जा दिया गया तो "राजभाषा" के विकास, प्रसार एवं स्वरूप-निर्धारण का उत्तरदायित्व भी संघ-सरकार का हो गया। केंद्र सरकार द्वारा हिंदी के विकास एवं हिंदी प्रयोग की क्षमताओं को विकसित करने के उद्देश्य से शब्दावली निर्माण, अनुवाद कार्य, प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था का उत्तरदायित्व प्रमुख रूप से शिक्षा-मंत्रालय (मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय), गृह-मंत्रालय, विधि-मंत्रालय तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को सौंपा गया तथा अन्य सभी मंत्रालयों को भी "राजभाषा" के विकास हेतु कार्य किए जाने के निर्देश दिए गए। सरकारी स्तर पर हिंदी के विकास के लिए सभी मंत्रालयों ने उनको सौंपे गए कार्यों को पूरा करने के उद्देश्य से अनेक विभाग और अधीनस्थ कार्यालयों, संस्थाओं और संगठनों की भी स्थापना की। हर मंत्रालय में अपनी-अपनी हिंदी सलाहकार समितियाँ बनाई गयीं, जिनके अध्यक्ष उस मंत्रालय के मंत्री बनाए गए। इन समितियों में संसद के सदस्यों, विभिन्न मंत्रालयों के अधिकारियों के अलावा गैर–सरकारी सदस्यों को भी सदस्य बनाया गया। सभी मंत्रालयों के हिंदी के कार्यक्रमों में एक समन्वय स्थापित करने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में "केंद्रीय हिंदी समिति" का भी गठन किया गया। सभी मंत्रालय तथा उनके अधीनस्थ विभागों ने राजभाषा हिंदी के विकास के लिए विभिन्न योजनाएँ तथा कर्याक्रम संचालित किए, जिसके फलस्वरूप हिंदी का प्रयोग विभिन्न प्रयोजनों के लिए अलग-अलग विषय क्षेत्रों में किया जाना आरंभ हुआ और प्रयोजनमूलक हिंदी की विभिन्न प्रयुक्तियों का विकास संभव हो सका।

विभिन्न मंत्रालय तथा उनके अधीनस्थ कार्यालय एवं संगठन:

गृह-मंत्रालय

राजभाषा हिंदी के प्रगामी प्रयोग तथा राजभाषा हिंदी के कार्यान्वयन के लिए भी योजनाएँ तथा कार्यक्रम बनाए गए हैं तथा राजभाषा हिंदी के विकास हेतु अन्य मंत्रालयों को जो आदेश दिए जाते हैं, उन सब का उत्तरदायित्व केंद्रीय सरकार के "ग्रह मंत्रालय" का सौंपा गया है। राजभाषा हिंदी के विकास को ध्यान में रखकर "राजभाषा आयोग" के गठन तथा "संसदीय", राजभाषा समिति की नियुक्ति का उत्तरदायित्व भी गृह मंत्रालय के ही अधिकार क्षेत्र में आता है। राजभाषा से संबधित जितने भी कार्य है उनके संबंध में अन्य मंत्रालयों को आदेश, प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था का उत्तरदायित्व प्रमुख रूप से शिक्षा मंत्रालय (मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय) गृह मंत्रालय को सौंपा गया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रयोजनमूलक हिंदी के विकास के पीछे भारतीय संविधान में की गई विभिन्न व्यवस्थाएँ उन व्यवस्थाओं को क्रियान्वित करने के लिए उपलब्ध कराए गए तकनीकी संसाधन तथा गैर–सरकारी संस्थाओं के प्रयास रहे हैं। इन तीनों प्रमुख कारणों के परिणामस्वरूप ही प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप जैसे– कार्यालयीन हिंदी अथवा प्रशासनिक हिंदी, बैकिंग हिंदी, वाणिज्य एवं व्यापार की हिंदी, विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र की हिंदी, जनसंचार एवं पत्रकारिता की हिंदी, विज्ञापनों की हिंदी आदि अनेक प्रयुक्ति-रूप सामने आये हैं। आम बोलचाल की हिंदी के व्यतिरेक में अपना-अपना अस्तित्व बना चुके हैं। तथा जिन्होंने प्रयोजनमूलक हिंदी को नया स्वरूप प्रदान किया है।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
वैयक्तिक औज़ार

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