गवेषणा 2011 पृ-8

ज्ञानकोश से
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एक हैं श्री आदित्य चौधरी। उनकी विकास-कहानी बड़ी दिलचस्प है। उन्होनें विकीपीडिया की तर्ज पर भारतकोश नाम का एक पोर्टल बनाया है। अनेक वर्ष से बिना किसी वित्तीय सहयोग के ये लगे हुए हैं। एक टीम सतत काम करती रहती है। इनके पास बहुत सारी जमीनें थी। थोड़े-थोड़े अंतराल में अपना एक खेत बेच देते हैं और फिर से जुट जाते हैं पोर्टल पर जिसे ये ज्ञान का महासागर कहतें हैं। इनका मानना है कि क्योंकि भारत संबंधी जानकारी एक ही वेबसाइट पर हिंदी मे उपलब्ध नहीं थी, जो कुछ भी था अंग्रेजी मे था, या अलग-अलग ब्लॉग्स में विखरा हुआ था। इनको कांटा चुभा, कसक हुई की और हिंदी कीष्ठसक दिखा दी।

इन्होने 2006 में भारत कोश बनाने की योजना बनाई थी। भारतकोश का स्वरूप इतना विशाल और व्यापक था कि इन्होने इसकी शुरूआत केवल ब्रज क्षेत्र से ही की ताकि इनका आत्मविश्वास जागे। 2006 से ही इन्होनें 'भारतकोश' और 'ब्रज डिस्कवरी' के लिए पुस्तक संग्रह, अनुवाद और टंकण प्रारंभ कर दिया। 2008 में यूनिकोड के साथ 'ब्रज डिस्कवरी' नामक वेबसाइट बनाई। 2009 में कटेंट मैनेजमैंट सिस्टम के साथ इसे दोबारा शुरू किया। सत्रह हजार से ज्यादा पृष्ठ हैं। 1000 पुस्तकों के लिए गए 7000 लेख हैं। विभिन्न लेखकों से मौलिक लेखन कराते है। भारतकोश में इस समय-इतिहास, भूगोल, विज्ञान, धर्म, दर्शन, संस्कृत, पर्यटन, साहित्य, कला, राजनीति, जीवनी, उद्योग, व्यापार, खेल आदि पर प्रचुर सामग्री है। भारत गणराज्य संरचना में अभी दो हजार पृष्ठ है। 'मेरा गॉंव मेरा देश' के अंतर्गत लगभग सात लाख पृष्ठ होगें, ऐसा ये बताते है कि प्रत्येक गॉंव का अपना पन्ना होगा। एक अकेला आदमी जो किसी संस्था की तरह काम कर रहा है।

हमारी भी एक वेबसाइट है, लेकिन अभी वैसी नहीं है जैसी कि होनी चाहिए। एक पचास साल पुरानी संस्था के सारे आंकड़े होने चाहिए वेबसाइट में। एक-एक बात होनी चाहिए। देशी-विदेशी सभी छात्रों का डेटा-बेस हो। पूर्व छात्रों की परिषद का मंच हो। हमारे यहाँ से कितने विद्यार्थी हिंदी पढ़कर गए, अलग-अलग देशों में। कोई, दुभाषिया बन गया, कोई हिंदी शिक्षक बन गया। यहां से गए छात्र, हिंदी के राजदूत बन गए। उन्होंने अपने-अपने देश में हिंदी का परचम फैलाया। कोई चीन में, कोई मास्कों में, कोई कोरिया में, जापान में, कोई ऑस्ट्रेलिया में। एक ऐसी वेबसाइट, एक ऐसा पोर्टल, जिसमें हिंदी शिक्षण की दृश्य-श्रव्य सुविधा-सम्पन्न पाठ योजनाएँ हो। सबसे बड़ी बातें कि हर हालत में द्विभाषिक हो। मेरा इच्छा है कि इसे द्विभाषिक बनाने का प्रयत्न शीध्रातिशीघ्र प्रारंभ हो। वैश्विक स्तर पर जब अंग्रेजी संपर्क की भाषा बनी हुई है, हर कोई इस वेबसाइट के माध्यम से अधिकतम जानकारी और हिंदी शिक्षण की सामग्री ले सके।

मेरी कामना है कि हमारे प्रयास सकर्मक हों, कुछ निर्माण करने वालें हों, कुछ आगे बढ़ाने वाले हों। उन्नीस मार्च दो हजार ग्यारह में हमारे संस्थान के पचास वर्ष पूरे हो जायेगें। मैंने पचास दीपक जला दिए हैं अभी से। हर दीपक में एक चेतना होगी, हिंदी की प्राणवत्ता होगी, हिंदी का माधुर्य होगा, लावण्य होगा और आत्मीयता होगी। आदान-प्रदान से अपनी संस्कृति को बाहर ले जाएंगे और केंद्रीय हिंदी संस्थान आने वाले वर्षों में हिंदी के हित में श्रेष्ठ काम करेगा।


अशोक चक्रधर
उपाध्यक्ष
 


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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