गवेषणा 2011 पृ-85

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इससे भी भाषा में परिवर्तन हो जाता है। जैसे– आतंकवादी को ‘आतंकी’, बदला करने वाले को ‘बलवाई’, बलात्कार करने वाले को बलात्कारी और ठगी करने वाले को ‘ठग’ प्रयुक्त करने का चलन आजकल जोरों पर है। और यह भी

बैंक फ्राड: आरोपी का आत्मसमर्पण

पंजाब केसरी/प्रथम पृ. दूसरी लीड खबर/31 दिसंबर, 2010

आईएसआई ने कराया था मुंबई हमला

चीफ लैफ्टि. जनरल पाशा को पूरी जानकारी थी।

उपरोक्त संक्षिप्तता के प्रयोगों से भाषा में परिवर्तन होता है। जब कम कहे में ही ज्यादा का बोध होता है तो फिर अनावश्यक स्थान घेरने और उच्चारण में अधिक समय लगाने में कौन-सी समझदारी है। यहाँ उपरोक्त वर्णित कारकों के अलावा भी विभिन्न प्रकार से भाषिक परिवर्तन हो रहे हैं।

कुछ आलोचक और विद्वान भाषा के इस बदलाव को आम जन के लगातार समर्थन के बाद भी हजम नहीं कर पा रहे हैं। वह इसे पथभ्रष्ट भाषा कह रहे हैं, पर नई पीढ़ी की यह भाषा देहात से लेकर मेट्रोसिटीज में अपना डंका बजा रही है। इंडिया के यूथ द्वारा वह दिनोंदिन समृद्ध हो रही है। भाषा के लिए नए शब्द उसके प्रयोकर्ता ही दे रहे हैं। मसलन घुड़चढ़ी, मुंहनोचवा, झपट्टामार, भीतरली टांग, ब्लौगिया, चिट्ठाकार आदि शब्द विद्वानों और शब्दावली आयोगों ने नहीं बनाए। यह शब्द आम लोगों के द्वारा लगातार प्रयोग में आने के कारण लिखने-पढ़ने में प्रयोग हो रहे हैं।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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